Tuesday, July 28, 2009

भाषा हमें नहीं जानती..

जिन्‍हें लगता है भाषा जानते हैं जानते होंगे, मैं नहीं जानता. लिखे में सांससधे बच्‍चे की दौड़ती रवानी हो, बात मचलती बहलती फिर किन-किन ऊंचाइयों तक पहुंचकर सजती मदहोश दीवानी हो पलटकर देखे तो ऐसी भरपूर नज़रों देखे कि आत्‍मा जुड़ा जाये ओह, पहचान उतनी जानी-पुरानी हो!

मगर क्‍या है मुगालते हैं, बनते, आह में चिटककर टूटते हैं, किन जतनों से इतनी दूर साथ आए शब्‍द छिटककर दायें-बायें छूटते हैं. फिर आयं-बायं जुगाड़ में कैसे तो जोड़ बनता है कि चार शब्‍द पीछे बेचारा कौमा पंख पटकती है क्‍या है, महाराज, कहां तक दौड़ाओगे कहीं हमें सटाओगे? इतने निकल गए, शब्‍द जल गए जाने कहां की कोमलताएं थीं उनकी संगत निकल गए हम तो कहीं हो ही नहीं रहे, अब? बुलाओगे, आऊं?

रवानी की टुटही रेल पर दिशाहारा मैं घबराया पुचकारता हूं तनिक ठहर जाओ छुटहे, यह टूटही संभाल लूं तो कहीं जोतता हूं, तुम्‍हें न्‍यौतता हूं!

कौमा को यकीन नहीं होता, गुस्‍से में आंख चढ़ाये मेरी साहित्यिकता के सात पुश्‍तों को मां-बहन में तौलता है, विराम खौरियाया मुंह से खखारने की जगह कहीं और से कराहता है क्‍या गुरु, इस तरह तो हम जनम-जनम के एसिडिक हुए, तुम्‍हारी मुहब्‍बत के भरोसे तो पूरे भांगधाम प्‍लैटोनिक हुए?

किस-किस को कितना जवाब दूं सच्‍चायी है भाषा की भेड़ों में जब मेड़ की ही पहचान नहीं तो विराम की पूण्‍य-पूर्णता की कहां होगी, रेल के धंसे डिब्‍बे की लतखोर बेहयायी में चिढ़ा चिचरियाता हूं क्‍यों अभी तो सवालिया हुए फिर भी शिकायत है? कौमा के पीछे नुक़्ता गोला दागना ताक रहा, उधर नज़र जायत है?

सच्‍ची, गुरु-गुरुवर प्रवीणगण चिरकुटढन्‍न ढोलकी ढुनढुनाते हैं विचार-अल्‍पना सजाते हैं, अपनराम खलिहा भुनभुनाते हैं भाषा भृकुटि बनाती है हमरी मुहब्‍बत का कजरा नहीं लगवाती!

3 comments:

  1. बहुत दिन बाद मौका मिला...फिर भी कोई शब्द नहीं......एकदम लाजवाब.......!!

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  2. भाषा से आप सखाभाव वाला प्रेम है, कुछ लोग प्रेममार्गी होते हैं, कुछ भक्तिवाले, कुछ ज्ञानवाले...आपका वाला बहुत सुहाना लगता है हमें तो.

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  3. सही है.. कौमा को पकड़ कर सटाए तो हैं.. जम रही है बात..

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