चेतन ऊंचाइयों की उड़ाई न होगी ऊब व असमंजस के चक्करदार घेरे होंगे रह-रहकर जाने क्या अंधेरे हैं कैसे गिर पड़े की उमेंठती गहरी गहराइयां होंगी. कभी रंग दिखता होगा- दूर, कभी और किसी और के सपने में देखा हो जैसे, कभी सुख सूझता होगा- पगलाये, अनजाने देश में किसी पुराने हमीं से टकरा गये हों जैसे. बेमतलब तागों की बेमतबल बुनाइयां, उलझाइयां लेकर बैठूंगा किसी दिन, एक सिरे से एक के बाद दो के बाद तीन सब सिरे सझुराऊंगा, कांख शराब की बोतल दाबे किसी दिन मीनार तक चढ़ जाऊंगा, सब सब सब एक दिन खुद को सबकुछ बताऊंगा.
आह, जल जल गहरे अतल बेआवाज़ अपनी सासों पर सवार एक मछली नन्हीं जाने कहां से आयेगी चमकभरी आंखों देखेगी भरपूर एक बार, बच्चे की दीवानगी होती पढ़ लेता अपने इतराये कमीनेपन में क्यूंकर पढ़ सकूंगा वैसी मुस्कान मुस्काराएगी बिछलती देह लिये चुपचाप बगल से गुज़र जाएगी.