Friday, July 17, 2009

पुरानी, बिगड़ी आदतें..











अपनी छुटपन वाली उम्र में (इससे यह मतलब कतई न निकाला जाये कि अब बड़प्‍पन वाले में दाखिला ले लिये हैं!) हम 'स्‍क्रीन' और 'पिक्‍चर-पोस्‍ट' से काट-काटकर फ़ि‍ल्‍मी कतरनें बटोरा करते थे (मैं बच्‍चादार बाप नहीं, सोचकर सशोपंज में हूं पता नहीं छुटपन वाली उम्र के बच्‍चे आज क्‍या बटोरते हैं. ईश्‍वर न करे कैंची की जगह छुरी लेकर बटोर-कामना करते हों?), उसके बाद हसरत रहने लगी लड़की न भी हो कम से कम लड़कियों के प्रेमपत्र ही हों, दूसरों को ही लिखे हों हम बस उन्‍हें स्‍टोर सकें, कैटालागिंग हमारे हाथ से हो! उसके बाद एक दौर आया हम तो मैट्रिक के आसपास ही डोलते रहे मगर साथ के यार-दोस्‍त थे देखता सब बड़ी जिम्‍मेदारी से मार्कशीट बटोर रहे हैं. तो बटोर के ये अलग-अलग दौर रहे, बाद में जाकर आमतौर पर अब यह सब कहीं हो गया कि प्रेम का तो क्‍या पूछना सारे प्रेमपत्र तक जाने कहां घुस गए, जिधर देखो, यार लोग इकलौती चीज़ जो बटोर-सहोर रहे हैं वह बैंक का काग़ज़-पत्तर है..

चूंकि मेरे पास बैंक की चांदनी तो क्‍या चिथड़े भी नहीं तो मन मारकर किताबों के कवर सहेज रहा हूं. कवर दूसरों के ही हैं हमारी तरह आपकी भी आदतें पुरानी, पहले से बिगड़ी हों तो कवर-चुराव की एक जगह यह रही..

6 comments:

  1. u r always special, even in ur chindibazi....

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  2. हमें भी इत्‍ता अच्‍छा कोलाज बनाना सिखा दीजिए भाई
    कुछ कवर हम भी चुराए थे ।
    'घर' पर पड़े हैं ।
    फिल्‍मी पोस्‍टर, कवर, माचिस के कवर, डाक टिकिट, पुराने सिक्‍के, सबका कोलाज बना दें ।

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  3. ये तो अच्छी बटोरन रही..

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  4. वाकई बचपन में पचपन और पचपन में बचपन, एक साथ।

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  5. यानी कुल मिलाकर आपके पास कई कतरने जमा होगी.....वैसे पता नहीं कल आपने वर्ल्ड मूवी पे "नेम ऑफ़ रोज "देखी थी या नहीं...फुर्सत में देखिएगा ...

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  6. APARIGRAHA....the only road to salvation ! Pls. don't keep ur treasure buried any more.Share it and ur joy will be manifold !

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