Tuesday, April 14, 2009

मिक्‍स्‍ड सिंगल्‍स..

पता नहीं कैसी भूख होती है मन में क्‍या हाहाकार होता है कि चढ़ता है एकदम बुखार, निकालकर खंगालने लगते हैं पुराने काग़ज़ किताब के बंडल, हड़बड़ाये फ़ोन पर पूछते हैं वह कौन तो किताब थी क्‍या जिरह थी, भाई? मित्र अचकचाया जवाब देता है वह सैलून में दाढ़ी बनवा रहा है, या बैंक से निकलकर गैराज जा रहा है, क्षमा चाहता है समझ नहीं पा रहा किस सिलसिले में किस जिरह की बात हो रही है, हाय-हाय में झुंझलाया मन इस सड़क और उस गली में खोजता गुम होता है जिसे पाकर जाने कैसे तो धूप की आग कम जायेगी कि मन की गुत्थियां नयी गांठों में अझुरायेगी, फिर अम्‍मां को कहने का मौका बनेगा कि मां सिर मत खाओ अभी, देख रही हो कैसे कहां अटका अड़ा हूं, धनबाद भइय्या सम्‍भाल लेंगे और चाचा की बीमारी को लेकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं, और मैं डॉक्‍टर के पास गया था वो वही कहते हैं कि समय से सोया करो वक़्त पर खाया, कौन नयी बात बतायी, लेकिन तुम चिन्‍ता मत करो, मां, इन दिनों सब ठीक है, और ईश्‍वर की दया रही तो रंजु भी बच्‍चों को लेकर घर लौट आयेगी, पिछली मर्तबा बात हुई थी तो हंसते हुए कह रही थी ताज्‍जुब नहीं करता कि वह अबतक पागल नहीं हुई? सचमुच तुम्‍हारी बहू बच्‍ची है मां, लेकिन मालूम नहीं दोस्‍त, बैंक के झमेलों का क्‍या किया जाये, जब से नौकरी गई है हरामियों ने नाक में दम कर दिया है, सोचता हूं सबकुछ छोड़कर कुछ दिनों के लिए पहाड़ भाग जाऊं, या कोई तो और वाजिब जगह कि कितने सारे सवाल हैं मन में कि कुछ थोड़ा तो समझ लेना चाहता हूं, कि झोले में कुछ कपड़े डाल चढ़ भी गया था रात की रेल में, फिर काफी समय अन्‍यमनस्‍क गुज़रा होगा एक भलेमानस दीखे, पूछा उनसे भाईसाहब जानते हैं यह रेल किधर जाती है? कुछ शर्माये भले आदमी ने जवाब दिया जानते होते तो रेल में क्‍यों होते, मैं बहुत अचकचाया पर तब कितनी तो देर हो चुकी थी, और सवाल चुकते कहां हैं रंजु, लेकिन हम कभी साथ बैठकर ठीक-ठीक से बात करेंगे और एक दिन सब अच्‍छा हो जायेगा, लू शुन और चेख़ोव की रचनाओं में न होता हो तो भी क्‍या, मैं तुमसे वादा करता हूं, हां!

(ऊपर लू शुन का एक वुडकट)

5 comments:

  1. बात आज सीधी चली आई, खोपड़ी में ऐसी घुसी बैठी है शायद कभी निकलेगी भी नहीं। शायद कहीं फ्रीक्वेंसी मिल रही है। कहीं सितार के तार झंकृत हो उठे हैं। मुझे कह रहे हैं, मूढ़ उठ, तू भी बजा, भैरवी का वक्त हो चला है।

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  2. तुसी ग्रेट हो सर जी...अपने अंदाज के माहिर ....दुनिया से परे....

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  3. बस यह देखने के लिए कि इस कंप्यूटर से यहां हिंदी में लिखा जा सकता है या नहीं।

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