Monday, August 3, 2009

फिर बैतलवा डार पर..

ऐसा नहीं है कि पिछले दिनों सिर्फ़ सार्वजनिक जीवन ही है जहां ह्रास के नये उन्‍मेषों में हम उन्‍नयित-उन्‍ननियत-सा प्रतीत करते रहे हैं (कृपया देखें: गीता दीवान वर्मा, या फिर देखें और देखते रहें: तेज और पाल), निजी जीवन का मादक-वन भी है जिसकी उपस्थिति हममें उलझे, अनूठे मूर्छा का संचार करती रही है (कृपया देखें: पतन समग्र). मुर्दनी-मदन के ऐसे ही मादक थपेड़े रहे होंगे जिसके स्‍मरण में उल्फगांग अमेदियस जैसे रचनाकारों ने ‘कोसी फान तुत्‍ते’ की रचना की होगी, बाबू न शाह तीस वर्षों से थियेटर फोड़ रहे हैं, जबकि बाबू प्रकुसि हैं एक भी नारियल न फोड़ने के बावज़ूद कुछ फूटे-फूटे-से रहते हैं, कुछ इसीलिए, हाथ कंगन को आरसी क्‍या जैसे मुहावरे की तह में जाने, और कांटे की बात उगलवाने की गरज से हमने प्रकुसि को उनकी कल्‍पना के चेकोस्‍लोवाकिया में घेरा, स्‍वयं से घिरे हुए वह पहले से थे ही, हमारे बीच हुए औपन्‍यासिक विमर्श के ग्राफ़ि‍क एक्‍सप्‍टर्स..

सवाल- उम्र के इस गिरते उठान पर आकर खुद को कैसे देख रहे हैं, प्रकुसि?

जैसाकि स्‍वाभाविक था, हमेशा की तरह प्रकुसि प्रैस से नाराज़ थे, नया एंगल बस यह था कि अड़तालीस साल की लंबी अवधि गुज़र जाने के बाद अभी खुद तक से भी नाराज़गी थी, उसी सुर में भावुकता से, रोने की बजाय उन्‍होंने गाते हुए सवाल का जवाब दिया- इन्‍हीं उम्रों ने लीना दुपट्टा मेरा.. (फिर थोड़ा कल्‍पना में यूरोप से घूमकर लौटते हुए) चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया.. होहोहो, खोया-खोया चांद, खुला आसमान, रात के हमसफ़र थकके घर को चले?

इन पंक्तियों का लेखक ज़माना हुआ शैलेंद्र क्‍या, रघुवीर सहाय तक को निरखना भूल चुका था, ऊबे हुए दु:ख में उबासी लेते सवाल किया- वर्षों हुए कवि ने ऐलान किया था, ‘शहर अब भी संभावना है’, कालांतर मतलब इतने काल के अंतर पर आप क्‍या कहोगे?

प्रकुसि का चिढ़ा हुआ जवाब- कभी मैंने कहा कवि हूं? जिनने कहा आप उनने से ही जाकर जवाब क्‍यों नहीं लेते? (फिर क्षण के कालांतर में विचार-मदन होते हुए) फ़ि‍लहाल तो ‘मैं अब भी संभावना हूं’ की असंगतता से ही जूझता रहता हूं!

अंदर कहीं गहरे दर्द होगा, या शायद दांत का ही था, जूझते हुए अ-कवि ने आगे जवाब दिया- ‘Oh, one more again.. I wonder if this is life, or living hell?’

लक्षण पुराने जितने भी हों, सुहाने नहीं थे. प्रकुसि सिसकारियां भरते रहे, इन पंक्तियों के लेखक ने सीटी बजायी और हवा में ऐसे गायब हुआ जैसे सार्वजनिक जीवन से इन दिनों जिम्‍मेदारी गायब हुई है..

4 comments:

  1. फिल्म बनाने के लिए क्या प्रयास कर रहे है सर
    ?

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  2. @कुश कुंवर,
    आत्‍मा में तीन मीटर नीचे ऊतर कर देखता हूं क्‍या कसरत चल रही है फिर इत्ति‍ला करता हूं.

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