यह तीसरी मर्तबा हुआ है कि जहां-जहां जिसको जिस प्रकार व मात्रा में रिझाना चाहिए था सोनल समझती रही सबको स्मार्टली निपटा चुकी है और पीछे, शुरुआती एक्साइटमेंट के बाद खबर आई कि उसकी हाईट से लड़केवालों को प्रॉबलम है. पहचान बनाने की गरज से साथ समय बिताने उसे लेकर मैक्डॉनल्ड में बैठा था और बात-बात पर जैसे अनजाने हो रहा है, उसका हाथ टच करता रहा था तब बास्टर्ड को मेरी हाईट से दिक्कत नहीं हो रही थी? तीसरी मर्तबा! गुस्से और चिढ़ में अंदर खौलती सोनल ने सोचा, जबकि एमएसडी में उसके साथ की तीन-चार लड़कियां अभी भी जॉब ढूंढ रही हैं वह ईयरली ढाई लाख का पैकेज पा रही है ऊपर से रंग भी उसका दबा हुआ नहीं, फिर भी! सेम स्टोरी थर्ड टाईम रिपीट हुई है, फोर्थ और फिफ्थ और सिक्स्थ टाईम भी रिज़ल्ट वही क्यों नहीं होगा? इट्स ऑल सो सिकेनिंग, सोचते हुए सोनल को पूरे तमाशे से घिन हुई लेकिन साथ ही इस बेइज़्ज़ती से बचने की कोई सूरत भी समझ नहीं आ रही थी. कुछ स्वाभिमानी लड़कियां होती हैं ऐसे ‘हादसों’ की तकलीफ और शर्म में कभी शादी नहीं करेंगी का मन ही मन जाप पढ़ने लगती हैं, मगर सोनल के मन में खुद को लेकर ऐसी कोई सेल्फ-पिटी नहीं थी, उसे मालूम था इंडिया में लड़कियों की एवरेज हाईट क्या होती है और एवरेज तो सोनल फिर किसी तरह से थी भी नहीं! सब देखेंगे शादी वह कितने ठाठ से करेगी, और उसके बाद बहुत-बहुत सारा सैक्स! इतना कि ग्रूम साहब थककर पानी मांगने लगें तब पूछेगी बच्चू से कि नहीं, नहीं, आप तो बड़े खुद को महाराणा प्रताप की औलाद समझते थे? इतना और कितना सैक्स होगा कितना मज़ा आएगा के ख़्याल से सोनल को अभी से सनसनी होने लगी, तीसरी मर्तबा रिजेक्ट हुई है का किस्सा थोड़े वक्त के लिए बैकग्राउंड में छिपकर धुंधला हो गया!बीपी बढ़ने के बाद से सोनल की मां शाश्वती की देह से फुरती निकल गई है, हर चीज़ में कितना मन लगता था अब हर चीज़ काम लगती है. मंथर गति से रसोई के जंगले से बाहर देखते हुए शाश्वती बेटी के रिजेक्शन का नहीं सोच रही थी, जंगले के सामने नयी इमारत बन रही थी, कितना बन गई है और कहां-कितना धूप छेकेगी का अंदाज़ करती उदास हो रही थी कि अभी कुछ अरसा पहले तक तीन-चार बड़े-बड़े पेड़ थे कैसी हरियाली थी देखते-देखते सब उजड़ गया जैसे मेरी देह की ही त्वचा थी, कैसा सलोनापन था देखकर आंखों को कैसा सुख मिलता था और खड़ी-खड़ी एकदम से देखो, अब कैसी सीमेंट की दीवार जैसी हो गई हूं! गए महीने विश्वनाथ जी के यहां त्यौहार था, राजी मिली देखते ही कैसे चौंककर बोली थी, ‘दीदी, आप एकदम बदल गई हो!’ शाश्वती ने फीकी हंसी में जवाब दिया था, ‘अब बूढ़े हुए, भाई, जीवन भर कोई जीनत अमान थोड़े बने रहेंगे?’
पत्नी चाय के लिए पूछने आई थी मुंह को मनोज कुमार की तरह दोनों हाथों मूंदे देवीप्रसाद ने सिर हिलाकर मना किया था, बीसेक मिनट बाद भी उसी मुद्रा में मुंह को हाथ से छेके संतप्त बैठे थे, और सोनल की चिंता में नहीं बैठे थे, न फिलहाल बेटे प्रसन्न का ख़्याल हो रहा था जिसके थोड़े समय से हर वक्त मुंह लटकाये रहने से वह आजिज आ गए थे, देवीप्रसाद की असल चिंता बाईं दाढ़ में दांत के भयानक दर्द से उठ रही थी जिसे पिछले कुछ वर्षों से वह नज़रअंदाज़ करते आ रहे थे. दर्द अचानक कुछ इस तीव्रता से महसूस हो रही थी कि ऐसी लाचार बेचैनी देवीप्रसाद ने ऑफिस में कालरा के दिनोंवाले झमेलों और बाबू के हाईस्कूल वाले रिज़ल्ट के दौरान भी नहीं महसूस की थी. पत्नी से कहना चाहते थे कहते-कहते सिर्फ़ इसलिए रह गए कि उन्हें भय हुआ मुंह के दर्द का बयान करते हुए कहीं रुलाई न आ जाये! दोनों बच्चे घर में हैं और बच्चों के आगे इस तरह हास्यास्पद होने के ख़्याल से देवीप्रसाद को घबराहट हुई. हालांकि मुंह के अंदर का दर्द रह-रहकर जिस तरह ऊपर चढ़ता, जोर मार रहा था वह घबराहट कम यातनाकारी नहीं थी! बाल्कनी में कहीं से उड़ता एक स्वस्थ डील का कौवा आया, तेजी से इधर-उधर नज़र मारता उसी तेजी से गायब हो गया. देवीप्रसाद मुंह दाबे सर्द आह भरकर सोचने से बच नहीं पाये कि एक स्वस्थ कौवे के जीवन में आनंद है, अस्वस्थ आदमी के नहीं.
बाबू ऊर्फ़ प्रसन्न अपने कमरे में लेटा था और सोच रहा था. पिछले दो दिनों से वह घर से बाहर नहीं निकला था और पिछले दो दिनों से इसी तरह बिस्तरे पर लेटा सोच रहा था. किसी लड़की ने उसका दिल नहीं तोड़ दिया था, न दूसरी कोई बड़ी आपदा उसके जीवन में आई थी फिर भी घर से बाहर निकलकर दोस्तों के बीच जाकर बैठने की उसकी इच्छा नहीं हो रही थी. दोस्त पता नहीं अचानक क्यों फालतू और बेमतलब लग रहे थे. घर, पापा की बातें सबकुछ अटरली स्टुपिड लग रहा था. ऐसी साफ़ कोई वजह नहीं थी फिर भी पता नहीं क्यों हर चीज़ से नफ़रत हो रही थी. दिमाग में कहां-कहां के विचार आ रहे थे मगर ठीक-ठीक वह क्या सोच रहा है इसका प्रसन्न को भी अंदाज़ नहीं था.
सोनल, शाश्वती, देवीप्रसाद, प्रसन्न के साथ घर में एक पांचवी उपस्थिति भी थी. या ऐसा भी कह सकते हैं कि चारों उसी एक की अलग-अलग अभिव्यक्ति थे..
इस कमरे से उस कमरे, अन्यमनस्क, खोये-खोये घूमते, मगर नज़र किसी को न आ रहे, सत्वतत्व यह साक्षात ईश्वर थे! बाबू के कमरे में नाइके के स्नीकर्स और सैमसंग के टचफ़ोन पर निगाह जाते ही ईश्वर पता नहीं क्यों कुछ अनमने से हो गए, ईश्वरत्व अचानक बोझ की तरह लगा.