Sunday, August 2, 2009

क्‍वोट्स कड़वे..

“सिर्फ़ मेरी आत्‍मा ही नहीं, पूरी दुनिया नीचे गई है. एक वो दौर था, कोई और जन्‍म था, जब मैं अपनी सांसों से कवितायें लिखती थी. अब तो खबर लिखती हूं, लोग कविता समझकर पढ़ते हैं.”
-- दूसरी बार पंजाब दारजी शिरोमणि सम्‍मान मिलने पर वरिष्‍ठ कवियत्री अमृत कौर.

“Who said filmmaking had anything to do with art? Isn’t it more about wearing nice clothes and taking girls to bed in shady make-up vans?”

-- Ramos Pareiras, retired Peruvian Cine-Guild Member and veteran Junior Artist.

“I know my writing is not going to make even a lizard fart, but that’s what I learnt in my youth, and that is what that will take me to my grave.”

-- Gustáv Kǐs, unemployed anarchist from the old quarters of Basavlava.


“हिम्‍मत है मेरी आंखों में देखकर मुझसे बात करो?”

-- भूतपूर्व प्रेमी की ओर से अंतरंगता खत्‍म होने पर इंदौर जल निगम में तृतीय श्रेणी की कर्मचारी सुचित्रा किरकिरे, दबे हुए रोष के किन्‍हीं सुलगते क्षणों में.

“What are they talking? Who are these people?”

-- Revathi Rao, reacting to a Hindi writer’s speech during a National Linguistic Conference in Masulipattaventuvadani.

“I just wanted to make something of my life. Even a poor sod from a poor village of Orissa got a right to make something of his life, hasn’t he? Fine, I cheated from office, stole from people, but tell me honestly, what other choices I had?”

-- Bisram Bhuian, suspended IAS officer responding to judicial probe into his exorbitant extra income.

6 comments:

  1. सुबह-सुबह इसे पढ़ा अच्छा लगा। आखिरी वाला कोट पढ़कर यही लगा कि देश के सबसे बेहतरीन माने जाने वाले लोग कैसे इतने कमजोर होते जाते हैं कि केवल अपना सुख देखने लगते हैं।

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  2. @शुक्रिया निशांत,
    आइडिया बुरा नहीं.

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  3. अच्छा संकलन किया है आपने

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  4. लिजर्डवा के फ़ार्टने का बतिया सबसे मुस्कीदार था . इतना च्यूंटी काहे भरते हैं जी . और कौनौ काज नहीं है आपको .

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  5. शनिवार को ही ती गीली बरसात पढ़ रही थी, दो दिन में दुनिया इतनी कैसे बदल गई

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