Thursday, July 30, 2009

बेकली की शराब..

आंख खुलते ही कैसी तो बेकली मन में शराब घोलने लगती है. हाय-हाय करता तन अकुलाता बजने लगता है कि कहां, कैसे, क्‍या-क्‍या कर लिया जाये! देह की मार और ज़रूरतों की धार में पीटते हुए ख़याल उड़ते हैं कितना लिखने को पड़ा है वही लिख ही लिया जाये? लिखते हुए ही इस संसार में होने, और होकर कुछ भी उखाड़ न पाने के पापों का बोझ हर नहीं लेंगे, कम से कम बोझभरी कमर का बोझ ज़रा कमतर ही कर लेंगे? ओह रे, लिखाई, लिये चल संग ऊंचे कहीं चमकते पहाड़ों की ऊंचाई, आंख हरियर हो जाये वैसी कोई तराई, हाय ऐ लिखाई?

लिखने से समाज बदलता है ऐसा हमें मुगालता नहीं, लिखते-लिखते हमीं कहीं ज़रा सा बदल जायें वही हमारी आत्‍मा का शोभित लालता होगा, होगा? लिखने से कहां कुछ बदलता है, हम अदाबाजी की सीली परगतकामी बेहयाचामी आग सुलगाके सिसकारी छोड़ते हों, सिसकियों में तैरते समाज तक उसका धुआं भी पहुंचता है? फिर लिखने से बदल जाएगा की हम किसको गोली देते रहते हैं? खुद इतने वर्षों से ले रहे हैं यही सोचकर लाज नहीं आती? इतने करम करवाकर भी?

लिखते-लिखते पलेर्मो की सड़क पर स्‍थापत्‍य हो गए, लियोनार्दो शाशा ताउम्र सिसिलियन समाज की उंगली किये रहे, सिसली बदला? यही बदला कि साहित्‍य-समर, संस्‍कृति-निधि का सबसे चमकता मुकुट धारे एनाउदी प्रकाशन हुआ करती थी, उसे देश का सबसे बड़ा गुंडा अब देश के साथ-साथ उसे भी जेब में डाले घूम रहा है! तो यह तो हुई समाज में साहित्‍य की भूमिका! रूस में उन्‍नीसवीं सदी के पूर्वाद्ध से उत्तरायण तक कितने पोथे, मन-मणि के कैसे पुरायण लिख मारे गए, अभी तो जो दशा है एक अंधे को भी देखकर लाज आये, साठ साल पहले भी मान्‍वयर जोसेफ़ स्‍टालिन बेहयायी से डंका पीट रहे ही थे, “Novelists are forever trying to distance themselves from politics, but the novel itself closes in on politics. Novelists are so concerned with ‘man’s fate’ that they tend to lose sight of their own fate. Therein lies their tragedy.”

हिन्‍दी का कमरकसे साहित्‍यकार इस लिहाज से महाबरगदी राजनीतिक समझ की ऊंचाइयों की फुनगियां छूता रहता है. छूता क्‍या रहता है बरगदमाल गरदन में डारे मदहोश अश्‍लील परगतशील हिचकियां लेता रहता है. मैन्‍स फेट की अबीसीनिया-आरमेनिया तो दूर, साहित्यिक फेंट की बकबक वह कितनी भी करे उसके ऊपरी पेंट की खुरचन तक की उसे खबर नहीं होती! हां, अपना फेट आईने में चौबीसों घंटे चौकन्‍ना ज़रूर दीखता रहता है, और कहें तो कायदन वही दिखता है बाकी तो बकते रहने के पैदाइशी बकवासी संस्‍कार हैं, कान पर जनेऊ डालकर धोती से दूर गिराने की तरह- एक डेढ़ सौ का कुनबा होता है उसे रिझाने, और कुछ उसी तरह से एक दूसरे कुनबे को खौरियान- चिढ़ाने मुंह से झड़ते रहते हैं.

अमूर्त समाज तो क्‍या पड़ोस तक में हिन्‍दी का पाठक नहीं है यह क्रान्तिकंद साहित्‍यकार को नहीं दिखता. राजधानी में प्रकाशन धंधा है लेकिन बिकने को किताब की दुकानें नहीं हैं, उस मोर्चे पर वह मंदा क्‍या मूंग की दाल बराबर भी नहीं, साहित्‍य समाज के आंगन में केंद्र में बिछी किसी दरी की तरह नहीं, खटिये के नीचे किसी सीक्रेट सोसायटी की तरह छिपी चंदा काढ़ती और पर्चे बांटती रहती है इसकी तरफ गुरुगंदों का ध्‍यान नहीं जाता. माइक पर कहां बोल सकते हैं, जेब में कहीं से चार पैसे आयें तो उसे कैसी-कैसी कुशलताओं से कहां ठेल सकते हैं सारी चिंतायें कायदे से उसी में गोल-गोल घूमती रहती हैं लेकिन मुंह खुलते ही अम्‍मा का रटाया भ्रांति-कोरसगान शुरु हो जाता है, जैसे अभी एकदम अभी बीस कदम आगे क्रांतिद्वार पर पहुंचकर घंटा बजाने ही वाले हों, और उतना फरियाने के बाद तो फिर मज़े में लेटकर अपनी वही घिसी दाद खुजलवाने वाले हों ही!

लालित्‍य के यही रंग हैं, गंवार अक्षरदीक्षित अर्द्धशिक्षितों के यही ढंग हैं, फिर भी जाने क्‍यों है लिखने को अकुलाया रहता हूं, हिन्‍दी में ही लिखूंगा जानता हूं उसकी मुर्दनी में भक्क काला होने की जगह ललियाया रहता हूं?

9 comments:

  1. शर्मनाक है मगर सच है.. तस्वीर यही है..दुख की बात ये है कि कुछ लोगों को लगेगा कि आप तो गाली दे रहे हैं.. हद है!

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  2. सच्ची कभी कभी लज्जा आती है... मैं भी खुद को गाली देता हूँ
    "चूतिए अपनी साख बना रहा है." वाकई लिखने से हम दुनिया का क्या बिगार लेंगे...

    कोई और घराना भी तो नही है... सच्ची हम लिलियाए रहते है... पान है मूह में गुसने को आतुर

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  3. ओर देखिये हंस के इस बार में अंक में साहित्यकार बहसया रहे है ......दो पार्टो में

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  5. @डॉ. अनुराग,
    अब ऐसा है, डाक साब, हंस के हंसत्‍व-विमर्श के कोमलत्‍व की अब क्‍या कहें.
    वैसे किसी भी घनत्‍व, पहुंचे हुओं के संतत्‍व की क्‍या कहें.. छोड़ि‍ये, जाने दीजिए.

    July 30, 2009 7:54 PM

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  6. मेगापेन खाया कीजिये प्रमोद जी...जख्म जल्दी-जल्दी सुखा करेगा ....

    सौरभ के.स्वतंत्र

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  7. बात तो सही है शायद इसलिए लोगो को कड़वी लग रही है. बहुत आलोचनात्मक भी नहीं कहुंगी क्योंकि कभी कभी कड़वा भी खाना चाहिए.

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  8. मैं कम्पयूटर में जरा पैदल हूं ।ईसलिये चेक कर रहा हूं ।शानदार है..
    विजय्

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  9. लालित्‍य के यही रंग हैं, गंवार अक्षरदीक्षित अर्द्धशिक्षितों के यही ढंग हैं, फिर भी जाने क्‍यों है लिखने को अकुलाया रहता हूं, हिन्‍दी में ही लिखूंगा जानता हूं उसकी मुर्दनी में भक्क काला होने की जगह ललियाया रहता हूं?

    लिखिये हम बांच रहे हैं!

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