Thursday, August 6, 2009

तुम चंदन हम पानी..

जबकि आज मौसम बेईमान है भी नहीं, फिर भी जाने क्‍यों है कि मन जलोटा, छनौटामय तुम चंदन हम पानी जैसा लग रहा है. उसमें भी, ससुर, बीच-बीच में फिर चंदन उड़ जाता है और पानी-पानी की ही अनुभूति रह जाती है, क्‍यों? और यह ऐसा इसलिए भी नहीं कि खुद से चिढ़े हुए रवीश ने गोबर-गणेशत्‍व की मीमांसा कर ली है उसके धुंधले असर में हैं, या बनारस के भइय्या ने संगीत-मोहिनी के चरणों में हमारी रूना के मुहब्‍बत और लायलपुरीजी की कल्‍पना के नारियल फोड़ दिये हैं उसके घुंघराले झमेले हैं, फिर क्‍या है कि मन ऐसा उड़ा-उड़ा किंचित-कंपायमान-सा हुआ जाता है? कहीं इसलिए तो नहीं कि दो दिनों में शहर से बाहर निकल रहा हूं, लेकिन वियेना, बूदापेस्‍त, पारी पहुंचने की बजाये घरपल्‍ली की तरफ जा रहा हूं.. इसीलिए घबरा रहा हूं?

ईमानदारी से कहूं सुबह से न नारियल के छिलके उतारे हैं, और न ही उलझे, अपने कोमलकांत केश संवारे हैं, बेहयायी से मन साधे सुर थामने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन कंठ है उसी बेहयायी से सुरअभागा हुआ जाता है..

घरपल्‍ली की रहते-रहते आदमी दिल्‍ली नहीं हो आ सकता? दिल्‍ली हमेशा दूर अस्‍त ही रहेगा? या फिर सीगल की दूकान और कॉलेज स्‍ट्रीट की भटकान में कोलकाता ही? फिर पता नहीं है क्‍या है यह भी सोचता हूं धर्मशाला ही हो आऊं? धर्म न सही चेहरे पर दुशाला की नयी-ताज़ी महक ही पाऊं?

4 comments:

  1. हो आईये घरपल्ली, तभी किस्से सुनेंगे अब.

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  2. हो आइए धर्मशाला, अब एतना बेचैन तबीयत है त... शायद उन्हेनि चैन मिले... ना त.. एगो
    उपाय औउर है की रैनकोट जैसन सिलेमा बना डालो... भावनप्रधान.. का बिचार है...?

    जाकी अंग-अंग बास सामानी...!!!

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  3. प्रमोद जी चंदनवा बनने में रिस्क है..ओपर नाग फंकारता है..आ पनिया होने में इ है कि ब्लॉग पढ़ने में हैजा उपटने का रिस्क नहीं होता है...लिहाजा गोबर का भी रिस्क्वा कम होता है..आ तनी घुमले आईये...मनवा फरेश हो जायेगा...चना भुसकी..

    राउरे त
    सौरभ के.स्वतंत्र

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