Monday, June 29, 2009

सुहानी रात ढल चली ना जाने तुम कब..?

ना जाने तुम कब क्‍या? आगे शकील बदायूंनी ने लिखने को जो लिख दिया सवाल उठता है उस प्रकट के पीछे छिपे अभाववाद के भावों का आज असल पाठ क्‍या हो? ना जाने तुम कब आओगे? जाओगे? गिरोगे? गिराओगे? छत पर चढ़ोगे.. कुएं में कूदागे? लात खाओगे? सुहानी रात ढल चली, पता नहीं कहां ढल रही थी, लेकिन उसके बाद ना जाने तुम व्‍हॉट? जॉर्ज सिमेनॉन के इंस्‍पेक्‍टर मेगरे की बुढ़ौती के असमंजस में कर्त्तव्‍य-भावना का सवाल है सवाल सुलझाओगे, तस्‍वीर चमकाओगे, हमें किसी पार पहुंचाओगे? प्रभु? कि सब ससुर लालगढ़ की राह चहुंपाओगे, झंडा लहरवाओगे- सुहानी रात ढल चली, पता नहीं उसके पहले सांझ सुरेश के लिए या श्‍याम कुमार के लिए थी, शायद रही हो कुछ फीकी-फीकी, बुझी 1949 में, साठ साल बाद तुम, मालिक, कहां तक लंका फैलाओगे? तनिक राह आओगे? सुहानी रात ढल चली?

(मोंताज़ को बड़ाकार देखने के लिए उसपर क्लिकियाकर उसे नयी खिड़की में खोलें.)

1 comment:

  1. बोरवेल में गिरोगे को कवर नहीं किये??

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