Thursday, April 2, 2009

बिनासबुद्धि‍ छोहारालाल का बिनासचिंतन!

रहते-रहते मन कहां-कहां तो उड़ा जाता है. अभी हफ़्ता भर भी नहीं हुआ ऐसे लेखकीय उड़ाव-अलावों की हुमसते हुए हमने चर्चा की थी. उसके बाद पतनसील, भविस्‍स व अतीतसील मन और जाने कहां-कहां उड़ आया होगा, नहीं? माने जैसे कल स्‍वभाव की चर्चा की थी, तो स्‍वाभाविक है मन का स्‍वभाव उड़ना है, ससुर उड़ता फिरा ही होगा. मगर चूंकि मन है, और उससे ऊपर हमारा है तो ऐसा कैसे हो कि अपने स्‍वभाव के बंधाव में ही बहता फिरे? दुपहरिया में किसी भरियल पेड़ के नीचे मुंह पर गमछा डाले लेटे आंख मींच ले, और रात के अंधारे तानजीयर्स और इस्‍तांबुल के उजियारे उड़ ले? न, ऐन बखत दग़ा दे जाता है निरमोही, और हम हैं हारे हुए बटोही की तर्ज़ पर खुद को ओपी लय्यर की आवाज़ में गाता पाते हैं- ‘चैन से हमको कभी बेसरम तूने जीने ना दिया!’

रहते-रहते सोचते हैं कि उड़ गया है, फिर थोड़ा बखत गुज़र जाता है और देखते हैं कि कहां उड़ा है, हम सोच रहे थे उड़ा है मगर ई मऊग तो खूंटी से उड़के जाके खिड़किये पर बैठा है! और वो भी पड़ोस का नहीं, खुद ससुर अपने ही खिड़किये पर? हद है. रहते-रहते लेसकर काहे ऐसे करता है? मन? या मानवरतन जहानाबाद के जतन बिकासलाल? माने मां-बाप, आजा-आजी, नन्‍हकू और नगेसर कुछ सोचके न नाम दिये होंगे जी? कि माथा पर बिकासमुकुट पहिरा रहे हैं तो लरिका आगा का तरफ देखेगा, ‘मुर-मुर के ना देख’ वाला अंदाज़ में- मुरकु और तिलकुट खाने की जगह- चिरकुट सवाल नहीं पूछेगा! मगर आजकल आईना तक में भरोसा करना है मुश्‍कि‍ल है, फिर आदमी औलाद में भरोसा करेगा जी? बिकास नाम दे देने से कौनो गारंटी है कि वो बिकासेमान होगा? गड़हा और खदान नहीं? सोचते हैं तो सोचते हुए मन में पता नहीं कहां-कहां का जमा हुआ अवसाद सब उमड़ने लगता है. मन का भाव उमग-उमगकर कहता है हमको लिक्‍खो, हमको लिक्‍खो, लेकिन लिक्‍खेवाला हाथ है कि सरम में दरकने लगता है! सब कसूर बिकास का अबिकासी भाबबोध का है. हमारे तो अंग-अंग में ऐसा रोस फूट रहा है कि लरिका सामने पड़ जाये तो उसका नाम बदलकर बिनासलाल कर दें! नहीं, नहीं, जोकिन में नहीं बोल रहे हैं, जकीन नहीं हो तो आप खुदे देख लीजिये बिनासबुद्धि‍ छोहारालाल का गोर में कुल्‍हारी और हाथ का कलम में कोदाली मारेवाला बिनासचिंतन!

ऐसे माहौल में आपे बताइये आदमी ऑरिजनल लेखन कर सकता हे? डुप्‍लीकेटो?

4 comments:

  1. एक्के गो नीमन बात कह दिये तो मिजाज लहक गया ना? कि चोट चहूँप गया? :D

    ठीके ना पूछे हैं? बतलाने के बजाये बिनासबुद्धि कह के हरका रहे हैं जी? हम हड़केंगे? ’सुकरात’ हड़का था? चाहे प्लेटो? थालियो न हडकेगा. :)

    वइसे धन्यवाद ज्ञापन स्वीकार हो - एतना इमपौर्टेन्स तऽ दिये ना कम से कम. :)

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  2. रहते-रहते सोचते हैं कि उड़ गया है, फिर थोड़ा बखत गुज़र जाता है और देखते हैं कि कहां उड़ा है, हम सोच रहे थे उड़ा है मगर ई मऊग तो खूंटी से उड़के जाके खिड़किये पर बैठा है! और वो भी पड़ोस का नहीं, खुद ससुर अपने ही खिड़किये पर? हद है. रहते-रहते लेसकर काहे ऐसे करता है? मन?


    शब्द गश खा के लोट पोट रहे है और हँसी बल खा खाकर इन पंक्तियो को निहार रही है और बल खा रही है शब्द होश खो चुके है बहुत खुब ............

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  3. बहुत अच्छे हैं आप
    और बिकास जी भी
    परिचय के लिए शुक्रिया

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  4. याद कीजिये आपने हीं तो नहीं छोड़ दिया उन गलियों में खेलना कूदना और फेरे लगाना

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