Thursday, August 20, 2009

हारानो सुर..

संकरी एकदम सीध में चली गई उठान-ढलानभरी सड़क पर चुमकी कुछ आगे जाकर ठहर गई है, पलटकर मुझे तिक्‍त नज़रों से देखती बंग्‍ला में सवाल करती है, ‘हुआ क्‍या तुम्‍हें? देह में जान नहीं?’

चुमकी क्‍यों खुद मैंने भी यह सवाल किया होता तो स्‍वयं को क्‍या जवाब देता? कुछ नहीं, यूं ही मुंह ही मुंह कुछ बुदबुदाता, यंत्रवत पैर खींचता चुमकी से आ जुड़ता और हम एक ओर पीले फूलों से भरे झींगा के बागान और दूसरी ओर जंगली अमरी के झाड़ों के बीच टूटी-अधबीच कभी भी कच्‍ची, रेतीली हुई सड़क पर चुपचाप धीमे कदमों आगे चलते चले जाते.. नहीं, चुमकी?

लंबे इंतज़ार और बीसियों मनौतियों के बाद हुआ फुआ का इकलौता बेटा सतेंदर छुटपन में अपनी मांग के पूरी न होने पर इसी तरह सबसे छूटकर पीछे घिसट-घिसटकर चला करता. फुआ हारकर खौलती चिल्‍लातीं, ‘तू नीमन से आवतारS कि तहरा के उठा के हियें नाला में दहा दीं?’ नाले में बहाये जाने की धमकी में जाने भय के कैसे गांठ छिपे होते कि छह साल का सतेंदर बोकार फाड़कर रोता एकदम घबराया हुआ फुआ की ओर भागा आता और फिर चुन-चुनकर, उसी रुदनभरे फुत्‍कार में, ऐसी-ऐसी गालियों से फुआ को नवाजता कि अम्‍मां तक के कान गर्म हो जाते, फुआ की ओर थककर देखती साहा आंटी नि:श्‍वास छोड़तीं, ‘आच्‍छा प्रोभु तुमको बोरदान दिया किन्‍तु, ना की?’

चुमकी के नज़दीक पहुंचने पर मैंने पूछा, ‘बचपन में मेरी फुआ का बेटा सबसे पीछे-पीछे चला करता था, सतेन्‍दर, उसकी याद है?’

‘मुझे किसी की याद नहीं’, चुमकी के साथ ऐसा होता है, रहते-रहते एकदम उदासीन हो जाती, उसी अन्‍यमनस्‍कता से बोली, ‘मुझे यह भी याद नहीं कि दस वर्ष पहले मैं खुद कैसी दीखती थी. तुम्‍हें याद है?’

‘मुझे?’ मैंने चौंककर चुमकी को देखा. वह भी मुझे देख रही थी लेकिन मैं जानता था मेरी तरफ देख रही है, लेकिन मुझे देखेगी नहीं.

वैसे ही जैसे चुमकी जानती थी कारमेल कॉन्‍वेंट स्‍कूल से बीएसए की हल्‍की साइकिल पर लौटते हुए, एक लय में आगे की तरफ कंधा झुकाये, सबों को इंद्राणी हालदार के तीखे नैन-नक़्श दीखते, मैं हमेशा हैरत से उसके पैरों को तकता.

चोटों से घायल होकर लाल-नीली दवाइयों, पट्टि‍यों को रोज़ पैरों पर चढ़वाने का मैं भी पुराना ढीठ था, लेकिन चुमकी के पैरों पर के गहरे, गाढ़े काले निशानों के सामने मैं भी एकदम सुन्‍न हो जाता. इतनी-कितनी कहां से चोटें बटोरती रही है चुमकी कि जिसके सामने मेरा आवारापन भी इतना कमतर व हास्‍यास्‍पद है? मेरे देखने में कुछ ऐसी बेहया जुगुप्‍सा होगी जभी चुमकी ने जाने कितनी मर्तबा मेरे चेहरे को हाथ से ठेलकर मुझे परे धकेला है, ‘देखता क्‍या है रे बुद्धू, बोल ना?’

मैंने हंसते हुए चुमकी को जवाब दिया, ‘मुझे याद है दोपहर स्‍कूल के बाद कोई पूछता हुआ हमारे गेट के बाहर स्‍कूटर से उतरा था कि इंद्राणी यहीं रहती है? मैं चबूतरे पर पीछे बैठा ड्राइंग कर रहा था या किसी और काज में बझा था, मैंने जवाब नहीं दिया था, मुन्‍नी या मंजू कोई आगे आके बोली थीं यहां तो कोई इंद्राणी नहीं..’

‘फिर?’ धीमी आवाज़ में चुमकी ने इतना भर ही कहा. मुझे उलाहना देकर डांट सकती थी कि बदमाश, तुम तो फट् से आगे जाकर बोले होते! लेकिन नहीं, चुमकी आत्‍मीयता का कोई ऐसा दावा मेरे साथ साझा करना नहीं चाहती थी. बुदबुदाहट में सिर्फ़ एक ‘फिर?’ भर ही पूछा.

‘फिर क्‍या, उस नौजवान के हाथ में कागज का एक नोट था, उसे उलटते-पुलटते उसने कहा लेकिन पता तो यहीं का दिया था, इंद्राणी यहां नहीं रहती? तब तक रसोई में परदे की ओट से मां ने देखा होगा, वह साड़ी पर हाथ पोंछती बाहर चली आई, इंद्राणी हालदार तो? यहां नहीं, वो बगलवाले क्‍वार्टर में रहती है.’

बगलवाले क्‍वार्टर के गेट पर अपने को खोजनेवाले से मिलने अंदर से भागी-भागी चुमकी आई हो, ऐसा नहीं हुआ था, बाहर घबरायी हालदार आंटी आई थीं, चिढ़ और झुंझलाहट में नौजवान को गेट पर ही रोके-रोके जवाब दिया था, ‘ना, यहां कोई इंद्राणी नहीं रहती! आर कखोनो इधर जिगेस करते आसो ना!’

चुमकी चुप वैसी ही गुमसुम बनी रही, मानो उसकी नहीं, मैं उसे किसी और की कहानी सुना रहा होऊं.

बाद में मंजू ने हालदार आंटी को मां से फुसफुसाकर कहते सुना था कि बहन जी, दुबारा कभी कोई जिगेस करने आये तो आप बोलो नहीं इंद्राणी किधर रहती है करके..

बीच कोर्स कॉलेज से बाहर निकालकर चुमकी ऊर्फ़ इंद्राणी हालदार उसके दो महीनों बाद ही गुपचुप बरौनी इंडियन ऑयल के किसी ट्रेनी अफ़सर के संग व्‍याह दी गई थी!

उसके बाद कितने साल बीत गए, नहीं, चुमकी? कितने साल बीते?

झींगे के पौधों पर बीच-बीच में सजे कैसे तो प्‍यारे पीले-पीले फूल. कुछ आगे जाकर बागान पीछे रह जाएगा, पीले फूलों की दृश्‍यावलियां चुक जाएंगी. एक बिंदु पर आकर जीवन का सबकुछ कहीं न कहीं इसी तरह तो चुकता रहता है, नहीं चुकता रहता? तुमसे ज़्यादा इस बात को कौन समझेगा, चुमकी?

लेकिन उठान-ढलानभरे संकरी सड़क की सीध के आखिर में जहां मैं पहुंचा हूं इस, या किसी बात को समझने के लिए चुमकी मौज़ूद नहीं, आपस में ठंसे-धंसे और अब लगभग खंडहर हो रहे पुराने चीप-टाइप क्‍वार्टरों की बस्‍ती है, वहां मैं दीपंकर बेहेरा को खोजता पहुंचा हूं. जो थोड़ा-बहुत गांजा पीकर बहकने की लयकारी कौशल मुझे प्राप्‍त है कह सकते हैं दीपंकर बेहेरा की बदौलत है. हाईस्‍कूल में वह मुझसे एक साल सीनियर था, जीवन को अपने ऐंठ के बल पर जीने के स्‍कूल में तो हमारा मुकाबला ही संभव न होता, तीन-चार क्‍वार्टर छोड़कर उसके पड़ोस में गेट पर सूती की लाल साड़ी में एक गोद और दूसरी साड़ी के ओट में बच्‍ची लिए एक बेढब, फैली हुई औरत दिखी, दांत खोदती मुझे खबर किया, ‘दीपंकर को अब खोजके क्‍या. वो गया. दो साल पहले. लीवर कैंसर.’

इसके पहले कि अभी मैं दीपंकर की खबर पचाऊं, सूती की लाल साड़ीवाली साड़ी के पीछे डोलती बच्‍ची को सामने खींचकर बंग्‍ला में बोली, ‘भुले गेयेछो? आमायो चीनते पारो ना?’

‘के? मामुनि?’ संकोच और शर्म में डूबी हुई जाने कैसे मेरे हलक से आवाज़ बाहर आई. कनपटी पर कहां-कहां सफेद होते बालों को कान के पीछे दबाती औरत मुस्‍कराकर मेरा चौंककर देखना देखती रही, ‘सेई तो, एबारे बुझेछो..’

छह और सात साल की यही मामुनि थी जो मेरे साइकिल के कैरियर के दोनों ओर अपने पतले-पतले पैर बांधे, सीट के रिंग को मुट्ठि‍यों में भींचे छुटपन की सुनहली संझाओं में पड़ोस की सड़कों पर लहरदार चक्‍करों के अनूठे सुख के लिए बदहवाश मेरे पीछे भागा करती. कभी-कभी इस पागलपन से दौड़ती कि उससे छोटी, पांच साल की मुनमुन को अपनी दीदी को इस तरह दौड़ते देखने से भय होता. हाथ में किताब लिये गेट और घर के दरवाज़े के बीच टहल कर रही चुमकी भी दौड़ती गेट तक आती और चीखती मुझपर बरसती, ‘तोमार माथा खाराब ना की, देबू? सेइ मेये टा पोड़बे जे?’

वो लचीली कोमल शाख मामुनि सामने खड़ी थी और मैं उसे नहीं पहचान सका था! इस बेमतलबपने, ऐसी अनासक्‍त उदासीनता का मैं क्‍या जवाब सोचूं? मेरे तमाम बेहयायी के बावजूद भी संभव है?..

मगर गर्मी की छुट्टि‍यों की कितनी तो सूनसान दोपहरों में आम के पेड़ों के झुरमुट में झूले पर डोलती- अपने महज होने में सुखी- चुमकी को बिना आपस की किसी बातचीत के चुपचाप देरों-देर निरखता मैं मन ही मन सोचता, अकुलाता नाचता फिरता कि यह झोला टूट पड़े, यह चुमकी गिर पड़े- अपने उन गुप्‍त संगीन अपराधों की, इतने-इतने वर्षों बाद भी चुमकी ने कोई सज़ा सुनाई हो, मुझे अपने लिए कभी इतना महत्‍वपूर्ण बनने कहां दिया? कभी दिया, चुमकी?

गेट के लोहे में पैर फंसाये मामुनि चहकती बताती है, ‘तुमियो बुड़ो होये गेछो किन्‍तु?’

मैं सिर नवाये चुपचाप मामुनि का फ़ैसला स्‍वीकारता हूं. तुम जहां कहीं हो देख रही हो, चुमकी?

4 comments:

  1. ‘तुमियो बुड़ो होये गेछो किन्‍तु?’ - बोललेई होलो ! मटेई ना !

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  2. वो लचीली कोमल शाख मामुनि सामने खड़ी थी और मैं उसे नहीं पहचान सका था! इस बेमतलबपने, ऐसी अनासक्‍त उदासीनता का मैं क्‍या जवाब सोचूं? मेरे तमाम बेहयायी के बावजूद भी संभव है?..

    दुख हुआ....मामुनि के लिए...

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  3. नहीं, चुमकी?

    ‘के? मामुनि?’ संकोच और शर्म में डूबी हुई जाने कैसे मेरे हलक से आवाज़ बाहर आई. कनपटी पर कहां-कहां सफेद होते बालों को कान के पीछे दबाती औरत मुस्‍कराकर मेरा चौंककर देखना देखती रही, ‘सेई तो, एबारे बुझेछो..’

    गेट के लोहे में पैर फंसाये मामुनि चहकती बताती है, ‘तुमियो बुड़ो होये गेछो किन्‍तु?’

    कहाँ थे गुरु ? इतने दिन... कुछ ऐसा ही नहीं पढ़ा था... मजेदार और अतीत का हलचल बर्तोमान में लिए हुए...नहीं, चुमकी?


    एकदम हारानो सुर....

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  4. सजा सुनाती तो क्या था. सजा सुनने के लिए कान अब भी खड़े हैं?
    हेरा ही त गया है...सुर.

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