तुम जो आये नहीं..

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क्‍या था सपना था? कैसे चुपके से कब चला आया और आया तो इतनी देर पीछे ख़बर हुई? सिर को हाथों में लेकर अब क्‍या आना था आया और जाते में भी मर्जी पूछकर कहां गया. कैसी तो अंदर से आह छूटती है. हाथ की चीज़ उंगलियों से फिसलकर फ़र्श पर गिरती है तब ख़्याल आता है टूटा नहीं है शीशे का गिलास नहीं था. जो टूटा उसे सहेजने से रह गए. गिनने का ही मौका दे देता कि बाद में याद करके खुशी होती कि गिने थे सपने इतने थे! मगर कहां.. लुकास मूदीस्‍सॉन की पहली फ़ि‍ल्‍म ‘शो मी लव’ की तर्ज़ पर आदमी नाराज़ होकर गाने लगे ‘शो मी सपने’? फिर शो करेंगे? और करेंगे तब क्‍या गारंटी है कि नाराज़ होकर उनसे जिरह न करने लगें कि नहीं आते हो मत आया करो अब तो लगभग आदत-सी हो गई है फिर कैसे चले आये, भाई? क्‍यों चले आये सपने? तुम बहुरुपिये का कोई क्‍या करे अपनी जगह जीवन को नहीं भेज सकते थे? मगर वह शैतान पाजी डरपोक कहां आये जाने कहां-कहां छिपा फिरता है..

कहां छिपा रहता है? जीवन? बैंक के दरवाज़े पर अचानक मन कैसा कातर हो गया था नाउम्‍मीदी के कैसे घनेरे अंधेरे घिर गए थे इसीलिए कि जीवन कहीं बैंक के अंदर लुका था मेरी संगत की शर्मिन्‍दगी में मुकर रहा था? बारिश में धंसी फंसी बस के बाजू कराहते ईश्‍वर दिखें तो टूटी हवाई चप्‍पल फटकारता पूछूं प्रभु, क्‍या दिलदारी की एक भगोड़े से हमारी यारी की?

मगर ईश्‍वर बाजू, बस की छत क्‍या सपनों की सेंघ में भी न दिखें किसी लिसराये छाते की छांह में कभी भूले अपना पहचाना स्‍वत्‍व दीखे तो देखकर दांतों में करकराहट हो सचमुच देखा? खुद को ही देखा या फिर सपना था? लेकिन कब आया कहां आया दोनों ही मैं और सपना?

 
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Udan Tashtari - July 11, 2009 8:29 AM

बस, मन अनमना सा है..है न!!

Parul - July 11, 2009 12:18 PM

पूछूं प्रभु, क्‍या दिलदारी की एक भगोड़े से हमारी यारी की?..ye bhii acchha hai pramod ji

सागर - July 11, 2009 3:39 PM

शब्द शब्द जादू है. आपकी पोस्ट में पल पल घटता बानगी है. और हर घटना मामूली नही जान पड़ती...
यह फिल्म रेनकोट जैसी माफिक है... कुहासे भरी दोपहर जैसी

ravishndtv - July 11, 2009 10:39 PM

प्रमोद जी

सच्ची घटना सुनाता हूं। तपती दोपहरी में गंगानगर से दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ने जा रहा था। तभी एक रिक्शेवाला गा रहा था। वापस मुड़ा और मोबाइल से रिकार्ड किया। अब खो चुका हूं लेकिन दो पंक्ति अभी तक याद है।

भगवान,
तू भी ज़रा रिक्शा चला के देख
मेरी तरह दो पैसा कमा के देख।

उम्दा सुर में गा रहा था।

गहरी संवेदना.. शांत और शीतल ..

tanu sharma.joshi - July 17, 2009 6:10 PM

क्‍या था सपना था? कैसे चुपके से कब चला आया और आया तो इतनी देर पीछे ख़बर हुई? सिर को हाथों में लेकर अब क्‍या आना था आया और जाते में भी मर्जी पूछकर कहां गया. कैसी तो अंदर से आह छूटती है. हाथ की चीज़ उंगलियों से फिसलकर फ़र्श पर गिरती है तब ख़्याल आता है टूटा नहीं है शीशे का गिलास नहीं था. जो टूटा उसे सहेजने से रह गए. गिनने का ही मौका दे देता कि बाद में याद करके खुशी होती कि गिने थे सपने इतने थे! मगर कहां..







क्या लिखूं इसपर....!!

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