Tuesday, June 2, 2009

खुजाने के सुख..

कुछ खास नहीं. बस यही कि बहुत गर्मी पड़ रही है. मन की नहीं सब देहवाली भौतिक, मौसमी गर्मी ही है. मन तो ससुर एकदम ठंडा पड़ा है. ठीक चुनाव के बाद के भाजपायी कार्यकर्ता की तरह अन्‍यमनस्‍क महसूस कर रहा है? कि वामपंथी नेताओं-सा बुरकाबंद भुनभुन कर रहा है कहना मुश्किल है क्‍योंकि इस मन:स्थिति मिलान के लिए राष्‍ट्रीय खबरों पर जिस तरह नज़र होनी थी, रख नहीं पाया हूं. रावि पासवानजी भी कहां तीन का तेरह कौनवाली पसेरी खेल रहे हैं, और रोते-रोते खेल रहे हैं या न मिलने आनेवालों को मां-बहन की गालियां बुदबुदाते खेल रहे हैं अपने को आइडिया नहीं है. और न होना शायद अच्‍छा ही है. यूं भी इन दिनों गरीब घरों में जैसी गर्मी उतर रही है आइडियाओं के आने से खामख़्वाह गर्मी बढ़ेगी ही मन कहां बहलेगा? सचमचु बहुत पड़ रही है. गर्मी. अभी दस मिनट पहले लगा था शायद थोड़ा राहत हुई है, फिर फट पता चल गया नहीं रिलीफ़ नहीं रार ही है. और पंखे को मैक्सिमम स्‍पीड में जितना घुमाना संभव था, और जो जाने किस ज़माने में ऑलरेडी घुमा चुकने के बाद जाने किस ज़माने से बेहद बेमतलब बने रहने के बाद अब करने को वही बचा है जो ऐसे बेईमान मौसम में कोई भी सभ्‍य आदमी पागलपन से बचने के लिए करेगा, और वही मैं भी कर रहा हूं- माने सहज उत्‍साह से देह खुजा रहा हूं. और अच्‍छा तो लग ही रहा है. गर्मी से डिस्‍ट्रैक्‍शन भी है ही. हालांकि यह भी सच है कि देह खुजाते-खुजाते, और घबराहट में फिर नाखुन चबाते-चबाते मन अचानक कुत्‍ता-कुत्‍ता-सा भी फ़ील करने लग रहा है. फिर नींद भी उड़ी हुई है ही. अब पता नहीं नींद गर्मी की वजह से उड़ी है याकि देह खुजाते रहने के मोह के ईर्ष्‍याभाव से बुरा मान सौतभाव में उड़ गई है.

ख़ैर. मतलब ओवरऑल वही चिर-परिचित सुहानी फिजा है. बाकी तो पहले कहा ही था ऐं-वैं ही है. वही कह रहा था ब्‍लॉग पर आने की वजह नहीं थी. शायद देह खुजाते-खुजाते थक गया था, या चलते पंखे में लाठी फंसाकर उसे तोड़ने के पागलपने से बच जाने का मन में भोलापन रहा होगा जो वहां से दिमाग निकालकर ब्‍लॉग पर ले आया हूं. वर्ना सच कहूं लगभग महीने भर से नहीं लिख रहा था देख रहा हूं अपनी सेहत पर घंटा कोई असर नहीं पड़ा है. दूसरों पर पड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता. वह तो पहले भी न लिखने से ज़्यादा मेरे लिखने पर पड़ा करता था. मानो मुंह में जिसे ककड़ी समझकर काटा काटे थे वह अबे, करैलेवाला स्‍वाद क्‍यों दे रही है टाइप. सहज काव्‍य कुमुद-कुसुम सी बहती-महकती चित्‍त पर क्‍यों नहीं छा रही टाइप. एनीवे, इधर-उधर देखकर अच्‍छा लग रहा है. माने अच्‍छा ही है कि बाहर ऐसी भायं-भायं गरम हवायें हैं और यहां वही ‘मुझको अपने गले लगा लो, ऐ मेरे सिपाही’ वाला पुरनका सुरीला सुरबहार सजा हुआ है. ब्‍लॉग भी ससुर पालतू बीवी की तरह वहीं पड़ा हुआ है! एक इंच ही इधर-उधर हुआ होता? व्‍हॉट अ लेटडाऊन. होगा नहीं. ऐसे ब्‍लॉगिंग थोड़े बदलेगी. कहां से बदलेगी? मैं बदल पा रहा हूं? या यह गरमी ही ज़रा सा इधर से उधर सरक पा रही है? या खुद को खुजाते-खुजाते आपको खुजाने लगूं इतना ही कहां हो पा रहा है?

8 comments:

  1. तभी हम कहे की सर जी कहाँ गायब है इत्ते दिनों..?कही अज्ञात वास में कोई एक ठो उपन्यास लिखने तो नहीं निकल लिए

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  2. लम्बे समय बाद आपकी पोस्ट पढने को मिली

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  3. sir ji,
    Khoob likha hai aapne.
    Aur ek baat bata doo aapke nahi likhne se disturb hota hoo na ki likhne se. So khujate khujate kuchh na kuchh parosate rahiye.

    thanks

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  4. आप आप ही हैं...लिखते हैं तो कमाल करते हैं...आपको पढना एक सुखद अनुभव है...गर्मी वाकई तेज पड़ रही है और ये मुंबई की उमस भरी गर्मी उफ़...खोपोली फिर भी ठंडा है...देखना चाहेंगे?
    नीरज

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  5. ये गर्मी आपको कुछ अधिक ही सताती है. पिछले साल की कुछ पोस्टें भी इसी की तस्दीक करती हैं.

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  6. गोस्टबस्टर जी के पास आपका पूरा रिकॉर्ड है .

    जरूरत होने पर उनसे सम्पर्क किया जा सकता है . मतलब इमर्जेंसी में तस्दीक के लिए .

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  7. yahi hum soch rahe the
    kahaan the aap pichle ek mahine se. hum to intezaar kar rahe the hamare shahar mein film ka poster lagega
    pramod singh
    presents
    khujane ke sukh.;..

    par yahan to blog par padh kar hi santosh karna pad raha hai

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  8. अरे भईया आप तो गज़बे कर दिए हो.....तभी हम सोचे कि हमसे अच्छा काहे को नहीं लिखा जा रहा है...ऊ तो आप कर रहे हो....अब हम का करें बताओ.....बताओ ना....ठीक है तब हम तनी सुस्ता लेत हैं....!!
    एक बात अऊर कि आजहे हम पहली बार इन्हां आये थे....बहुते अच्छा लगा....सच....तो का झूठ बोलने खातिर हम इन्हां इतना सब लिखते.....??

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