Friday, July 24, 2009

टेस्‍टीमनी ऑफ़ द थर्ड पर्सन..

“किताब से पहले किताब का विचार होगा, विचार का केंद्र क्‍या होगा?”
- एनॉनिमस, मैं


रात के सूनसान दिन के हड़रम-बड़रम सभी समयों आदमी दांत में धंसे रेशे की तरह लौट-लौटकर खोजता होगा. वह अप्रकट, अव्‍यक्‍त निधि, अमूर्त्त सांगितीक सुरबहार पहुंच में रहती पकड़ में नहीं आती होगी, जैसे कांजीहाउस में कैद जानवर जानता होता है दीवारों पर सिर मार रहा है निकलने का रास्‍ता यहीं-कहीं है मगर दरवाज़े तक डोलता चला आता है दरवाज़े की डील थाह नहीं पाता. अपनी आकुलता में सुस्थिर होकर आदमी फिर यह भी सोचता होगा खोजने का यह तरीका ठीक नहीं- पैसे के पीछे हाय-हाय करके दौड़नेवाले के हाथ कभी आया है पैसा? या लड़की के पीछे माय-माय करके दौड़नेवाले के? डेढ़ साल का बच्‍चा हदबद में कहां दौड़ता है जहां है वहीं उस क्षण को बाकी सब क्षणों से काट काव्‍यपूर्ण-संपूर्ण कर लेता है, जो देखते हैं देख सकते हैं कितना रहस्‍यभरा, रचनाहरा है. आदमी कैच कैच करता है लेकिन फिर ढलान पर भागती साइकिल की रौ में कनपटी पर लौ बाले रहता है, खिचड़ी बाल चिनकते रहते हैं आदमी फुसफुसाकर खुद से कंपल्सिव न्‍यूरौटिक ज़ि‍रह किये रहता है कहां है कैसे पकड़ क्‍यों नहीं आती मैं खोज रहा हूं खोज रहा हूं बेदम देखता हूं हाथ कैसे नहीं आएगी?

कितने सारे कौमा, विस्‍मयबोधक चिन्‍ह कातरता में सवालिया चिरौरी करते हैं यह क्‍या ढब है, कौन मुलुक के नागरिक हो, भाई, हमें अनदेखा, एकनॉलेज नहीं करते, ज़बान दुरुस्‍त करो भाषा व्‍यवस्थित करो, कसाई? आदमी चोटखायी उड़ती नज़र उन्‍हें देखता है फिर अपनी खोज का बक्सा खंगालने लगता है- यूरोप के पीछे-पीछे दूसरे मुल्‍कों में भी जब जानर इन्‍वेंट हुआ था बहुत सारे देश ‘नेशन-बिल्डिंग’ की प्रक्रिया में थे, उपन्‍यास उस महती अभियान का कार्टोग्राफ़र, ड्रीम-ऑर्गनाइज़र की भूमिका में था, राष्‍ट्रीयता और राष्‍ट्र-निर्माण की सरल इकहरी सहूलियतों से विछिन्‍न आज के उलझे समय में जब इकलौता जेनुइन कमिटमेंट सोशल नहीं सेल्फ-एनहांसमेंट है क्‍या होगा किताब के केंद्र में, सोचो, सोचो? सोचो, सोचन शर्मा, सोचो, मेजर सलमान?

एक बच्‍चे की आंख कैसे देखेगी इस अजायब, लौमहर्षक लैंडस्‍केप को? मेमरीज़ ऑफ़ अंडरडेवलपमेंट की याद होगी उसे, या पेन्‍नाक की तरह हेमॅक में डोलता अकुलाया बुदबुदायेगा वो, “the imagination starved of memories works furiously at recomposing life from sketches.”?

क्रिकेट, राजनीति, सिनेमा, न्‍यूज़ चैनल, लव पैनल्‍स, अख़बार, इश्‍तेहार, घर के भीतर बाहर का संसार ही नहीं प्रगतिशील पैम्फलेट भी, सब इस अभागे लैंडस्‍केप को इकहरी धंधापुर्सी के कन्विनियेंस-स्‍टोर की सहूलियतभरी दुहाई में लगे हैं किताब भी दौड़कर स्‍वयं समीचीन प्रगतिशील व्‍हॉटेवर अदरवाइस बकवास, बेमतलब अश्‍लील अर्थहीन मेले का हिस्‍सा हो जाए? जिस समय-समाज-तबके का गाना गाये वह अदरवाइस खुद अपनी पहचान में विछिन्‍न, नयी पहचानों से जूझती नयी मान्‍यतायें, नयी राष्‍ट्रीयताएं ओढ़ती नये पानियों में बूड़ती-उतराती अपने से दो और दस हाथ कर रही हो उस साक्षर अर्द्धशिक्षित के बीच कौन किताब घूमेगी और घूमेगी भी तो प्रगतिशीलता का क्‍या कबार लेगी? सहूलियत के सरस सरल सपने देखेगी और सहूलियत का विजय-पर्व पुरस्‍कार पायेगी समाजहारी शॉर्टकट में खुद का पीठ थपथपायेगी? आदमी ने सैकड़ों मर्तबा देखी है वहां लेकिन वह नहीं है जिसे वह खोज रहा है..

एक सड़क सेक्‍टर सात से निकलती आसनसोल रेल स्‍टेशन के शंटिंग यार्ड के बाजू से निकलेगी फिर वहीं ठहर जाएगी, या मौज में अदन से होती अर्जेंटिना तक के सैर में सपरायेगी- कैसे-कैसे भेद सामने लाएगी? बंध की मीनार की ऊंचाइयां किन आकाशों तक पसरेगी, खोलेगी कितनी, कैसी खिड़कियां खोलेगी? बच्‍चा पूछेगा मेरे पैर में ये कैसा जूता इस चमड़े की कहानी क्‍या है, पापा? पापा, व्‍हॉट इज़ द रियल स्‍टोरी ऑफ़ द वे बैक होम, ऑर फॉर दैट मैटर, अ वे इन द वर्ल्‍ड?

रात के सूनसान दिन के हड़रम-बड़रम सभी समयों आदमी दांत में धंसे रेशे की तरह लौट-लौटकर खोजता होगा.

2 comments:

  1. दुष्यंत का वो शेर है ना-
    'एक जंगल है तेरी आंखों में
    मैं जहां राह भूल जाता हूं'
    इसमें आंखों की जगह शब्दों/बातों कर लीजिए और मेरी ओर से अपने लिए पढ़ लीजिए :-)

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  2. बहुत सही प्रेक्षण है :

    "the imagination starved of memories works furiously at recomposing life from sketches.”

    ऐसा ही हो रहा है . सूखी,मुरझाई,रस-गंधरहित, स्मृतिहीन,बुभुक्षित-क्षुधित कल्पनाएं जीवन के टुकड़े जोड़ने के शगल में लगीं हैं . जीवन की तस्वीर जोड़ने का प्रहसन ओवरटाइम में . काहे की ससुरी रीकम्पोज़िंग, यह तो .......

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