Tuesday, July 7, 2009

सुखकथा: एक घिसा परिवार प्रेमपत्र..

बच्‍ची आदमी के सिर पर झूल रही थी. जिस भयानक लयकारी में झूल रही थी संभव था किसी भी क्षण छिटककर फ़र्श पर गिरती मुंह फूट जाता. इसी आशंका में औरत का मुंह कलेजे में आया, बरजती बच्‍ची की ओर लपकी थी कि आदमी ने हाथ उठाकर बीच में रोक लिया, ‘खुद तो झूलती नहीं अब बच्‍ची को भी रोक दोगी?’

औरत एक बार हैरानी से पति को देखी, फिर लगातार हैरान होने से बचने की गरज अंदर के कमरे चली गई. आदमी को देख-देखकर लगातार क्‍यों हैरान होती रहती है सोचकर औरत एक बार फिर खुद पर हैरान हुई. अच्‍छा नहीं होता आदमी को देखना बंद करे आईने में खुद को तकती हैरान हो?

बच्‍ची आदमी के सिर पर झूल रही थी. और आदमी खुश था. असुविधा में था लेकिन खुश था. अलबत्ता मासूमियत में इच्‍छा थी कि दिमाग़ का सोचना लड़की के झूलने की तरह निर्बाध गति चलता रहे लेकिन मचलती बच्‍ची के फैलाव में कभी बाल खिंच जाते, कनपटी के पास किसी नस का तनाव हो जाता, अपने को संभालती सोच फिर बहक जाती. आदमी फिर एक बार जतन करके खुद को तैयार करता कि दिमाग़ फ़ोकस हो, मन में इतिहास, अर्थ, समय का एक सहजसूत्र बने और शैलेन्द्र के ‘हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा’ की तर्ज़ पर रहस्‍यों के मन में भेदभरे तारे फूटने लगें! लेकिन सिर पर बच्‍ची थी और इसके पहले कि बनते, तारों को तितर-बितर करने लगती..

‘पापा, घूमने चलो न?’

बच्‍ची के साथ आदमी घूमने निकलता तो स्‍वयं को चिंगेज़ खान नेपोलियन बोनापार्ट समझता, जीभ पर लवंगलता का स्‍वाद और आत्‍मा में सौ सूरजमुखी खिल उठते, एक उम्र के ठहरे हुए मेह माथे पर बरसने होने के समूचे लय में थिरकने लगते. लेकिन अभी हाथ में काम था माथे में अनुत्तरित सवाल ढेरों चिन्‍तायें थीं, बायें हाथ से बच्‍ची को हवा में संभालते और दायें से सामने दिखती पंक्तियों पर पेंसिल से निशान बनाते बच्‍ची को जवाब दिया, ‘बाद में घूमेंगे, अभी काम कर रहे हैं, बच्‍ची!’

‘आप खाली किताब पढ़ते रहते हो!’ बच्‍ची तुनककर बुरा मान गई, ‘आप इतना किताब क्‍यों पढ़ते हो, पापा?’

अचानक जाने क्‍या खोजती बच्‍ची की मां वापस कमरे में लौट आई और एक बार फिर बच्‍ची और उसके बाप को देखकर हैरान हो रही थी. आदमी की नज़र औरत पर पड़ी तो उसने सिर नवाकर बच्‍ची का जवाब दिया, ‘आदमी जीवन को नहीं पढ़ पाता तो किताब पढ़ने लगता है. सोचता है किताब पढ़ते-पढ़ते एक दिन जीवन को पढ़ने लगेगा.’

‘तू नीचे आती है कि मैं आकर पढ़ाऊं तुझे?’

मां के गुस्‍से का बच्‍ची ने एक ऊबभरी नज़र से आकलन किया, आदमी के कंधे पर पैर फंसाये उसके गोद में गिरी आई, फिर गाल में उंगली धंसाकर हैरानी से आदमी से सवाल किया, ‘तुम जीवन को पढ़ नहीं पाते? सच्‍ची, पापा? मम्‍मी पढ़ पाती हैं इसीलिए किताब नहीं पढ़ती?’

आदमी ने बच्‍ची के नाक से नाक सटाकर उन सभी काली किताबों की सोचने से स्‍वयं को बचा लिया जिनके बारे में वह अबतक अनजान है, जो दुनिया के जाने किन-किन कोनों में दबी होंगी, जाने किन हालातों-प्रक्रियाओं में संभव हुई होंगी, और जिनके बाबत एक इस निहायत अर्द्धशिक्षित, अपंग संक्षिप्‍त जीवन में शायद वह हमेशा अनजान रहे?

‘जीवन क्‍या है, पापा? और किताब?’ बच्‍ची ने सुलझे एक्‍टर की तरह आंखें चौड़ी कीं और फटी-फटी आंखों पिता को तकती रही. आदमी काली किताब का लेखक होता तो लिखता: “…the measure of a book is not its ability to solve the literary and structural problems set forth in it but the greatness and importance of the questions the author is addressing and the degree to which he gives himself over to this task, however hopeless.” फ़ि‍लहाल बच्‍ची का पिता औरत का आदमी था सो उमगकर बच्‍ची को छाती से भींचे औरत को जवाब दिया, ‘हम बाद में घूमने जायेंगे, जीवन को पढ़ने जायेंगे, नहीं बच्‍ची?’

‘और मम्‍मी नहीं जायेगी? पढ़ने?’ औरत को घूरती बच्‍ची हैरान होकर बोली.

‘नहीं, मम्‍मी को पढ़के नोबल पुरस्‍कार नहीं जीतना है!’ तमककर औरत चाहती थी सामने से किताब खींचकर आदमी के गोद में गिर पड़े, गुस्‍से में सुलगती उसके गाल काटकर बोले, ‘तुमसे इतनी नफ़रत करती हूं तुम समझते क्‍यों नहीं? क्‍यों नहीं समझते, बोलो?’

लेकिन बोलती नहीं क्‍योंकि जानती थी आदमी दुलार से उसके बाल चूमता बुदबुदायेगा, ‘बच्‍ची कैसे समझेगी कि किताब और जीवन अलग नहीं है, जैसे एक समूची किताब एक समूचा जीवन है, नहीं?

4 comments:

  1. ’आदमी जीवन को नहीं पढ़ पाता तो किताब पढ़ने लगता है.’

    आर की बोलबो . किछु बौला जाए ना . दारूण लिखेछेन !

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  2. बेहतरीन प्रमोद जी, ग़ज़ब लिखते है आप. और इतनी गहराई की बातें. आपके लिए डाइरेक्टर बनना ही ठीक होगा या फिर कोई उपन्यासकार. मैने इतनी कसी हुई और उलझी-सुलझी पोस्ट नही देखी.

    Saagar

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  3. इसमें कुछ है, अजब सा रसायन बनता हुआ, अजब सा स्वाद देता और अजब सा असर करता हुआ...बहुत सुंदर, बहुत ही सुंदर।

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