Sunday, June 21, 2009

भर-भर घर..

घर में पड़े-पड़े चट गया हूं. चार दिनों से इन तंग दीवारों के बीच क़ैद हूं और अब लगता है मेरी खुद की सांसें आपस में टकरा रही हैं. देह भी पिटी आवाज़ में शिकायत करता है कहीं बाहर टहलाओ, भाई, हाथ-पैर चलवाओ? तुम्‍हारी संगत में लगता है अलेंदे से उलट गयी अर्जेंटीना हो रहे हैं? चिढ़कर देह को कुहनीयाता हूं, ज़्यादा बौद्धिकता मत ठेलो, साले, सांस हमारी उखड़ रही है और कांख आप रहे हो!

दरअसल देह का कसूर नहीं. कसूर घर का है. दीवारों पर पलस्‍तर की हालत सुनील शेट्टी के चेहरे पर सुरैया के गाने चिपकाने सी हो रही है, किताबें अपनी किस्‍मत को रो रही हैं कि हमारी हालत अच्‍छी तो अब कहीं नहीं रही, मगर तुम्‍हारी छुवनों में तो तीस साल की शादी वाला बेग़ानापन घुस गया है! नसीबवाले घर होंगे जिनकी त्‍वचा पर पॉल गागां और प्रियंका चोपड़ा की अदायें सहलती होंगी, अपने यहां सबके सहमने के लिए मैंने इसके, उसके, और फिर बाकी सब तरह के बिल टांक दिये हैं. तकिये तरसते हैं कि उनके सजने के लिए एक क़ायदे की बिस्‍तर हो. बिस्‍तर तरसता है कि उसके बिछने की जगह हो. घर तरसता है कि वह घर जैसी जगह में हो. नाम पुकारे जाने पर धड़ल्‍ले से आगे आकर अपना परिचय दे सके, सत्रह बुरकों के पीछे जड़ा-गड़ा हिचकियां न भरता रहे कि जेठ जी घर से बाहर निकल जायें उसके बाद हम बाथरुम जायें!

चार दिनों से बंद हूं तंग हूं अलग बात है, सच्‍चाई यह है ग़लत शादी की तरह यह घर हमेशा से मेरी जान खाती रही है. पूछो क्‍यों हमारे हिस्‍से आई तो हरामख़ोर का चेहरा उतर जाता है! अबे, किसी और के गले जाकर नहीं बंध सकती थी, समूचे चॉल में ‘कथा’ के नसीर की तरह एक हमीं शरीफ़ मिले कि अपने मोह में उलझाकर हमारे कृशकाय पर लतरकुमारी होकर लटक लीं? चलो, एक मर्तबे हर किसी से ग़लती होती है, हमसे भी हुई हमने भाव दे दिया मगर बेहयाकुमारी अबतक लटकी हो? हमारी सुकुमार शहरयार संवेदना का ज़रा लिहाज़ किया होता, संसार की कला को हमारी कितनी दरकार है की पुकार समझी होतीं, किसी कुएं में जाकर कूद पड़ी होतीं इतना समझने के लिए मादाम क्‍यूरी का विज्ञान और रॉकेट साइंस संधान समझने की ज़रूरत थी? बाप ने पैदा किया था, माथे में हरकत ला सके साथ थोड़ी इतनी बुद्धि पैदा नहीं कर सके थे?..

गुस्‍से में दिमाग़ एकदम खौरिया रहा है. तबीयत हो रही है घुमाकर ससुर एक भरपूर लात लगायें. लेकिन कहां लगायें? लगाने भर को भी साली पहले मुनासिब जगह तो निकले? एक ज़रा सी जगह निकली थी तो देख रहा हूं घर में काम करनेवाली छोरी ने मेरी सीनाजोरी में उसे हवाई चप्‍पल सजाने का शो-केस बना दिया है!

जनवैया भाई लोगों से सुनते हैं बीजिंग में घर की किल्‍लत है टोकियो में आदमी घर में नहीं रहता, आदमी में घर का निवास है, मगर सच पूछिये तो मेरे लिए सब परिलोक की कथायें हैं. बीजिंग और टोकियो में अंड़सहट होगी मगर आदमी आदमी की तरह देह फैला सके की सहुलत भी ज़रूर होगी.. मैं तो पिछले चार दिनों से फंसा हुआ हूं और चाह रहा हूं घर का एक ऐसा हिस्‍सा आये जिसपर लात फेंक सकूं, लेकिन हक़ीक़त यह है, लात के रास्‍ते दूसरी चीज़ें आ जा रही हैं, घर पर फेंक सकूं ऐसा हिस्‍सा लात की रेंज में नहीं आ रहा!

सात खसमों को खाकर हज को चली की तरह हरामख़ोर के पीछे पक रहा हूं, खौलते तेल में पका सकूं ऐसी मेरी किस्‍मत नहीं सज रही.

पता नहीं किस बेहूदगी के आलम में कुंदनलाल सहगल ने ‘एक बंगला बने न्‍यारा’ गाया था- घर नहीं चढ़ रहा है अलग बात है- सहगज का गीतकार हाथ चढ़ता तो कहता ससुर, लिरिक्‍स बदलो पहले! बंगला न्‍यारा की जगह घर हमारा, स्‍पेशली, कंप्‍लीटली, होलहार्टेडली हमारा नहीं लिख सकते थे?

3 comments:

  1. कौन टाईप के हो लिए हो भाई और क्या हालत बना रखी है. थोड़ा देह डुला कर तो देखो..

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  2. ई खौरियाने की बीमारी अभी भी पकड़े हुए क्या गुरूजी? किसी बैद-हकीम से अपनी नाड़ी काहें नहीं पकड़वा लेते। ई देह ससुरी कभी-कभी ओभरहालिंग मांगती है। बन पड़े तो गोआ के सागर तट पर जाकर कोई छिनरई देख आइए। लह गया तो ओभरहालिंग भी हो ही जाएगी।

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  3. लिहाफ 'पढ़कर वैसे ही बौराए हुए थी तबियत की सुनील शेट्टी से सुरयिया फिर सहगल तक के सफ़र में .डूब गए .बहुत दिनों बाद आज मूड में दिखे सर जी....

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