Thursday, April 9, 2009

गुलफाम किधर मारे गये.. उर्फ पंचलैट

ज़ि‍न्‍दगी की भागमभाग में कब मौका मिलता है कि तसल्‍ली से बैठकर उन सवालों का जवाब पा लें जिनकी रौशनी में फिर आत्‍मा का पेट्रोमैक्‍स दप्-दप् जगमगाता जले! कहीं बड़ी फौजदारी हो गई हो या ग़बन के गंभीर मामले ने सांस लेना दूभर किया हो सो भी नहीं, लघुकाया मायाओं की हाय-हाय में कुओं में गिरते-ऊपरियाते रहते हैं. सासजी सीढ़ि‍यों पर गिर गईं, पत्‍नी के पैर में फोड़ी निकल आयी है, बेटी की गणित की किताब के कोने चूहे ने कुतर डाले हैं.. कभी-कभी घबराहट में मन प्रश्‍न करता है यही है जीवन? इतना सा? इन्‍हीं के पीछे भागते-भागते पीठ पर आकर कोई ‘इति’ का साईन साट जायेगा? जीवन के अड़तीस साल इसी तरह इस मकान से उस इमारत, रिक्‍शे से निकलकर रेल से उतरकर बस और यहां सीढ़ि‍यां चढ़ उस दरवाज़े की घंटी बजाते, अस्‍पताल और कचहरी के पिछवाड़े बाज़ार से मछली खरीदते गुज़र गये, न पत्‍नी का हाथ हाथ में लेकर कहीं सुदूर समुंदर किनारे टहल की, न कभी किसी दोस्‍त को छाती से भींचकर यही कहा कि तू चिंता मत कर, यार, मैं तेरे लिए जान दे दूंगा!

नहीं कहा. न कभी पत्‍नी ने ही शिकायत की. चुपचाप मुंह सिये जीवन जीती रही. जैसे उसके हिस्‍से इतना ही जीवन जीना लिखा हो की असल खेल से पहले एक फिल्‍म डिविज़न वाली डॉक्‍यूमेंटरी देखकर तैयार होकर फेरे लिये थे!

कभी सोचता हूं वो कौन लोग हैं जो टैक्सियों में भरी हुई पेटियां लदवाकर एयरपोर्ट जानेवाली सड़कों पर जाते दिखते हैं. किन अजाने-अनोखे गंतव्‍यों पर जाते होंगे, कैसे साफ़-धुले होटलों में देर रात तक जाने क्‍या-क्‍या अच्‍छी बातें करते क्‍या-क्‍या अच्‍छा कुछ खाते दुनिया को कैसी चमकती आंखों देखते होंगे? और फिर चैन की भरपूर नींद के बाद दूसरी सुबह उठते होंगे तो दुनिया कैसी तो सुहानी जगह लगती होगी? तलुए के नीचे हंसुये का हत्‍था दाबे कटहल काटती पत्‍नी के ख़याल से मेरा मन गिर जाता है. मैं चाहता हूं कटहल से जूझने की जगह वह मेरी गीली कल्‍पनाओं की नम फुहार में आकर ज़रा देर को खड़ी भर हो जाये, बस. लेकिन कहिये तो मैं आपको लिखकर दे दूं कि मेरी पत्‍नी ऐसा कभी करेगी ही नहीं! ज्‍यादा से ज्‍यादा चौंककर मुंह गिराये मेरी ओर ऐसे इशारों में देखेगी मानो मैं ऐसी बातें सिर्फ उसे दुखी करने के लिए सोच रहा हूं! मेरे नाराज़ होने पर रसोई के सामने के दो फुट के छोटे बरामदे से भागकर सोनेवाले कमरे में जाकर अंदर से दरवाज़ा भेड़ लेगी, और रात को इस और उस बात के बीच कहे बिना रह नहीं पायेगी कि इसमें उसका क्‍या कसूर कि मेरी किस्‍मत में उस जैसी पत्‍नी लिखी थी!

कौन जानता है शायद पत्‍नी सचमुच सच कहती हो. फाहियान, ह्वेनसांग या अल बेरुनी की तरह शायद कहीं से निकलकर कहीं जाना मेरे नसीब में न लिखा हो? शायद डॉक्‍टर के यहां अपने पेट का रोना लेकर जाने से ध्‍यान बंटाने के लिए मैं फालतू की इन ऊल-जुलूल के ख़यालों में फंसा बैठा होऊं?

अब देखिये, डॉक्‍टर के यहां जाने की बात याद आते ही मन कैसे तो कड़वा हो गया, लेकिन शायद अपनी बारी का इंतज़ार करते वहां थोड़ी सोचने की फुरसत बने? वर्ना ज़ि‍न्‍दगी की भागमभाग में अब सचमुच कब, कहां मौका मिलता है कि तसल्‍ली से बैठकर उन सवालों का जवाब पा लें जिनकी रौशनी में आत्‍मा का पेट्रोमैक्‍स दप्-दप् जलने लगे, नहीं?

11 comments:

  1. इस देर रात गये शब्दों के इन अद्‍भुत रंगों में रँगे आपके इस अनूठे भाव-चित्र में जाने कहाँ से भटकते-भटकते आ कर खो गया...बस गुम हूँ इस तस्वीर में
    सोचा था कुछ कहे बगैर चुपचाप निकल लूँगा, मगर मन नहीं माना..

    ReplyDelete
  2. छोटी छोटी घटनाओं से भरी यह ज़िन्दगी दप दप जगमगाती भी है और जलाती भी है.

    ReplyDelete
  3. अड़तीस साल में कित्ते बरस और जोड़ दिए जाएं जिससे आपकी उमिर पता चल जइहें ?
    इन्ही चूतियाटाईप के सवालो में हमने भी अपनी जिनगी के अड़सठ साल गवां दिये...

    आपकी उंगलियां साबुत बची हों तो चूमने का ख्वाहिशमंद हम भी हूं...

    ReplyDelete
  4. ज़ि‍न्‍दगी की भागमभाग में अब सचमुच कब, कहां मौका मिलता है कि तसल्‍ली से बैठकर उन सवालों का जवाब पा लें जिनकी रौशनी में आत्‍मा का पेट्रोमैक्‍स दप्-दप् जलने लगे, नहीं?
    meri bhi kuchh aisi hi sithati hai.....................

    ReplyDelete
  5. vaheeda ke chehrey ki saadgi to dekhiye..

    ReplyDelete
  6. अनूठे भाव लिए हुए ये रचना ....मन मैं ऐसे विचार ना जाने कितनी बार आते हैं

    ReplyDelete
  7. आपको रेणु याद आए और अपने जीवन की आपाधापी ! मैं भी अतीत के बारे में कुछ सोच रहा हूँ जैसे यही कि "न कभी किसी दोस्‍त को छाती से भींचकर यही कहा कि तू चिंता मत कर, यार, मैं तेरे लिए जान दे दूंगा!

    ReplyDelete
  8. जिस चमक-दमक के बारे में स‌ोच-सोच कर आप इतना परेशान हो रहे हैं उसकी असली रंग कितना स्याह है यह शायद आप भी अच्छी तरह जानते होंगे। इसलिए क्यों नाहक ही इतना स‌ोचते हैं। वैसे आम इंसान ऎसे ही स‌ोचता है। आप खास होकर भी आम इंसानों जैसे स‌ोचते हैं। यह महत्वपूर्ण है। गौरतलब है।

    ReplyDelete
  9. main to aaj bahut udaas hoon. ab ye padha. sach, gulfam bahut yaad aata hai kai baar. alochna kee bahut jagah hone ke bavjood us kahani ka suchhapan bemisal hai

    ReplyDelete
  10. गीली कल्पनाओं की भागीदार पत्नी क्यों नहीं होती, वो वैसा क्यों नहीं सोच पाती जैसा आप सोच रहे होते हैं । या इसे यूं कहे
    जैसा पति सोच रहा होता है वैसा पत्नी नहीं सोच पाती और जैसा पत्नी सोच रही होती है वैसा पति कभी नहीं सोचेगा। ये ऊहापोह तमाम जिन्दगी यूं ही चलती रहती हैं, तसल्‍ली से बैठकर उन सवालों का जवाब कभी नहीं पा सकते, जिनकी रौशनी में आत्‍मा का पेट्रोमैक्‍स दप्-दप् जलने लगे, ?

    ReplyDelete
  11. क्या लिख दिए हो दद्दा। कमाल करिहे।

    ReplyDelete