Monday, June 22, 2009

हाथ पर कुछ अरजेंट फुटकर बौद्धिक नोट्स..

हाथी के दिखाने के दांत होते हैं वैसे ही आदमी के चलाने के होते हैं. हाथ. कंधे से लगे होते हैं. कभी-कभी चलाता है बाकी के समय दर्शनीय संत्रास में उद्वि‍ग्‍न होता रहता है हाथ धोये या हाथ से खुद को धो ले. सोचने लगिए तो इट्स वेरी फन्‍नी कि ह्यमैनिस्‍ट, स्‍ट्रेटिजिस्‍ट, सोलोइस्‍ट, कॉलमनिस्‍ट, कम्‍यूनिस्‍ट का लोग टैग टांकते रहते हैं, किसी को हैंडिस्‍ट या हाथीइस्‍ट पुकारने की माया नहीं जगती? स्‍ट्रैंज.

लेकिन मज़े की बात, इस हाथ का ही कमाल है गंजे हुए ट्रैफिक में फंसा आदमी बरबस भूल जाता है वह कौन है क्‍यों है, जहां खड़ा है क्‍यों खड़ा है, एक मतलबी दुनिया में बेमतलब के सवाल बचे रहते हैं मतलब ढूंढता मन मलिन और देह गायब हो जाता है. कहने का मतलब मन और देह के गायब होने के बीसियों घटनाएं रोज़ घटती रहती हैं, लेकिन हाथ कंधे से खिसककर कहीं और पहुंच गए हों का मामला अभीतक प्रकाश में नहीं आया है. दूसरी महत्‍वपूर्ण नोट करनेवाली बात है हाथ आदमी के ही होते हैं हाथी के नहीं. हाथी के सूंड़ होती है. वैसे ही जैसे कुत्ते की दुम. कुत्ता गरज पड़ते ही दुम हिलाता है आदमी हाथ. इससे कुत्ते की भक्ति और आदमी की औकात उद्घाटित होती है.

ऑस्‍ट्रेलिया से लेकर अंडमान तक और टैक्‍सास से लेकर टिपरियागंज तक अबतक हर कहीं आदमी के हाथ होने के ठोस प्रमाण मिलते रहे हैं. भूगोल और समय में जहां-जहां आदमी पहुंचा है, पीछे-पीछे उसके हाथ के कारामाती क़ि‍स्‍से पहुंचे हैं. 1492 में कोलम्‍बस नाव से उतरते ही अमरीका की ज़मीन पर हाथ उठाकर चीखा था, 1942 के भारत छोड़ो वाली लड़ाई में मंड़ई ओझा बलियाटिक ज़मीन पर खड़े-खड़े बिना चीखे़ हाथ छोड़े थे और दोनों ही देशों में रक्‍तरंजित इतिहास रच गया था. जबकि औरतों के ऊपर चीख़नेवाली बात और रक्तव्‍यंजनाएं भले लागू होती हों, इतिहास सिरजने वाली बात लागू नहीं होती. दर्जनों उदारहण हैं औरतों ने किस तरह इतिहास की धारा बदल दी, मगर वह धारा आंखें मटकाकर बदली थीं, हाथ का इस्‍तेमाल साज-सिंगार में हो रहा था. इससे इतर एक बहुत बड़ी आबादी उन औरतों की थी, जैसाकि मशहूर कनैडियन महिला इतिहासकारा सूसन रिचर्ड्स बताती हैं, जो साज-सिंगार करने की ख्‍वाहिश भले रखती हों, हाथ का इस्‍तेमाल कर सिर्फ़ खाना बनाने में पा रही थीं! फिर आरमीनिया, तुर्केजान, नऊनिया और हजारीबाग़ जैसे क्षेत्र की औरतें थीं जो हाथ से खाना बनाते-बनाते गाना गाने का भी हूनर रखती थीं!

‘बालम, तोरा मन लूट लिये जाऊंगी, बहुतै तोहे बहलाऊंगी, सैंया हाथै न आऊंगी!’ जैसे गानों में दैहिक उद्दीपन के जिस संवेदी-तत्‍व की चर्चा है, वे यही हाथ हैं. कंधे से लगे रहते हैं. जैसे बिल्‍ली दूध से. हिन्‍दी का ब्‍लॉगर इंटरनेट कनेक्‍शन से. हिन्‍दी का साहित्‍यकार अपनी पौने पांच सौ की रीडरशिप से. मानवरतन हाथधन का यही क्‍लांतकारी चित्र होगा जिसने कालजयी उपन्‍यासकार गुलशन नन्‍दा को अपनी कालजयी कृति ‘नया ज़माना’ लिखने को मजबूर कर दिया, और नन्‍दा जी का ज़माना हाथ आते ही बाबू प्रमोद चक्रवर्ती धरमेंदर के साथ नया फ़साना शूट करने पर मजबूर हुए, और इतने सारे बहानों के बन जाने पर आनन्‍द बक्षी जी को भी सुरूर में किशोर कुमार जी के मुंह में मग़रूर गाना ठेलना पड़ा ‘दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं?’ कहने का मतलब गुलशनजी नन्‍दा और आनन्‍दजी बक्षी ही नहीं, हाथ की लीला भी अपरम्‍पार है.

हाथ की सफ़ाई का मुहावरा इसी हाथ से बना है. अलबत्ता कानपुर के कान्‍यकुब्‍जी ब्राह्मण हाथ के साफ़ रहने पर जिस तरह जोर देते हैं और चेन्‍नई जैसे पानीमार शहर पहुंचकर भी दिन में तीन बार नहाने की जो बेहूदा बचकानी ज़ि‍द पेले रहते हैं- वह और विश्रामपुर के ईंट-गारे का मज़दूर जिस साफ़ हाथ की बात करता है में ज़मीन-आसमान का फर्क़ है. यह अलग बात है कि कानपुर के कान्‍यकुब्‍जी ब्राह्मण और विश्रामपुर के ईंट-गारे के मज़दूर के भौतिक जीवन में अब विशेष फर्क़ नहीं बचा. एक बंगाली सुकन्‍या से मेरे संबंध इसी हाथ की बिना पर टूट गये. आमतौर पर लड़कियां मुंह को लपकती हैं वह हरामख़ोर हमेशा मेरा हाथ भींचकर ‘कतो दारुण किन्‍तु!’ की करुणामयी होने लगती. मैं सहमने लगा था कि बदकारा खांटी बंगला से उछलकर कहीं ऐसा न हो ‘शोले’ के खांटी खड़ी बोली में कूदकर कहे- ‘ये हाथ मुझे दे दो, ठाकुर?’

इससे पहले कि करुणाकारा सुकुमारा ऐसा कुछ करती, मैंने ही किया. हाथ की जगह उसे एक लात दिया, हाथ बचा लिया. इसीके बाद से जनमानस में वह मशहूर मुहावरा लोकप्रिय है- ‘हाथों के भूत लात से मान जाते हैं.’

हाथ पर और भी बहुत सारी बातें हैं हाथ से जिन्‍हें काफी देर तक और दूर तक लिखते भी रहा जा सकता है लेकिन अभी मेरे हाथ बझे हैं.

पुनश्‍च: कुछ अपरिचित, अनाचारी जो अभीतक मेरा अन्‍तरंग तो क्‍या बहिरंग भी नहीं जान सके सड़सठ की रीडरशिपवाली दुनिया में दुश्‍प्रचार करते हैं कि मैं जो हूं दिमागी आदमी हूं दिमाग की खाता हूं. सरासर ग़लत है. आदमी पता नहीं कैसा हूं मगर खाता हाथ की ही हूं!

(ऊपर की फ़ोटो: नेशनल ज्‍यॉग्राफ़ि‍क से साभार)

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