Sunday, August 9, 2009

उनींदे की लोरी..



"सोच-सोचकर जान निकलती रहती है, क्‍यों निकलती रहती है? सुबह की अजान में भी जैसे कोई सूना-अकेलापन हो, तुम पीछे खड़े बातें करते हो और मुझे ऐसा लगता है जैसे दूर कहीं से ख़ामोशी घेरे बना रही हो, क्‍यों लगता है? ये इतने ख़्याल, इतनी पंक्तियां दौड़ती-भागती रहती हैं, हमेशा तुम्‍हीं से बात हो रही हो, सो भी नहीं, फिर ये इतने सारे सिलसिले कहां-किधर निकलते हैं?.. वो अभी-अभी नीला रंग देखा तुमने? नहीं देखा? यानी फिर सब मेरे मन के वहम हैं.."

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3 comments:

  1. अमाँ, आप तो गांव न जा रहे थे..फिर काहे बमबारी टाईप ठेलम ठाली मचा दी है :) है मजेदार मगर!!

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  2. डर क्या कई तरह के होते हैं? इतना डरे हुए क्यों है? या फिर बताना चाह रहे हैं की डर पर ही ये दुनिया चल रही है? वैसे ये बात तो सही है, की काफ़ी सारे लोग डरे हुए हैं. ये बात भी एकदम सही है की उन्हे डरते रहने से जीने मे आसानी होती है.

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  3. तुम पीछे खड़े बातें करते हो और मुझे ऐसा लगता है जैसे दूर कहीं से ख़ामोशी घेरे बना रही हो, क्‍यों लगता है? ये इतने ख़्याल, इतनी पंक्तियां दौड़ती-भागती रहती हैं, हमेशा तुम्‍हीं से बात हो रही हो, सो भी नहीं, फिर ये इतने सारे सिलसिले कहां-किधर निकलते हैं?..

    कहां से निकलते हैं इतने सारे सिलसिले

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