Wednesday, June 24, 2009

हरियाली है, हुज़ूर, खज़ूर कहां है?

ठेले पर विद्या इस किफायत से बीन-बीनकर भिंडी उठा रही थी मानो चार भिंडी ज्यादा खरीद लेगी तो सब्‍जीवाले को कहीं ज्यादा बिक्री से हार्ट अटैक न आ जाये! कितनी देर तक ये औरत भिंडी छांटती रहेगी?- वाइफ के पीछे खड़े संजय ने जम्‍हाई ली और महज़ अपना ध्‍यान भटकाने की गरज से सब्‍जीवाले से पूछा- लहसुन नहीं है?

बोरी का बैंगन एक टोकरे में पलटते हुए सब्‍जीवाले ने जवाब दिया- लहसुन साथवाले ठेले पर है, अंकल!

अंकल सुनते ही संजय का मन पिचके बैंगन सा हो गया। अंकल पुकारा जाना संजय को अच्‍छा नहीं लगता। बस में अभी आज ही कंडक्‍टर के कहने पर कि वसाहत के तीन नहीं, चार रुपये होते हैं, अंकल? संजय ने पलटकर वार किया था ठीक है, रखो अपने चार रुपये लेकिन इसके लिए अंकल बोलने की ज़रूरत नहीं है! अभी सब्‍जीवाले के लिए भी ऐसा ही कोई तीखा जवाब सोच रहे थे कि लहसुन देखते-देखते बाजू के काले खज़ूर पर नज़र पड़ी और मन कन्‍फ्यूज हो गया। कितना समय हो गया खज़ूर खाये हुए? आदमी रात-दिन चक्‍की में पिसता है खज़ूर खाने का मामूली शौक तक न पूरा कर सके फिर क्‍या मतलब है आठ घंटों की देह-तोड़ाई का?

चीखना भूलकर संजय ने बालसुलभ बेचैनी में सब्‍जीवाले को पुकारा- भई, भिंडी के साथ किलो भर खज़ूर भी तौल देना! फिर विद्या की फटी आंखें दिखीं तो अपने को संभालकर बोले- किलो रहने दो, ऐसा करो, आधा तौल दो?

विद्या भिंडी गिनना भूल गई, गीले बम की तरह फुत्‍कारती फुसफुसाती बोली- तुम्‍हारा दिमाग चल गया है? हम आधा किलो खज़ूर खरीदेंगे?

रास्‍ते भर संजय चुप रहा लेकिन घर पहुंचते ही फैल गया। विद्या के हाथ बांधकर घर चलाने की आदत को वह पहले भी बचकाना, बैकवर्ड समझा करता था, आज बेहूदा साबित करने पर तुल गया। दबाकर खरचने की दबी हुई दर्जनों कहानियां थीं, आज सब खुलकर सामने आने लगीं!

संजय- गिनकर तुम्‍हारे यहां रोटियां बनती होंगी, हमारे यहां आम के दो फांक सजाकर थाली नहीं परसते थे! भरी बाल्‍टी होती थी और सबके बीच में धरी होती थी। जिसे जितना मन करता था खाता था, गिनता नहीं था! मैं किसलिए काम करता हूं, बताओ? अपनी मर्जी से खज़ूर तक नहीं खा सकता फिर क्‍या फ़ायदा?

विद्या (भीतर के कमरे में आंख पर पल्‍लू धरे)- मुझे खा लो फिर चैन पड़ेगा! पिछले महीने नया मोबाइल किन पैसों से खरीदे थे? पैसा बचाती हूं किसके लिए? मैके मनीऑर्डर करती हूं?

संजय- लेकिन कितना समय हो गया खज़ूर खाये! आधे किलो खज़ूर से तुम्‍हारी गृहस्‍थी उजड़ जाती? थोड़े से खज़ूर के लिए सबके सामने डिस्‍कस कर रहे थे कितना गंदा लग रहा था!

विद्या (चीखते हुए)- लेकिन जीत फिर किसकी हुई? खाओ खज़ूर और बनो दारासिंग!

संजय- उस पावभर खज़ूर की तरफ मुझे देखना भी नहीं है!

बहस की झोंक में संजय ने कह तो दिया लेकिन मन में इच्‍छा यही हो रही थी कि विद्या अपना रोना-धोना बंद करे तो वह खज़ूर एक प्‍लेट में डालकर टीवी के सामने बैठे। सचमुच कितना समय हो गया था खज़ूर खाये!

5 comments:

  1. majdoori/mahangaee ke is jug mein aadha kilo khjoor kharidane ki baat crime hi to hai. Lekin khajoor, makai ke baal,Aam, lichi khaja aur morton choclate kharidane jaise chote crime har din kiye jane ki jaroorat hai. Last time Gorakhpur ke Arogya Mandir me khojoor khaya tha. Aaj dekhta hoo dilli me kahi mile to loonga. Sir ji achcha likha hai. Aapne.

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  2. मज़ा आ गया,
    सुंदर लेख बधाई हो,

    मियाँ बीवी की तकरार मे ,
    किसकी जीत किसकी हार.

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  3. दद्दा, सुबह सुबह आपकी यह पोस्ट पढ़ ली और भेजा भंड हो गया । हंसी और रूलाई एक साथ आई। गृहस्थी का ठेठ खट्टा-मीठा स्वाद मिला। हमारे इंदौर के रीगल सिनेमा के पुल पर आसपास के गांवों से आकर गरीब फालसे, करौंदे, जामुन और खिरनी बेचते हैं। मैं कभी फालसे, कभी खिरनी ले जाता हूं। मैं बच्चों से कहता हूं इनकी खुशबू भी लो और स्वाद भी चखो। आप जानते हैं एक बड़े लेखक ने तो अपनी कहानी बीच में ही लिखना छोड़ दिया था क्योंकि वह भूल गया था कि अमरूद की सुगंध कैसी होती है। पता नहीं कैसा तो जीवन है कि न ठीक से कुछ सूंघ पा रहे हैं और न ठीक से कुछ चख पा रहे हैं। आपकी यह पोस्ट छू गई । अब क्या घंटा काम होगा? कुछ मन का लिखने की गहरी इच्छा पैदा कर दी है इस पोस्ट ने।

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  4. बढ़िया खजूर खिलाया, लेकिन आमों का हाल इस साल बहुत ही बुरा है। दशहरी और लंगड़ा के नाम पर शनिवार को लाए एक-एक किलो इतने बेस्वाद कि अभी मंगल की रात तक आधे से ज्यादा पड़े थे।

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  5. kaun kankhajooraa khajoor naheen khaanaa chaahataa . par is maar-dhaad,bhaagam-bhaag, aur is budget-vatsal samay mein khaa sake tab to . behad sachchaa aur behad marma-sparshee chitra kheenchaa hai. rame rahen .

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