Monday, June 29, 2009

सुहानी रात ढल चली ना जाने तुम कब..?

ना जाने तुम कब क्‍या? आगे शकील बदायूंनी ने लिखने को जो लिख दिया सवाल उठता है उस प्रकट के पीछे छिपे अभाववाद के भावों का आज असल पाठ क्‍या हो? ना जाने तुम कब आओगे? जाओगे? गिरोगे? गिराओगे? छत पर चढ़ोगे.. कुएं में कूदागे? लात खाओगे? सुहानी रात ढल चली, पता नहीं कहां ढल रही थी, लेकिन उसके बाद ना जाने तुम व्‍हॉट? जॉर्ज सिमेनॉन के इंस्‍पेक्‍टर मेगरे की बुढ़ौती के असमंजस में कर्त्तव्‍य-भावना का सवाल है सवाल सुलझाओगे, तस्‍वीर चमकाओगे, हमें किसी पार पहुंचाओगे? प्रभु? कि सब ससुर लालगढ़ की राह चहुंपाओगे, झंडा लहरवाओगे- सुहानी रात ढल चली, पता नहीं उसके पहले सांझ सुरेश के लिए या श्‍याम कुमार के लिए थी, शायद रही हो कुछ फीकी-फीकी, बुझी 1949 में, साठ साल बाद तुम, मालिक, कहां तक लंका फैलाओगे? तनिक राह आओगे? सुहानी रात ढल चली?

(मोंताज़ को बड़ाकार देखने के लिए उसपर क्लिकियाकर उसे नयी खिड़की में खोलें.)

Saturday, June 27, 2009

कहानी पुरानी..


सबर्ब पर एक छोटी कहानी क्‍या कहानी चढ़ाई है, ऐसे छायायी-चिचरायी खेलों में जिनकी दिलचस्‍पी हो, यहां नज़र मारें..

Friday, June 26, 2009

हाय रे ज़माना, ढहते शहर का फ़साना.. ?

मुंबई में मानसून की झड़ि‍यों को शुरू हुए आज यह तीसरा दिन है, और ध्‍यान दीजिए अभी झमाझम वाली बौछारें, मुसलधारें नहीं शुरू हुई हैं. महज़ झड़ि‍यां हैं ये, मासूम, झड़ी, जैसे बड़ी होती है मैंगलोर स्‍टॉल वाला मेंदू बड़ा नहीं, मगर हाय रे ज़माना वाले फ़साने शुरू हो गए हैं! सुबह ख़बर थी पूरब और पश्चिम को जोड़नेवाली हमारी अंधेरी का सबवे पानी के भराव की वजह से बंद कर दिया गया है, साढ़े नौ को घर से निकले हमारे एक परिचित हैं हाईवे के रास्‍ते पूरब से अंधेरी के पच्छिम किसी मीटिंग को अंजाम पहुंचाने निकले थे, रास्‍ते में फंसे रहे, साढ़े ग्‍यारह के करीब हारकर मीटिंग कैंसल किया और घर लौटे. एक दूसरे थे गोरेगांव पूर्व से मलाड पश्‍चि‍म अपने घर लौटना चाह रहे थे, फ़ोन पर बताया अभी आधे घंटे से गोरेगांव पुल में अटके पड़े हैं!

सात और आठ और नौ फ़ीसदी तरक्‍की के गानों के भोंपे बजते फिरते हैं, पता नहीं छिपाकर किसके घर घुसाके ये सारी तरक्‍की हो रही है! यहां एक महानगर में मासूम सी बरसात उतरती है और शहर, ससुर, उमगने के, राग मर्सिया गाने लगता है!

ओह सो नेकेड्ली, सो ओपेन..

अंग्रेजी में एक नयी पत्रिका बाज़ार में आई है. ताज़ा अंक के एक लेख में भारतीय शहर और उसके शहरियों के बारे में गौतम भाटिया कहते हैं- और बहुत ग़लत नहीं कहते हैं:

“The chaotic agglomeration of the Indian city also ensures the urban Indian remains entirely dissociated from public life and the rules of collective behavior. The absence of walkable space, parks, public libraries, places for meeting, street life or any activity of cooperative intent, makes the city merely an assortment of private houses and private institutions.

You move through life not as individuals, but as whole families, usurping family compounds, filling restaurants, occupying offices. A subspecies so self-centred, it is incapable of surviving outside the family, an urban pygmy, as it were.

आईटैलिक्‍स मेरे हैं. पत्रिका का नाम ‘ओपेन’ है. पूरा लेख पढ़ने के लिए पत्रिका की वेबसाइट पर यहां जा सकते हैं, 26 जून के अंक में तीसवें पेज़ पर यह लेख मिलेगा. चौंतीसवें पेज़ पर दुबई के बारे में भी एक दिलचस्‍प लेख है.

ओपेन का संपादन कभी आऊटलुक में रहे संदीपन देब कर रहे हैं. सैनिटी सक्‍स के नाम से अंग्रेजी में ब्‍लॉग चलानेवाले राहुल पंडिता भी पत्रिका में हैं. अच्‍छी ख़बर. 03 जुलाई वाले अंक में लालगढ़ से रिपोर्टिंग की है, पंद्रहवें पेज़ पर नज़र मारिये.

Thursday, June 25, 2009

किसी और के सपने में..

चेतन ऊंचाइयों की उड़ाई न होगी ऊब व असमंजस के चक्‍करदार घेरे होंगे रह-रहकर जाने क्‍या अंधेरे हैं कैसे गिर पड़े की उमेंठती गहरी गहराइयां होंगी. कभी रंग दिखता होगा- दूर, कभी और किसी और के सपने में देखा हो जैसे, कभी सुख सूझता होगा- पगलाये, अनजाने देश में किसी पुराने हमीं से टकरा गये हों जैसे.

बेमतलब तागों की बेमतबल बुनाइयां, उलझाइयां लेकर बैठूंगा किसी दिन, एक सिरे से एक के बाद दो के बाद तीन सब सिरे सझुराऊंगा, कांख शराब की बोतल दाबे किसी दिन मीनार तक चढ़ जाऊंगा, सब सब सब एक दिन खुद को सबकुछ बताऊंगा.

आह, जल जल गहरे अतल बेआवाज़ अपनी सासों पर सवार एक मछली नन्‍हीं जाने कहां से आयेगी चमकभरी आंखों देखेगी भरपूर एक बार, बच्चे की दीवानगी होती पढ़ लेता अपने इतराये कमीनेपन में क्‍यूंकर पढ़ सकूंगा वैसी मुस्‍कान मुस्‍काराएगी बिछलती देह लिये चुपचाप बगल से गुज़र जाएगी.

Wednesday, June 24, 2009

व्‍हॉट इज़ दिस? अरे?

"Under a new proposed Bill, the government is arming itself with the power to block websites without the right to be heard. Why is no one talking about it?"

हिन्‍दू में सेवंती निनान बता रही हैं, पूरी कहानी यहां पढ़ि‍ये.

हरियाली है, हुज़ूर, खज़ूर कहां है?

ठेले पर विद्या इस किफायत से बीन-बीनकर भिंडी उठा रही थी मानो चार भिंडी ज्यादा खरीद लेगी तो सब्‍जीवाले को कहीं ज्यादा बिक्री से हार्ट अटैक न आ जाये! कितनी देर तक ये औरत भिंडी छांटती रहेगी?- वाइफ के पीछे खड़े संजय ने जम्‍हाई ली और महज़ अपना ध्‍यान भटकाने की गरज से सब्‍जीवाले से पूछा- लहसुन नहीं है?

बोरी का बैंगन एक टोकरे में पलटते हुए सब्‍जीवाले ने जवाब दिया- लहसुन साथवाले ठेले पर है, अंकल!

अंकल सुनते ही संजय का मन पिचके बैंगन सा हो गया। अंकल पुकारा जाना संजय को अच्‍छा नहीं लगता। बस में अभी आज ही कंडक्‍टर के कहने पर कि वसाहत के तीन नहीं, चार रुपये होते हैं, अंकल? संजय ने पलटकर वार किया था ठीक है, रखो अपने चार रुपये लेकिन इसके लिए अंकल बोलने की ज़रूरत नहीं है! अभी सब्‍जीवाले के लिए भी ऐसा ही कोई तीखा जवाब सोच रहे थे कि लहसुन देखते-देखते बाजू के काले खज़ूर पर नज़र पड़ी और मन कन्‍फ्यूज हो गया। कितना समय हो गया खज़ूर खाये हुए? आदमी रात-दिन चक्‍की में पिसता है खज़ूर खाने का मामूली शौक तक न पूरा कर सके फिर क्‍या मतलब है आठ घंटों की देह-तोड़ाई का?

चीखना भूलकर संजय ने बालसुलभ बेचैनी में सब्‍जीवाले को पुकारा- भई, भिंडी के साथ किलो भर खज़ूर भी तौल देना! फिर विद्या की फटी आंखें दिखीं तो अपने को संभालकर बोले- किलो रहने दो, ऐसा करो, आधा तौल दो?

विद्या भिंडी गिनना भूल गई, गीले बम की तरह फुत्‍कारती फुसफुसाती बोली- तुम्‍हारा दिमाग चल गया है? हम आधा किलो खज़ूर खरीदेंगे?

रास्‍ते भर संजय चुप रहा लेकिन घर पहुंचते ही फैल गया। विद्या के हाथ बांधकर घर चलाने की आदत को वह पहले भी बचकाना, बैकवर्ड समझा करता था, आज बेहूदा साबित करने पर तुल गया। दबाकर खरचने की दबी हुई दर्जनों कहानियां थीं, आज सब खुलकर सामने आने लगीं!

संजय- गिनकर तुम्‍हारे यहां रोटियां बनती होंगी, हमारे यहां आम के दो फांक सजाकर थाली नहीं परसते थे! भरी बाल्‍टी होती थी और सबके बीच में धरी होती थी। जिसे जितना मन करता था खाता था, गिनता नहीं था! मैं किसलिए काम करता हूं, बताओ? अपनी मर्जी से खज़ूर तक नहीं खा सकता फिर क्‍या फ़ायदा?

विद्या (भीतर के कमरे में आंख पर पल्‍लू धरे)- मुझे खा लो फिर चैन पड़ेगा! पिछले महीने नया मोबाइल किन पैसों से खरीदे थे? पैसा बचाती हूं किसके लिए? मैके मनीऑर्डर करती हूं?

संजय- लेकिन कितना समय हो गया खज़ूर खाये! आधे किलो खज़ूर से तुम्‍हारी गृहस्‍थी उजड़ जाती? थोड़े से खज़ूर के लिए सबके सामने डिस्‍कस कर रहे थे कितना गंदा लग रहा था!

विद्या (चीखते हुए)- लेकिन जीत फिर किसकी हुई? खाओ खज़ूर और बनो दारासिंग!

संजय- उस पावभर खज़ूर की तरफ मुझे देखना भी नहीं है!

बहस की झोंक में संजय ने कह तो दिया लेकिन मन में इच्‍छा यही हो रही थी कि विद्या अपना रोना-धोना बंद करे तो वह खज़ूर एक प्‍लेट में डालकर टीवी के सामने बैठे। सचमुच कितना समय हो गया था खज़ूर खाये!

Monday, June 22, 2009

हाथ पर कुछ अरजेंट फुटकर बौद्धिक नोट्स..

हाथी के दिखाने के दांत होते हैं वैसे ही आदमी के चलाने के होते हैं. हाथ. कंधे से लगे होते हैं. कभी-कभी चलाता है बाकी के समय दर्शनीय संत्रास में उद्वि‍ग्‍न होता रहता है हाथ धोये या हाथ से खुद को धो ले. सोचने लगिए तो इट्स वेरी फन्‍नी कि ह्यमैनिस्‍ट, स्‍ट्रेटिजिस्‍ट, सोलोइस्‍ट, कॉलमनिस्‍ट, कम्‍यूनिस्‍ट का लोग टैग टांकते रहते हैं, किसी को हैंडिस्‍ट या हाथीइस्‍ट पुकारने की माया नहीं जगती? स्‍ट्रैंज.

लेकिन मज़े की बात, इस हाथ का ही कमाल है गंजे हुए ट्रैफिक में फंसा आदमी बरबस भूल जाता है वह कौन है क्‍यों है, जहां खड़ा है क्‍यों खड़ा है, एक मतलबी दुनिया में बेमतलब के सवाल बचे रहते हैं मतलब ढूंढता मन मलिन और देह गायब हो जाता है. कहने का मतलब मन और देह के गायब होने के बीसियों घटनाएं रोज़ घटती रहती हैं, लेकिन हाथ कंधे से खिसककर कहीं और पहुंच गए हों का मामला अभीतक प्रकाश में नहीं आया है. दूसरी महत्‍वपूर्ण नोट करनेवाली बात है हाथ आदमी के ही होते हैं हाथी के नहीं. हाथी के सूंड़ होती है. वैसे ही जैसे कुत्ते की दुम. कुत्ता गरज पड़ते ही दुम हिलाता है आदमी हाथ. इससे कुत्ते की भक्ति और आदमी की औकात उद्घाटित होती है.

ऑस्‍ट्रेलिया से लेकर अंडमान तक और टैक्‍सास से लेकर टिपरियागंज तक अबतक हर कहीं आदमी के हाथ होने के ठोस प्रमाण मिलते रहे हैं. भूगोल और समय में जहां-जहां आदमी पहुंचा है, पीछे-पीछे उसके हाथ के कारामाती क़ि‍स्‍से पहुंचे हैं. 1492 में कोलम्‍बस नाव से उतरते ही अमरीका की ज़मीन पर हाथ उठाकर चीखा था, 1942 के भारत छोड़ो वाली लड़ाई में मंड़ई ओझा बलियाटिक ज़मीन पर खड़े-खड़े बिना चीखे़ हाथ छोड़े थे और दोनों ही देशों में रक्‍तरंजित इतिहास रच गया था. जबकि औरतों के ऊपर चीख़नेवाली बात और रक्तव्‍यंजनाएं भले लागू होती हों, इतिहास सिरजने वाली बात लागू नहीं होती. दर्जनों उदारहण हैं औरतों ने किस तरह इतिहास की धारा बदल दी, मगर वह धारा आंखें मटकाकर बदली थीं, हाथ का इस्‍तेमाल साज-सिंगार में हो रहा था. इससे इतर एक बहुत बड़ी आबादी उन औरतों की थी, जैसाकि मशहूर कनैडियन महिला इतिहासकारा सूसन रिचर्ड्स बताती हैं, जो साज-सिंगार करने की ख्‍वाहिश भले रखती हों, हाथ का इस्‍तेमाल कर सिर्फ़ खाना बनाने में पा रही थीं! फिर आरमीनिया, तुर्केजान, नऊनिया और हजारीबाग़ जैसे क्षेत्र की औरतें थीं जो हाथ से खाना बनाते-बनाते गाना गाने का भी हूनर रखती थीं!

‘बालम, तोरा मन लूट लिये जाऊंगी, बहुतै तोहे बहलाऊंगी, सैंया हाथै न आऊंगी!’ जैसे गानों में दैहिक उद्दीपन के जिस संवेदी-तत्‍व की चर्चा है, वे यही हाथ हैं. कंधे से लगे रहते हैं. जैसे बिल्‍ली दूध से. हिन्‍दी का ब्‍लॉगर इंटरनेट कनेक्‍शन से. हिन्‍दी का साहित्‍यकार अपनी पौने पांच सौ की रीडरशिप से. मानवरतन हाथधन का यही क्‍लांतकारी चित्र होगा जिसने कालजयी उपन्‍यासकार गुलशन नन्‍दा को अपनी कालजयी कृति ‘नया ज़माना’ लिखने को मजबूर कर दिया, और नन्‍दा जी का ज़माना हाथ आते ही बाबू प्रमोद चक्रवर्ती धरमेंदर के साथ नया फ़साना शूट करने पर मजबूर हुए, और इतने सारे बहानों के बन जाने पर आनन्‍द बक्षी जी को भी सुरूर में किशोर कुमार जी के मुंह में मग़रूर गाना ठेलना पड़ा ‘दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं?’ कहने का मतलब गुलशनजी नन्‍दा और आनन्‍दजी बक्षी ही नहीं, हाथ की लीला भी अपरम्‍पार है.

हाथ की सफ़ाई का मुहावरा इसी हाथ से बना है. अलबत्ता कानपुर के कान्‍यकुब्‍जी ब्राह्मण हाथ के साफ़ रहने पर जिस तरह जोर देते हैं और चेन्‍नई जैसे पानीमार शहर पहुंचकर भी दिन में तीन बार नहाने की जो बेहूदा बचकानी ज़ि‍द पेले रहते हैं- वह और विश्रामपुर के ईंट-गारे का मज़दूर जिस साफ़ हाथ की बात करता है में ज़मीन-आसमान का फर्क़ है. यह अलग बात है कि कानपुर के कान्‍यकुब्‍जी ब्राह्मण और विश्रामपुर के ईंट-गारे के मज़दूर के भौतिक जीवन में अब विशेष फर्क़ नहीं बचा. एक बंगाली सुकन्‍या से मेरे संबंध इसी हाथ की बिना पर टूट गये. आमतौर पर लड़कियां मुंह को लपकती हैं वह हरामख़ोर हमेशा मेरा हाथ भींचकर ‘कतो दारुण किन्‍तु!’ की करुणामयी होने लगती. मैं सहमने लगा था कि बदकारा खांटी बंगला से उछलकर कहीं ऐसा न हो ‘शोले’ के खांटी खड़ी बोली में कूदकर कहे- ‘ये हाथ मुझे दे दो, ठाकुर?’

इससे पहले कि करुणाकारा सुकुमारा ऐसा कुछ करती, मैंने ही किया. हाथ की जगह उसे एक लात दिया, हाथ बचा लिया. इसीके बाद से जनमानस में वह मशहूर मुहावरा लोकप्रिय है- ‘हाथों के भूत लात से मान जाते हैं.’

हाथ पर और भी बहुत सारी बातें हैं हाथ से जिन्‍हें काफी देर तक और दूर तक लिखते भी रहा जा सकता है लेकिन अभी मेरे हाथ बझे हैं.

पुनश्‍च: कुछ अपरिचित, अनाचारी जो अभीतक मेरा अन्‍तरंग तो क्‍या बहिरंग भी नहीं जान सके सड़सठ की रीडरशिपवाली दुनिया में दुश्‍प्रचार करते हैं कि मैं जो हूं दिमागी आदमी हूं दिमाग की खाता हूं. सरासर ग़लत है. आदमी पता नहीं कैसा हूं मगर खाता हाथ की ही हूं!

(ऊपर की फ़ोटो: नेशनल ज्‍यॉग्राफ़ि‍क से साभार)

Sunday, June 21, 2009

भर-भर घर..

घर में पड़े-पड़े चट गया हूं. चार दिनों से इन तंग दीवारों के बीच क़ैद हूं और अब लगता है मेरी खुद की सांसें आपस में टकरा रही हैं. देह भी पिटी आवाज़ में शिकायत करता है कहीं बाहर टहलाओ, भाई, हाथ-पैर चलवाओ? तुम्‍हारी संगत में लगता है अलेंदे से उलट गयी अर्जेंटीना हो रहे हैं? चिढ़कर देह को कुहनीयाता हूं, ज़्यादा बौद्धिकता मत ठेलो, साले, सांस हमारी उखड़ रही है और कांख आप रहे हो!

दरअसल देह का कसूर नहीं. कसूर घर का है. दीवारों पर पलस्‍तर की हालत सुनील शेट्टी के चेहरे पर सुरैया के गाने चिपकाने सी हो रही है, किताबें अपनी किस्‍मत को रो रही हैं कि हमारी हालत अच्‍छी तो अब कहीं नहीं रही, मगर तुम्‍हारी छुवनों में तो तीस साल की शादी वाला बेग़ानापन घुस गया है! नसीबवाले घर होंगे जिनकी त्‍वचा पर पॉल गागां और प्रियंका चोपड़ा की अदायें सहलती होंगी, अपने यहां सबके सहमने के लिए मैंने इसके, उसके, और फिर बाकी सब तरह के बिल टांक दिये हैं. तकिये तरसते हैं कि उनके सजने के लिए एक क़ायदे की बिस्‍तर हो. बिस्‍तर तरसता है कि उसके बिछने की जगह हो. घर तरसता है कि वह घर जैसी जगह में हो. नाम पुकारे जाने पर धड़ल्‍ले से आगे आकर अपना परिचय दे सके, सत्रह बुरकों के पीछे जड़ा-गड़ा हिचकियां न भरता रहे कि जेठ जी घर से बाहर निकल जायें उसके बाद हम बाथरुम जायें!

चार दिनों से बंद हूं तंग हूं अलग बात है, सच्‍चाई यह है ग़लत शादी की तरह यह घर हमेशा से मेरी जान खाती रही है. पूछो क्‍यों हमारे हिस्‍से आई तो हरामख़ोर का चेहरा उतर जाता है! अबे, किसी और के गले जाकर नहीं बंध सकती थी, समूचे चॉल में ‘कथा’ के नसीर की तरह एक हमीं शरीफ़ मिले कि अपने मोह में उलझाकर हमारे कृशकाय पर लतरकुमारी होकर लटक लीं? चलो, एक मर्तबे हर किसी से ग़लती होती है, हमसे भी हुई हमने भाव दे दिया मगर बेहयाकुमारी अबतक लटकी हो? हमारी सुकुमार शहरयार संवेदना का ज़रा लिहाज़ किया होता, संसार की कला को हमारी कितनी दरकार है की पुकार समझी होतीं, किसी कुएं में जाकर कूद पड़ी होतीं इतना समझने के लिए मादाम क्‍यूरी का विज्ञान और रॉकेट साइंस संधान समझने की ज़रूरत थी? बाप ने पैदा किया था, माथे में हरकत ला सके साथ थोड़ी इतनी बुद्धि पैदा नहीं कर सके थे?..

गुस्‍से में दिमाग़ एकदम खौरिया रहा है. तबीयत हो रही है घुमाकर ससुर एक भरपूर लात लगायें. लेकिन कहां लगायें? लगाने भर को भी साली पहले मुनासिब जगह तो निकले? एक ज़रा सी जगह निकली थी तो देख रहा हूं घर में काम करनेवाली छोरी ने मेरी सीनाजोरी में उसे हवाई चप्‍पल सजाने का शो-केस बना दिया है!

जनवैया भाई लोगों से सुनते हैं बीजिंग में घर की किल्‍लत है टोकियो में आदमी घर में नहीं रहता, आदमी में घर का निवास है, मगर सच पूछिये तो मेरे लिए सब परिलोक की कथायें हैं. बीजिंग और टोकियो में अंड़सहट होगी मगर आदमी आदमी की तरह देह फैला सके की सहुलत भी ज़रूर होगी.. मैं तो पिछले चार दिनों से फंसा हुआ हूं और चाह रहा हूं घर का एक ऐसा हिस्‍सा आये जिसपर लात फेंक सकूं, लेकिन हक़ीक़त यह है, लात के रास्‍ते दूसरी चीज़ें आ जा रही हैं, घर पर फेंक सकूं ऐसा हिस्‍सा लात की रेंज में नहीं आ रहा!

सात खसमों को खाकर हज को चली की तरह हरामख़ोर के पीछे पक रहा हूं, खौलते तेल में पका सकूं ऐसी मेरी किस्‍मत नहीं सज रही.

पता नहीं किस बेहूदगी के आलम में कुंदनलाल सहगल ने ‘एक बंगला बने न्‍यारा’ गाया था- घर नहीं चढ़ रहा है अलग बात है- सहगज का गीतकार हाथ चढ़ता तो कहता ससुर, लिरिक्‍स बदलो पहले! बंगला न्‍यारा की जगह घर हमारा, स्‍पेशली, कंप्‍लीटली, होलहार्टेडली हमारा नहीं लिख सकते थे?

अल्‍ला मेघ दे के बाद पानी कौन दे?..

Thursday, June 18, 2009

सात फ्रेम में सुख..



ऊपर तीसरा है, कोमलाकार विचार-उद्गार बाबू अरुण वर्मा के हैं, बाकियों पर नज़र मारने के लिए यहां चटकाईये..

क्‍या कहते हो कवर?..




किताबों के कवर पर कभी पामुक के लिखे चंद नोट्स सजाये थे, आज इन चारेक कवरों को देखकर फिर उसकी याद हो आई.. किताब पढ़ी नहीं है, फिलहाल किताब लिखनेवाले की उन्‍नत पंजाबी-मुसलमानी देह ही देखता रहा हूं. एक, दो, तीन, चार समीक्षाएं हैं पहले वही पढ़ लूं..

Wednesday, June 17, 2009

सड़क पर धूप और छत पर धेनु..

धेनु छत पर खड़ी है. और क़ायदे से मुझे मतलब नहीं होना चाहिये मगर जाने क्‍यों है कि हो रहा है. बिला-वजह फहराया-घबराया लड़की को ललकारता हूं- धेनु, फिर छत पर खड़ी हो! बीस मर्तबा मना किया है भागकर छत मत जाया करो लेकिन, धेनुआ, तू कान देती नहीं है? लड़की छिनककर जवाब देती है, ‘हम दोनों’ के देवालंद वाला आंख है कि बट्टन? खिड़की में खड़े हैं और इनको छत लौका रहा है? और धेनु हमरी दीदिया के नाम है, हमरा रेनु है, बूझे? अब आगे बोलिये!

आंखों पर हाथ की टेक से मैं धूप छेकता हूं- धेनु, मुझे दु:खी मत करो, छत से उतर आओ, जब तक छत पर रहोगी चिन्‍ता में तुम्‍हारे साथ हम छत पर उलझे रहेंगे जबकि बासी कचौड़ी और जाने कौन चीज का साग था खाकर वैसे ही रात को नींद नहीं आई है और सुबह से तीन बार दतुअन कर चुके हैं लेकिन मन का खटास गया नहीं है और तुम्‍हें छत पर देखकर फिर चिन्‍ता हो रही है!

- बड़ अज्‍जब अमदी हैं, जी? हम खिड़की में हैं तब्‍बो जबरदस्‍ती हमको छत्‍ते चढ़ा रहे हैं!

- तुम रेनु हो लेकिन तुमको धेनु बुला रहे हैं, ठीक है, ठीक है, मालूम है पलटकर जवाब देना जानती हो, लेकिन जो जानना चाहिये कि छत पर कैसा-कैसा उल्‍टा काम होता है, तुम्‍हारी जैसी चूनाबुद्धि के लिए मुनासिब ठिकाना नहीं है सो नहीं समझोगी!

- चूनाबुद्धि काहे बोले? क्‍या मतलब हुआ चूनाबुद्धि पहिले उसको समझाइए!

- लेकिन तब से चिचिया रहे हैं चिन्‍ता में हमको कंकाल बना दोगी, छत से नहीं उतरोगी? कौनो खबर है पिछलका साल सोनापुर के दीना काका के छत पर क्‍या हुआ था? और उसके साढ़े चार साल पहले मनोहरा मौसी के छत पर? कौन गजनलीला, क्‍या खेला हुआ था कोई खबर है? तबसे कह रहे हैं बबुनी, बुतरी, उतर आओ, दुलरकी, कोई वजह होगी मगर तुम बूझ रही हो?

- चूनाबुद्धि का पहिले मतबल बताइये!

- धेनुआ, तू आती है नीचे, कि झोंटा खींचके हम खुद नीचे उतारें?

- जाइये, अंगना में इमली सुखा रही है धेनु दीदी झोंटा संवारिये कि कबिता-कहानी का भासा में पुकारिये, हम रेनु हैं, हमको धेनु-धेनु मत बोलिये?

- मैंने चिढ़कर छत पर खड़ी लड़की को ‘मार खाकर रोई नहीं’ की निराला नज़रों से देखा, ध्‍यान बंटाने के लिए जेब के चिल्‍लर पैसों को गिनने लगा कि पता चले मेरे नहाने जाने के दौरान मनोज ने कितने का नुकसान किया है, नुकसान तो जो था सो था पता नहीं लौंडे ने अपने हाथ का लिखा एक उल्‍टा-सीधा प्रेमपत्र मेरी जेब में क्‍यों छोड़ दिया था? मैं समझता था लौंडा मेरे मोबाइल से हलवाई की कंपार्टमेंटल फेल लड़की को एसएमएस करता है मगर यह तो फुलस्‍केल प्रेमपत्र वाला ज़ेहादी समर्पण है, गली में जाने किसकी थी एक साइकिल लुढ़की पड़ी थी, मैं साबुत था मगर किसी भी क्षण लुढ़क ही सकता था, धूप चढ़ रही थी, और लड़की अभी भी वहीं छत पर निर्लज्‍ज जमी थी!

इस बार मैंने धेनु से मनौव्‍वल की- कभी बात सुन लिया करो, धेनु. इतनी धूप पड़ रही है फिर मेरी तबीयत ठीक नहीं है, अंदर वाले कमरे में उघारे बदन टेबल पंखा के सामने बैठूंगा, फिर तुम अच्‍छी धेनु की तरह मेरे लिए बेल का शरबत बनाकर लाओगी, लाओगी न?

- हमको चूनाबुद्धियो बुलाइये और हम आपका बास्‍ते बेल का सरबतो बनायें? दीदी का संगे आंख-मटक्‍का खेलिये, हम रेनु हैं हमको रेनु ही बुलाइये, हं!

काफी कोशिश के बाद मैंने एक खट्टी डकार ली, और सहारे के लिए ढहती दीवार का सहारा लिया.

Tuesday, June 16, 2009

गिरइनी में उड़ान..कहां, केने?..

कैसे तो दिन बीत रहे हैं? बारिश भी है कि नहीं ही आ रही है. बहुत दिनों बाद कल प्रियंकर से बात हुई तो वह छूटते ही मचलकर बोले कि हमारे शहर में तो आई है- मन सूखा गड्ढा बना हुआ है लेकिन मौसम की गड़ही में मेंढक-मदन फुदकने लगे हैं! बहुत दिनों से अटकी हुई कविता की साइकिल बदले बयार में शायद फिर मुसलाधार बनकर बरसने लगे? मैं अकिंचन सुनता रहा सन्‍न धीमी आंच में दहकता रहा. कोलकोता में मौसम बदल गया की उमग में डूबा कवि-हृदय एक मर्तबा इतना तक नहीं सोच पा रहा कि मुंबई में अभी भी लगी हुई है, तहलका ऊपर से और आग लगाकर सन्‍नीपातावस्‍था बना रही है, और पीरहरन पालीवाल से इतना तक कहते नहीं बन रहा कि मध्‍याक्षर से निकलकर ककहरे की ओर कूच करो? क्‍या खाकर, और क्‍या पीकर आखिर आदमी अब मित्रों से बात करे? मन के शोलों पर ज़रा सी भीगी छींट की आस तक न बने फिर किसलिए करे? ग्‍लोबल वॉर्मिंग में मौसम बदला हो सिर्फ़ इतना ही कहां हुआ है, लोग भी बहल गए हैं! बस मुंबई का मौसम ही है जो मचलने से बच रहा है. यह कहना ज़्यादा उचित होगा कि मसल रहा है. अब ऐसे में अस्‍वाभाविक थोड़े है कि मेरे जैसा पहुंचा हुआ भी सोचने पर मजबूर हो जाये कि कैसे तो दिन बीत रहे हैं?

और बारिश है कि नहीं ही आ रही है. विचार भी कहां आ रहे हैं. एक समय था पारावार था, दायें-बायें हाहाकार था अब आलम है कि पिद्दीभर तक नहीं आ रहा. मैंने भी ज़ि‍द में तय कर लिया है कि ठीक है, न आओ, ससुर, हम मरे नहीं जा रहे, इस दरमियान हम भारत का संविधान पढ़ लेंगे, तुर्ग्‍येनेव, पुश्किन का जहान पढ़ लेंगे.. मगर सच्‍चायी है होम ऑव द जेंट्री में मन लग नहीं रहा! लुकास मूदीस्‍सन और काओ हैंबरगर जैसे कुछ नये फ़ि‍ल्‍मकारों की खबर हुई तो देख रहा हूं कि उसमें भी बहल नहीं पा रहा? कैतेरीन ब्रिला की ‘मोटी लड़की’ और ‘सैक्‍स इज़ कॉमेडी’ जैसी फ़ि‍ल्‍मों से बहलने का तो सवाल ही नहीं उठता. अलबत्‍ता घी में और आग की तरह यह बात ज़रूर हुई कि अचक्‍के में जापान के पुरनिया फ़ि‍ल्‍मकार मिकियो नारुसे की दो फ़ि‍ल्‍में देखीं- ‘घुमंतु बादल’ और ‘एक व्‍याहता का जीवन’ और सोचकर चटक-चटकता रहा कि हद है, ससुर, नारुसे साहब ’69 में दिवंगत हुए और हमें अबतक इस मीठे-चोट खिलाते मोहब्‍बत की खबर नहीं थी?..

लेकिन सवाल यह भी है कि आदमी आखिर किस-किस की कहां तक खबर रखे? कितना सोचे? आज पता चला हमारी एक मित्र हैं सुबह-सुबह ऑफिस के लिए तैयार होते हुए आग लगाकर मोहतरमा ने आत्‍महत्‍या की एक भोली कोशिश की और फिर चूंकि कोशिश भोली और भोथर थीं, अपनी कोशिश की हार से बिना शरमाये मित्र मुस्‍कराती काम पर भी निकल गईं. मित्र को तो नहीं ठहरवा सकता था लेकिन, खुद, मैं ठहरकर इस अप्रत्‍याशित अनाचार की सोचना चाह रहा था, ईरान में चुनाव हुए हैं पदमसिंह पाटिल के मर्डरवाला मामला है जिसमें सब जानते हैं हमारे समाज में पहुंची हुई हस्तियों का कुछ नहीं बिगड़ता फिर भी सोचना चाहता हूं, बखूबी यह भी समझते हुए कि घंटा, सीमा है, नहीं सोच सकूंगा? माथे पर टंगा बारिश का मसला तो है ही.. सचमुच, कैसे तो दिन बीत रहे हैं!

(ऊपर फोटो: हैंबरगर की फ़ि‍ल्‍म 'द ईयर माई पैरेंट्स वेंट ऑन वेकेशन' का पोस्‍टर)

Tuesday, June 2, 2009

खुजाने के सुख..

कुछ खास नहीं. बस यही कि बहुत गर्मी पड़ रही है. मन की नहीं सब देहवाली भौतिक, मौसमी गर्मी ही है. मन तो ससुर एकदम ठंडा पड़ा है. ठीक चुनाव के बाद के भाजपायी कार्यकर्ता की तरह अन्‍यमनस्‍क महसूस कर रहा है? कि वामपंथी नेताओं-सा बुरकाबंद भुनभुन कर रहा है कहना मुश्किल है क्‍योंकि इस मन:स्थिति मिलान के लिए राष्‍ट्रीय खबरों पर जिस तरह नज़र होनी थी, रख नहीं पाया हूं. रावि पासवानजी भी कहां तीन का तेरह कौनवाली पसेरी खेल रहे हैं, और रोते-रोते खेल रहे हैं या न मिलने आनेवालों को मां-बहन की गालियां बुदबुदाते खेल रहे हैं अपने को आइडिया नहीं है. और न होना शायद अच्‍छा ही है. यूं भी इन दिनों गरीब घरों में जैसी गर्मी उतर रही है आइडियाओं के आने से खामख़्वाह गर्मी बढ़ेगी ही मन कहां बहलेगा? सचमचु बहुत पड़ रही है. गर्मी. अभी दस मिनट पहले लगा था शायद थोड़ा राहत हुई है, फिर फट पता चल गया नहीं रिलीफ़ नहीं रार ही है. और पंखे को मैक्सिमम स्‍पीड में जितना घुमाना संभव था, और जो जाने किस ज़माने में ऑलरेडी घुमा चुकने के बाद जाने किस ज़माने से बेहद बेमतलब बने रहने के बाद अब करने को वही बचा है जो ऐसे बेईमान मौसम में कोई भी सभ्‍य आदमी पागलपन से बचने के लिए करेगा, और वही मैं भी कर रहा हूं- माने सहज उत्‍साह से देह खुजा रहा हूं. और अच्‍छा तो लग ही रहा है. गर्मी से डिस्‍ट्रैक्‍शन भी है ही. हालांकि यह भी सच है कि देह खुजाते-खुजाते, और घबराहट में फिर नाखुन चबाते-चबाते मन अचानक कुत्‍ता-कुत्‍ता-सा भी फ़ील करने लग रहा है. फिर नींद भी उड़ी हुई है ही. अब पता नहीं नींद गर्मी की वजह से उड़ी है याकि देह खुजाते रहने के मोह के ईर्ष्‍याभाव से बुरा मान सौतभाव में उड़ गई है.

ख़ैर. मतलब ओवरऑल वही चिर-परिचित सुहानी फिजा है. बाकी तो पहले कहा ही था ऐं-वैं ही है. वही कह रहा था ब्‍लॉग पर आने की वजह नहीं थी. शायद देह खुजाते-खुजाते थक गया था, या चलते पंखे में लाठी फंसाकर उसे तोड़ने के पागलपने से बच जाने का मन में भोलापन रहा होगा जो वहां से दिमाग निकालकर ब्‍लॉग पर ले आया हूं. वर्ना सच कहूं लगभग महीने भर से नहीं लिख रहा था देख रहा हूं अपनी सेहत पर घंटा कोई असर नहीं पड़ा है. दूसरों पर पड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता. वह तो पहले भी न लिखने से ज़्यादा मेरे लिखने पर पड़ा करता था. मानो मुंह में जिसे ककड़ी समझकर काटा काटे थे वह अबे, करैलेवाला स्‍वाद क्‍यों दे रही है टाइप. सहज काव्‍य कुमुद-कुसुम सी बहती-महकती चित्‍त पर क्‍यों नहीं छा रही टाइप. एनीवे, इधर-उधर देखकर अच्‍छा लग रहा है. माने अच्‍छा ही है कि बाहर ऐसी भायं-भायं गरम हवायें हैं और यहां वही ‘मुझको अपने गले लगा लो, ऐ मेरे सिपाही’ वाला पुरनका सुरीला सुरबहार सजा हुआ है. ब्‍लॉग भी ससुर पालतू बीवी की तरह वहीं पड़ा हुआ है! एक इंच ही इधर-उधर हुआ होता? व्‍हॉट अ लेटडाऊन. होगा नहीं. ऐसे ब्‍लॉगिंग थोड़े बदलेगी. कहां से बदलेगी? मैं बदल पा रहा हूं? या यह गरमी ही ज़रा सा इधर से उधर सरक पा रही है? या खुद को खुजाते-खुजाते आपको खुजाने लगूं इतना ही कहां हो पा रहा है?