Tuesday, August 4, 2009

कहानी, एक पुरानी.. पटनहिया पनरसिया पम्‍फलैट..

कुछ दिन हुए नितिन और मैंने साथ माथा लगाया था हाथ फंसाया था, प्रत्‍यक्षा के निहोरे से यह ग्राफ़ि‍क गल्‍प प्रतिलिपि के ठौरे तक पहुंची थी, नितिन लजाता रहा था अलबत्ता मैं बेहयायी से माने बैठा था कि पता नहीं कौन, कहां के प्रकाशक होंगे, अमरावती के नहीं तो अमरीकन ही होंगे- मुझसे द रबाईज़ कैट और डेविड बोरिंग लिखवाये बिना मानेंगे नहीं! प्रकाशक की मनौव्वल काम न करेगी तो हमें रिझाने प्रकाशक की बेटी स्‍कारलेट जोहानसन के गेटअप में आयेगी..

ख़ैर, तो एक बार इससे फिर ज़ाहिर हुआ प्रकाशक पैसे की उड़ान उड़ते हैं कल्‍पना के पर नहीं चीन्‍हते, ठीक-ठीक न बेटी का सुर समझ पाते हैं, न जिसके प्रेम-सुरा में बेटी के बहके कदम लड़खड़ा रहे हों, उसका कद सुलझा पाते हैं. बहुत ही दुख की बात है. दूसरी दुख की बात है समीर लाल से संवेदी-पुरुष भी हिन्‍दी ब्‍लॉगों में सघन मानवीय ऊष्‍मा की प्रतिमूर्ति बने रहते हैं, लेकिन प्रतिलिपि तक जाकर भी कमेंट छोड़ आयें उसकी कल्‍पना नहीं लड़ा पाते. तो कुछ यही सब वज़ह रही होगी, हारकर, अज़दक पर चार लोग और देखेंगे के मोह में, गिरिराज से माफ़ी मांगते हुए, दुबारा ब्‍लॉग पर चेंप रहा हूं.

पढ़ने में असुविधा हो तो हर फ्रेम को क्‍लि‍कियाकर कृपया नयी खिड़की में खोलकर देखें..

फिर भी दिक़्क़त होती ही हो तो नज़र मारने को प्रतिलिपि की बड़-बड़ छपाई है ही..















13 comments:

  1. देखे! शानदार ! देखकर मजा आया। प्रतिलिपि पर और भी साथी ब्लागर मौजूद हैं। देखे सबको।लेकिन इसको यहीं देख पाये। शुक्रिया दिखाने का।

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  2. बहुत खुब... अज़दकी फटफटिया अब फेरारी हो गई... नया रूप हमेशा अच्छा नहीं होता मगर ये अच्छा है।

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  3. चितरवा -सब में गजबे बारीकी है । ब्लागरवा-सब कला सम्पादक के चिह्ने नहीं रहा था ।

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  4. Pramodji, maafi etc kee kya baat hai. Main yahan fir se kahdoon mujhe padhkar, chhapkar bahut maza aaya.

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  5. ओह फेंटास्टिक अटेंपट..! बॅट आई एम सॉरी आई केन नोट गिव यू एनी क्लू :)

    बाय द वे.. तीन मीटर नीचे से क्या जवाब मिला.?

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  6. कल्पना के पर ....इन दिनों कम्पूटर पे उडान भरते है .प्रकाशक को ठेंगे दिखाते हुए ..हाँ ये बात है की उम्र ससुरी कम है इन पंखो की..

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  7. हम तो पहले ही रस ले लिये थे.. शानदार है.. अब आप ग्राफ़िक नॉवेल लिखिये! जनता की बेहद डिमाण्ड पर..

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  8. फोटुवा पर क्लिकियाने पर तो गजब का आनंद आवे है प्रमोद जी.....गर्दा उड़ा दिए आप त..छापते रहिये...हम टीन के चश्मा लेकर पढने को बेताब है...भड़कौना नियर

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  9. रात के 3 बज्जे जा रहा है, अऊर हम भकुवा के ई सब देख रहे हैं.. रात के समय त हमको ई चमत्कार से कम नईहे लऊक रहा है महाराज..

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  10. गजब है.

    चप्पल...कैपिटल...बोलेरो..पजेरो...का का हिसाब है. ई कंक-'रीठ' का जंगल में सबही घुस गया है. परशांत बाबू रात को भकुआ रहे हैं आ हम दिने में.

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