Apr 17, 2009

इट्स नॉट रियली दैट इज़ी..

बहुत समय से पास पड़ी थी इतने वक़्त बाद अब जाकर तीसेक पन्‍नों से गुज़रा हूं और गुज़रते हुए सन्‍न हो रहा हूं कि अच्‍छी स्‍कॉलरशिप भी क्‍या कैसा सेंसुअस संधान है! आखिर सचमुच क्‍या खाकर, और क्‍या पीते हुए जेकॅब बरखार्ट ने किताब- ‘द सिविलज़ेशन ऑफ़ रेनेसां इन इटली- लिखी होगी? ओह, अच्‍छा सिरजनहार होने की क्‍या कलाकारी ऊंचाइयां हैं? क्‍या रॉबर्ट ऑल्‍टमैन इस भेद को जानते थे, और इस भेद को जेब में लिये-लिये फ़ि‍ल्‍में बनाते थे? या हमसे दलिद्दर कलाकौतुककार चम्‍मच-कांटा लिये ऑल्‍टमैन के छप्‍पनभोगी दावत में पहुंचकर इस कलाकारी रहस्‍यवाद का साक्षात करके हांफने लगते थे? आखिर कैसे संभव है कि ‘मैश’, ‘मैकेबे एंड मिसेज़ मिलर’, ‘3 वीमेन’, ‘पोपाइ’, ‘विंसेंट एंड थियो’, ‘द प्‍लेयर’, ‘शॉर्ट कट्स’ जैसी विविध, बहुआयामी, परतदार, पेंचदार फ़ि‍ल्‍में एक ही फ़ि‍ल्‍मकार ने बनायी हो? और ‘नैशविल’? नब्‍बे की शुरुआत में कभी देखी थी और कल रात फिर देखते हुए ऑल्‍टमैन को सुन रहा था- ‘आई एम इज़ी’, ओह, आर यू? ओह, व्‍हॉट अ स्‍टंट? व्‍हॉट व्‍हॉट व्‍हॉट एन आर्टिस्टिक फीट! ब्रावो, आल्‍टमैन. एंड ग्रात्‍ज़्ये सिन्‍योर बरखार्ट!