Friday, June 26, 2009

हाय रे ज़माना, ढहते शहर का फ़साना.. ?

मुंबई में मानसून की झड़ि‍यों को शुरू हुए आज यह तीसरा दिन है, और ध्‍यान दीजिए अभी झमाझम वाली बौछारें, मुसलधारें नहीं शुरू हुई हैं. महज़ झड़ि‍यां हैं ये, मासूम, झड़ी, जैसे बड़ी होती है मैंगलोर स्‍टॉल वाला मेंदू बड़ा नहीं, मगर हाय रे ज़माना वाले फ़साने शुरू हो गए हैं! सुबह ख़बर थी पूरब और पश्चिम को जोड़नेवाली हमारी अंधेरी का सबवे पानी के भराव की वजह से बंद कर दिया गया है, साढ़े नौ को घर से निकले हमारे एक परिचित हैं हाईवे के रास्‍ते पूरब से अंधेरी के पच्छिम किसी मीटिंग को अंजाम पहुंचाने निकले थे, रास्‍ते में फंसे रहे, साढ़े ग्‍यारह के करीब हारकर मीटिंग कैंसल किया और घर लौटे. एक दूसरे थे गोरेगांव पूर्व से मलाड पश्‍चि‍म अपने घर लौटना चाह रहे थे, फ़ोन पर बताया अभी आधे घंटे से गोरेगांव पुल में अटके पड़े हैं!

सात और आठ और नौ फ़ीसदी तरक्‍की के गानों के भोंपे बजते फिरते हैं, पता नहीं छिपाकर किसके घर घुसाके ये सारी तरक्‍की हो रही है! यहां एक महानगर में मासूम सी बरसात उतरती है और शहर, ससुर, उमगने के, राग मर्सिया गाने लगता है!

4 comments:

  1. इसे कहते है' खोफ '.रामू यूँही शोले की रीमेक बनाते है.....

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  2. एहर भेज द ,ससुर के। मरन बा ।

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  3. तरक्की तो हो रही है आप को नजर नही आएगी.....किसकी तरक्की.हो रही है...बताने वाळी बात थोड़े ही है...सब जानते हैं।:))

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  4. न जाने केतना चिरकुट सब जम गया है त पानी का बिगाड़ा है? अभी सिंगल डिजिट में हैं इसलिए कम पानी जमा है. एक बार डबल डिजिट में पहुँचने भर का देरी है. देखिये फिर का होता है. फिर जो मीटिंग आधा घंटा में कैंसल हो रहा है ऊ का कैंसल करे का खातिर दू दिन लगेगा. पूरा दू दिन.

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