Friday, June 26, 2009

ओह सो नेकेड्ली, सो ओपेन..

अंग्रेजी में एक नयी पत्रिका बाज़ार में आई है. ताज़ा अंक के एक लेख में भारतीय शहर और उसके शहरियों के बारे में गौतम भाटिया कहते हैं- और बहुत ग़लत नहीं कहते हैं:

“The chaotic agglomeration of the Indian city also ensures the urban Indian remains entirely dissociated from public life and the rules of collective behavior. The absence of walkable space, parks, public libraries, places for meeting, street life or any activity of cooperative intent, makes the city merely an assortment of private houses and private institutions.

You move through life not as individuals, but as whole families, usurping family compounds, filling restaurants, occupying offices. A subspecies so self-centred, it is incapable of surviving outside the family, an urban pygmy, as it were.

आईटैलिक्‍स मेरे हैं. पत्रिका का नाम ‘ओपेन’ है. पूरा लेख पढ़ने के लिए पत्रिका की वेबसाइट पर यहां जा सकते हैं, 26 जून के अंक में तीसवें पेज़ पर यह लेख मिलेगा. चौंतीसवें पेज़ पर दुबई के बारे में भी एक दिलचस्‍प लेख है.

ओपेन का संपादन कभी आऊटलुक में रहे संदीपन देब कर रहे हैं. सैनिटी सक्‍स के नाम से अंग्रेजी में ब्‍लॉग चलानेवाले राहुल पंडिता भी पत्रिका में हैं. अच्‍छी ख़बर. 03 जुलाई वाले अंक में लालगढ़ से रिपोर्टिंग की है, पंद्रहवें पेज़ पर नज़र मारिये.

7 comments:

  1. प्रमोदजी,
    ओपन मैगजीन का लिंक देकर आपने अच्छा किया, एक बाद पढने बैठा तो काफ़ी देर तक पुराने अंक भी पढ डाले। आपने जो अंश कोट किये हैं उनसे पूरा इत्तेफ़ाक है।
    भारत में हर व्यक्ति अपने घर की चारदीवारी में सरताज है और उसी टशन में जीना भी चाहता है। एक मित्र के साथ जब दिल्ली से नोएडा में घुसते ही कार की सीट बेल्ट की क्लिक सुनी तो वो हंस कर बोले, यहां कोई नहीं पकडता । क्या कीजियेगा? कलेक्टिव बिहेवियर नाम की कोई मुर्गी नहीं होती भारत में, बस कोई भी स्थिति हो हम धक्कों के सहारे ही पार पाना चाहते हैं।

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  2. धन्यवाद, मैं कुछ ढूँढ ही रहा था पढ़ने के लिए.

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  3. अच्छी जानकारी दी है।

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  4. अरे जीवन की निस्सारता पर प्रवचनी बाबाओं को सामूहिक रूप सुनते हैं ना लोग, परिवेश को सुधारेंगे कैसे?!

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  5. “The chaotic agglomeration of the Indian city also ensures the urban Indian remains entirely dissociated from public life and the rules of collective behavior..."

    कलेक्टिव बिहैवियर!!!

    इसकी पढाई के लिए सरकार कोई विश्वविद्यालय खोले. तब पढ़ लेंगे. अभी तो पूरा जीवन बाकी है. हम तो इस सिद्धांत पर चलते हैं कि; 'सीखने की कोई उम्र नहीं होती.'

    यही है हमारा कलेक्टिव बिहैवियर.

    सिद्धांत देश की खटिया खड़ी कर रहे हैं.

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  6. लिंक देने का शुक्रिया...बुकमार्क कर लिया है . वैसे सारे अनुशासन हीन ....विदेश जाते ही फौजियों की तरह अनुशासन में आ जाते है....

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