Monday, April 13, 2009

द इंटिमेट एनेमी..

पतली सी किताब है. कुल एक सौ तेरह पृष्‍ठ. द इंटिमेट एनेमी. साथ में एक सब-हेडिंग है लॉस एंड रिकवरी ऑफ़ सेल्‍फ अंडर कलोनियलिज़्म. तो यह पतली बुनावट दो निबन्‍धों में विभाजित है, सतही और स्‍थूल रूप में कहें तो पहला निबन्‍ध उस ‘खोये व्‍यक्तित्‍व’ की फांसों में उतरता है, दूसरा निबन्‍ध उसकी पुनर्प्राप्ति को रेखांकित करता है. पंद्रहेक साल हुए होंगे जब पहली मर्तबा किसी मित्र के सुझाव पर किताब पढ़ी थी, तब पढ़कर क्‍या महसूस हुआ था इसकी कोई स्‍मृति भी नहीं (यह आदमी की चिरकुटई का साक्षात प्रमाण है- कम से कम मेरी चिरकुटई का तो है ही- कि किसी को बीस वर्ष पहले तीन सौ रुपये दिये थे या कॉलेज से भगाकर किस लड़की को कम्‍पनी बाग सिनेमा दिखलाने ले गए थे वह याद रहता है किताब की गहराइयां भूल जाती हैं!). कुछ महीने हुए अभय बाबू उससे गुज़रते दिखे तो हमें फिर एक बार पुराने का ध्‍यान आया, हमने कहा निपटा लो तो एक नज़र हम भी मारते हैं. और ठीक-ठाक अंतराल के बाद नज़र मारना जब शुरू किया है तो बड़ी तेज़ी से एक पन्‍ने से दूसरे में जाते हुए अशीष नंदी की वृहत्‍तर सामाजिक, बौद्धिक कल्‍चरल कंपास, उसमें गुंफित महीन रेशों की सूक्ष्‍म, मार्मिक विवेचनाओं से लगातार दंग होता चल रहा हूं. जिस टैक्‍ट और अंडरस्‍टैंडिंग से नंदी 1830 के पहले व उसके अनंतर अंग्रेज औपनिवेशिक मानसिकता का चित्रण करते हैं, माइकल मधूसुदन दत्‍त, राममोहन राय, दयानंद सरस्‍वती, विवेकानन्‍द, ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर, किपलिंग, ऑरवेल, ऑस्‍कर वाइल्‍ड के जीवन, कृतित्‍व और वैचारिक यात्राओं की पड़ताल करते हैं, मैस्‍कुलिन दंभ से भरे अंग्रेज शासन के प्रतिकार में गांधी के ‘नारीगत’ औज़ारों की ताकत के भारी असरकारी नतीजों की व्‍याख्‍या करते हैं, सभी में गागर में सागर वाले इंटेलेक्‍चुअल रिगर के मोहक विचारस्‍केप्‍स हैं!

ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रैस ने 1983 में किताब छापी थी, पेपरबैक 1988 में आया, और 2008 तक चौबीस इम्‍प्रेशंस छप चुके हैं, ज़ाहिर है अभी भी लोग लगातार उस किताब को खोज और खरीद रहे हैं. इसी के साथ एक बार फिर इसका दु:खद अहसास भी होता है कि शोभा दे को खोज-खोजकर छापनेवाले हिंदी प्रकाशकों को द इंटिमेट एनेमी जैसे किताबरत्‍न को छापने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई (होती या होगी?).

वर्डप्रैस पर किताब की एक बेसिक समीक्षा है दिलचस्‍पी रखनेवाले अगर एक नज़र मारना चाहें..

5 comments:

  1. जल्द ही मिलने पर मैं भी पढूंगा

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  2. जानकारी और लिंक देने के लिए शुक्रिया।

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  3. आँख खोलते रहें! शुक्रिया!

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  4. आशीष नंदी की "द इंटिमेट एनेमी" का मूल पाठ—

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  5. भारत के लोग अंग्रज़ी में निकृष्ट सृजनात्मक साहित्य ही रच सकते हैं। लेकिन हमारे देश में समाजिक विज्ञानों की भाषा अंग्रेज़ी ही बनी हुई है। मृणाल पांडे ने भारतीय स्त्रीवादियों पर उचित टिप्पणी की है। इतिहासबोध पत्रिका(अप्रैल, 2005) में कहीं टिप्पणी थी कि इस देश के अधिकांश इतिहासकार आज भी अंग्रेज़ी के ग़ुलाम है और अकादमिक भूलभुलैया में ही रास्ता ढूंढते नज़र आते हैं।


    बहरहाल, आशीष नंदी (আশীষ নন্দী) के ईमेल का यूज़रनेम है reasonbuster और मेलबॉक्स नेम हैं सीएसडीएस.इन, सीएसडीसदेहली.ऑर्ग, और जीमेल.कॉम।

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