Monday, May 4, 2009

एक अधूरी कहानी

भई, अच्‍छे-भले मेरे, बेहतर है असल काम की बात पहले ही साफ़ कर दी जाय कि बाद को पढ़नेवाले दिल पर न लगायें. तो काम की बात यह कि भरे-पूरे हमारे मन के सिवा बाकी आगे दर्ज़ जो किस्‍से का तार, सैरो-संसार होगा ‘सब कह देते मन हल्‍का हो जाता’ की हमारी नेक़नीयती के बावज़ूद होगा मगर अधूरा ही होगा. वही हो सकता था वही होगा. क्‍या है कि अच्‍छे-भले मेरे आपको एक राज़ की बात कहूं. मैंने कहानियां नहीं लिखीं लेकिन ज्यादातर जो पढ़ी हैं उसके इकहरेपने को, यक़ीन जानिये, खराब शराब की तरह ही हलक से नीचे उतारा है, और उसी अनुभव से कहता हूं कि कहानी क्‍या अपन उपन्‍यास के बरगद पर पर भी चढ़ते तो महत्‍वाकांक्षा की उलझावभरी सैकड़ों बेलों के विस्‍तार की फुनगी पर रचना के आखिर-आखिर में पहुंचकर कहने को यही बचता कि अच्‍छा, अब? आगे? अरे?.. माने मेरी लेखनी ऐसी पहुंची हुई नहीं कि जैसे इशारे करूं वहां-वहां फ़तह का झण्‍डा गाड़ आए मगर अपनी पूरी वल्‍नरेबिलिटी में आपके आगे ईमानदारी से स्‍वीकारता हूं कि तब भी मंशा यही रहती कि पढ़नेवाले के मन से एक सर्द आह उट्ठे और किरिच-किरिच होकर उसके अवचेतन में अरसे तक अटकी रहे, उलझे-अजाने रास्‍तों का कोई ऐसा सुरीला-कंटीला सफ़र जो मन में कैसी तो एक हुमस जगाये, एक ऐसी जिसकी ठीक-ठीक शिनाख्त करना तक मुश्किल हो!

सत्‍तर-सवा सौ के रसग्राहियों में ऐसा नहीं कि सब हमारी अपारम्परिकता के पारावार से चहकने लगेंगे, नहीं चहकेंगे. क्‍यों चहकेंगे, मेरे नेक़ अच्‍छे-भले, मुंह पर बसे पुराने का स्‍वाद ऐसे ही आसानी से थोड़े जाता है. जूता-चप्‍पल फेंके जाते हैं, कितने कपार फूटते हैं ज़ि‍न्‍दगियां चुक जाती हैं, पुरानी आदतें नहीं छूटतीं. होंगे, हमारा पैर खींचनेवाले ज़रूर होंगे, और इसका इशारा करने में उन्‍हें हर्ष होगा ही जिस रचना में स्‍थान-काल की एकता नहीं उसे वाजिब, पूरी रचना माना भी क्‍यों जाए? साहित्यिक हितचिन्‍ता में उठाये सवाल, ऐसे हितैषियों से मुझे शिकायत नहीं, दरअसल मैं तो चाहूंगा कि इसी बहाने ही सही कोई हमारे पैर खींचता रहे, भला आदमी थक जाये तो कुछ उन्‍हें दबा भी जाये मैं बुरा नहीं मानूंगा मगर रचनात्‍मकता को लेकर हमारे भीतर अगर कोई गहरी तक़लीफ़ है, हम किसी नये कोण की कोशिश कर रहे हैं, और हमारी कोशिश भले बहुत पकी हुई उम्‍दा कोशिश बनकर सामने न आ पावे, लेकिन इसी वज़ह से कि वह जानी-पहचानी परिपाटी का ग्रुप-फ़ोटो न बन रही हो, अलग हटकर कोई अपरिचित फाग कोई अपहचाना राग गा रही हो, भले लोग उसकी लंगी लगायेंगे, अपनी चिरपरिचित सरलधर्मिता के सुख के लिए मेरे रचनाधर्मी आग्रहों को आवारा, गैर-जिम्‍मेदार बतायेंगे तो माफ़ कीजिये, भाई मेरे, मैं गरदन नीची किये आपकी बेहुदगी सुनने का स्‍वांग करता भले दीखूं, उसे एक गुण्‍डे हल्‍ले से ज़्यादा कैसा भी महत्‍व नहीं ही दूंगा. माने अच्‍छे-भले भाई मेरे, रोज़मर्रा के भौतिक जीवन में स्‍थान-काल की एका निरापद नहीं बची, वह लगातार डिस्‍ट्रैक्‍शन के कलाइडिस्‍कोपिक बहुरंगी संसार में कैसे किस-किस तरह की तो लुकाछिपी खेलती चलती है, तब पूरेपन के आपके पिटे हुए सुखकारी डकार के लिए रचनाशीलता की नयी, अनसधी कोशिशों पर उसे आरोपित करना कैसा जघन्‍य अपराध होगा इसकी कल्‍पना से, आपको फर्क़ न पड़ता होगा मगर सच जानिये मैं तो सोचते हुए ही सिहरने लगता हूं. रचना अधूरी होगी एकदम अधूरी होगी (हमारे जीवन में इतना अधूरापन है) इस बाबत मेरे भीतर किसी शक की गुंजाइश ही नहीं. रियली.

फिर रचना के अधूरे बने रहने की अन्‍य वज़हें रहेंगी. ऐसी किसी संक्षिप्‍त रचना में तनाव की मूल एका का जो प्राथमिक स्‍थापत्‍य सहजापेक्षित है वही सिरे से नदारद होगा (थोड़ा जटिल खेल है न? बट जो है सो है, मेरे मन में आसान हुआ तो आगे उस आसानी में आपके आगे सजाकर रखूंगा, ऐसा भोला वादा कर सकता हूं, अगर ऐसे भोले वादों में आप भरोसा करते हों?). प्रेम होगा लेकिन वह प्रेम जैसा नहीं होगा, नायिका होगी लेकिन अपेक्षानुकूल नहीं होगी, मतलब कहानी की चारदीवारी होगी लेकिन छत के खपड़ैल नहीं होंगे कल्‍पना का खुला आसमान होगा..

रंजू मुंह बनाकर कहती है ओह, कैसी तो तुम टेढ़ी-मेढ़ी बातें करते हो कि सुननेवाला पहले ही कहानी से घबराकर आईपीएल क्रिकेट की तरफ निकल जाये, और फिर तुम बीस लोगों के बीच बैठे रहो अपनी रचनाधर्मिता का बेमतलब बेसुरा बजाते हुए! रसवर्षा कहां है मेरे राजकुमार? हॉलीवुड की इतनी फ़ि‍ल्‍में देखते रहते हो उनकी स्‍टोरीटेलिंग नहीं सीखते? व्‍हॉट अ होपलेस सकर यू आर!

ओ चुप करो, रंजू, कला के तीसरे क्षण में तैर रहा हूं, अभी मुझे डिस्‍टर्ब नहीं करो!

कला के इतने हरहराये लहरीले ज़ोरदार थपेड़े चढ़े आते हैं कि उनकी मार्मिक, गहनानुभूतियों में छितराया कभी लगता है जाने कहां कहां कहां कित्‍ती तो दूर निकल आया हूं कि रंजू की आवाज़ तक चार पहाड़ि‍यों के पार बस किसी फुसफुसाहट की शक्‍ल में महज़ कांपती-कांपती सी ही सुन पड़ती है. ऐसे कितने तो मौके आते हैं जब माथे पर इंचभर बाल और उनचास किलो वज़न की सींकदार लड़की भूले से भी मुझे डिस्‍टर्ब करना नहीं चाहेगी और मैं उससे बिना कहे तड़प-तड़पकर नज़रों से ऐलान करता फिरूंगा कि तुमसे डिस्‍टर्ब न होकर मैं कितना बोझिल और बोरिंग हो जाता हूं!

रंजू, माई स्‍वीटहार्ट, तुम्‍हारे इन पतले-छोटे-नाज़ुक होंठों को मैं चूम सकता हूं? विल यू फॉरगिव मी फॉर सच वॉयलेंस?

रंजू के पतले-छोटे-नाज़ुक होंठों को चूमने का ख़्याल अपने में बेसिकली ग़लत है. इतने पतले-महीन-नाज़ुक होंठों को कैसी भी सज़ा देना, वह फिर प्‍यार की ही क्‍यों न हो, वुड बी आउटराइट क्रिमिनल. हू सेज़ सो? अरे, मैं कह रहा हूं काफी नहीं? ओह, कैसे-कैसे लोगों के कैसे-कैसे तो सवाल.

नहीं, मैं रंजू के पतले-छोटे-नाज़ुक होंठ चूमना नहीं चाहता. न उसकी पलकें न ज़रा सा आगे को चढ़ी नाक. कुछ भी नहीं. सच्‍ची. स्‍पेयर मी द सेंसुऐलिटी. ठीक उसी क्षण मेरी नज़रों की उदासीनता पढ़कर रंजू उतनी ही गहरे उदास भी हो जायेगी (या वह महज़ मेरा इमैज़ि‍नेशन होगा?) तो उसकी पतली-पतली महीन उंगलियां अपनी आंखों पर धरकर मैं धीमे से आंखें मूंद लूंगा, फिर ऐसी दबी आवाज़ में सवाल करूंगा कि खुद मुझतक मेरी आवाज़ मुझे सुनाई न दे!

तुम्‍हें याद है, रंजू, स्‍कूल के पिछवाड़े जंगली जलेबी के झाड़ में भागते हुए कैसे तुम्‍हारा मन जादू से भर जाता था? गर्मियों के दिन एकदम भोर में आंख खुलने पर दिन जिस रंग में दिखता था, हवा जिस महक के साथ चेहरे पर उतरती थी? फरहत के भाई को ल्‍यूकेमिया हुआ था और अस्‍पताल में फरहत पागलों की तरह रोती रही थी और लौटते के रास्‍ते में दीना चाचा के लम्‍ब्रेटा की पीलियन पर बैठी फरहत का रोना याद कर कैसे तुम जार-जार रोने लगी थीं, याद है? अपने उस घिसे ओलिव ग्रीन लैंप की चालीस वॉट की घिसी पीली रौशनी में दीना चाचा देर रात तक लिखाई-पढ़ाई करते रहते और तुम उनींदे आंखें मलती उनके आगे आकर खड़ी हो जातीं कि दीना चाचा ने वादा किया था कि इतनी देर नहीं जगेंगे लेकिन वादों को नहीं निबाहने से किसका कितना नुकसान होगा इसकी दीना चाचा को एकदम परवाह नहीं, और ऐसे ही फरहत के भाई को ल्‍यूकेमिया नहीं हुआ, दीना चाचा को भी हो जायेगा जभी वे समझेंगे, मगर उनके समझने तक फिर बहुत देर हो चुकी होगी और संस्‍कृत के झा सर से अलग कभी भी भगवान न करे किसी के जीवन में ऐसी मुश्किल बीमारी आये, इतनी तक़लीफ़देह मौत और दीना चाचा के ऐसे अराजक जीवन में क्‍यों नहीं आयेगी भला, आयेगी ही आयेगी, और जब आयेगी फिर रंजू कितनी तो इस दुनिया में अकेली हो जायेगी और दु:ख में कितनी उसकी छाती फटेगी कि सांस लेना तक कैसा मुश्किल हो जायेगा इसको दीना चाचा ज़रा सा भी समझते हैं? और समझते हैं तो घिसे ओलिव ग्रीन लैंप की चालीस वॉट की घिसी पीली रौशनी में इतनी-इतनी देर तक उनके पढ़ने का कोई लॉजिक है? रंजू के लिए कैसा भी एक्‍सप्‍लनेशन? है? दीना चाचा के पास?

दीना चाचा वॉज़ क्‍वायट अ गाइ. एक वक़्त था कितनी तो वह तुम पर जान छिड़कते थे, नहीं? यू रिमेम्‍बर ऑल दैट? और अब महीनों-महीने निकल जाते हैं एंड यू डोंट इवन हियर अ वर्ड फ्रॉम हिम. रिले‍शंस आर रियली सम स्‍ट्रैंज बिज़नेस.

तुम दीना चाचा के बारे में कोई बकवास मत करो, प्‍लीज़, यह कहानी प्रेम और एक अधूरी नायिका के बारे में थी भूल गए?

(अधूरी)

6 comments:

  1. बहुत ही उलझी हुई कहानी और उससे भी अधिक उलझा हुआ पात्रों का जीवन!किन्तु जीवन सुलझा हुआ कब होता है। उलझना ही जीवन है या शायद उसे सुलझाने क प्रयास ही जीवन है।
    घुघूती बासूती

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  2. आप आप है सर जी......

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  3. badhiya!!

    Kuch cheeze jab tak na suljhe tabhee tak unkaa mulya hotaa hai.

    fir kya ye zarooree hai ki sab spaat aur suljha hee ho? It will be so boring

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  4. अच्छा तो आप जो लिखते हैं वह कहानी है...! वाह...! लिखिए-लिखिए...। जैसा चाहें लिखिए। पढ़ना तो पढ़ेगा ही। आप जो लिख रहे हैं।

    आपकी भूमिका से तो ईर्ष्या हो रही है।

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  5. there r times when i can't even write a comment over it, all so confused

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