Friday, June 19, 2009

चौबीस घंटे फिर..






5 comments:

  1. जीवन तो समझ जायेगा-हम समझे जब न!!

    स्कैच बढ़िया बनायें हैं शीशा में बैठ के..जय हो!!

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  2. अरे यहाँ तो एक ही जीवन को चौबीस तरह से जीते जीते परेशान भी हैं और जीवन के खूबसूरत पलों को सामने देख भी रहे हैं....देखकर मस्त भी हैं और फ्रस्टेट भी पर इसका अपना मज़ा है पोस्ट अच्छी लगी भाई।

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  3. वाह गुरुदेव, इन दिनों आपकी कूची का कमाल तो देखते बनता है।

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