Tuesday, June 16, 2009

गिरइनी में उड़ान..कहां, केने?..

कैसे तो दिन बीत रहे हैं? बारिश भी है कि नहीं ही आ रही है. बहुत दिनों बाद कल प्रियंकर से बात हुई तो वह छूटते ही मचलकर बोले कि हमारे शहर में तो आई है- मन सूखा गड्ढा बना हुआ है लेकिन मौसम की गड़ही में मेंढक-मदन फुदकने लगे हैं! बहुत दिनों से अटकी हुई कविता की साइकिल बदले बयार में शायद फिर मुसलाधार बनकर बरसने लगे? मैं अकिंचन सुनता रहा सन्‍न धीमी आंच में दहकता रहा. कोलकोता में मौसम बदल गया की उमग में डूबा कवि-हृदय एक मर्तबा इतना तक नहीं सोच पा रहा कि मुंबई में अभी भी लगी हुई है, तहलका ऊपर से और आग लगाकर सन्‍नीपातावस्‍था बना रही है, और पीरहरन पालीवाल से इतना तक कहते नहीं बन रहा कि मध्‍याक्षर से निकलकर ककहरे की ओर कूच करो? क्‍या खाकर, और क्‍या पीकर आखिर आदमी अब मित्रों से बात करे? मन के शोलों पर ज़रा सी भीगी छींट की आस तक न बने फिर किसलिए करे? ग्‍लोबल वॉर्मिंग में मौसम बदला हो सिर्फ़ इतना ही कहां हुआ है, लोग भी बहल गए हैं! बस मुंबई का मौसम ही है जो मचलने से बच रहा है. यह कहना ज़्यादा उचित होगा कि मसल रहा है. अब ऐसे में अस्‍वाभाविक थोड़े है कि मेरे जैसा पहुंचा हुआ भी सोचने पर मजबूर हो जाये कि कैसे तो दिन बीत रहे हैं?

और बारिश है कि नहीं ही आ रही है. विचार भी कहां आ रहे हैं. एक समय था पारावार था, दायें-बायें हाहाकार था अब आलम है कि पिद्दीभर तक नहीं आ रहा. मैंने भी ज़ि‍द में तय कर लिया है कि ठीक है, न आओ, ससुर, हम मरे नहीं जा रहे, इस दरमियान हम भारत का संविधान पढ़ लेंगे, तुर्ग्‍येनेव, पुश्किन का जहान पढ़ लेंगे.. मगर सच्‍चायी है होम ऑव द जेंट्री में मन लग नहीं रहा! लुकास मूदीस्‍सन और काओ हैंबरगर जैसे कुछ नये फ़ि‍ल्‍मकारों की खबर हुई तो देख रहा हूं कि उसमें भी बहल नहीं पा रहा? कैतेरीन ब्रिला की ‘मोटी लड़की’ और ‘सैक्‍स इज़ कॉमेडी’ जैसी फ़ि‍ल्‍मों से बहलने का तो सवाल ही नहीं उठता. अलबत्‍ता घी में और आग की तरह यह बात ज़रूर हुई कि अचक्‍के में जापान के पुरनिया फ़ि‍ल्‍मकार मिकियो नारुसे की दो फ़ि‍ल्‍में देखीं- ‘घुमंतु बादल’ और ‘एक व्‍याहता का जीवन’ और सोचकर चटक-चटकता रहा कि हद है, ससुर, नारुसे साहब ’69 में दिवंगत हुए और हमें अबतक इस मीठे-चोट खिलाते मोहब्‍बत की खबर नहीं थी?..

लेकिन सवाल यह भी है कि आदमी आखिर किस-किस की कहां तक खबर रखे? कितना सोचे? आज पता चला हमारी एक मित्र हैं सुबह-सुबह ऑफिस के लिए तैयार होते हुए आग लगाकर मोहतरमा ने आत्‍महत्‍या की एक भोली कोशिश की और फिर चूंकि कोशिश भोली और भोथर थीं, अपनी कोशिश की हार से बिना शरमाये मित्र मुस्‍कराती काम पर भी निकल गईं. मित्र को तो नहीं ठहरवा सकता था लेकिन, खुद, मैं ठहरकर इस अप्रत्‍याशित अनाचार की सोचना चाह रहा था, ईरान में चुनाव हुए हैं पदमसिंह पाटिल के मर्डरवाला मामला है जिसमें सब जानते हैं हमारे समाज में पहुंची हुई हस्तियों का कुछ नहीं बिगड़ता फिर भी सोचना चाहता हूं, बखूबी यह भी समझते हुए कि घंटा, सीमा है, नहीं सोच सकूंगा? माथे पर टंगा बारिश का मसला तो है ही.. सचमुच, कैसे तो दिन बीत रहे हैं!

(ऊपर फोटो: हैंबरगर की फ़ि‍ल्‍म 'द ईयर माई पैरेंट्स वेंट ऑन वेकेशन' का पोस्‍टर)

3 comments:

  1. sahi hai ji...sahi hai
    aapki post padhkar achchha laga :)

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  2. बारिश है कि नहीं ही आ रही है. विचार भी कहां आ रहे हैं.

    माशा-अल्लाह ये लाईलाज बीमारी तो सारे ब्लगरो को धरी हुयी है !!

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  3. Barish ki berukhi se to hum bhi aahat hai. Dilli me Barish hai par hoti nai hai. Aapki yah post to man ko bhigo gaya.

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