Friday, August 21, 2009

अंतर्मन के तलघर के आसपास जो दौड़ते हैं..

बरसाती नीमअंधियारों के वे फैले-फैले दिन जब समय की थाह न लगती हो, दिन में रात और रात में दिन कैसी तो पानी के रंगों सी घुली-मिलती हो, पेटी पर कुहनी टिकाये बैठा बारहवीं सदी का जैसे कोई सधा शब्‍दसिद्ध सेठ हो, आदमी बतियाता है फ़ोन पर जाने कहां-कहां की कैसी बहक बकता रहता है. अलबत्ता आंखें उसकी, स्‍वायत्त- अपने में ही भीतर कहीं खोयी हुईं- अपलक उलझी ताकती रहती हैं, डैटा-प्रोसेसिंग किये चलती हैं, खटर-खट स्‍नैपशॉट्स खिंचते चलते हैं शहर के नक़्शे में गुमनाम, चटख रंगों में दमकते जीवंतता की सूनसान ज़ि‍न्‍दगियों के भीषण तैलचित्र. चलता रहता है उसिना चावल के बासी भात-सा दिन का मेहराया, घबराया कारोबार.

लगे हुए मैदानी घास के बरसाती हरियाये को बिसराये टूटी सड़क पर ताज़ा सज आयी घास की जाने कैसी मुहब्‍बत में धंसी बुद्धू भुअरायी नन्‍हीं एक बकरी अचानक के उठे शोरील बगूलों में बदहवास कुलांचे मारती है, रेतभरा डोलता कोई नशीला ट्रक है, बचपन के नशे में अजबजायी बेचारी बकरी अल्‍ला-मियां को याद किये बिना कैसे तो अपनी जान बचाती है. बेचारी कब तक बुद्धूघने बचपने में मग़रूर नाचती फिरेगी, जल्‍दी ही जीवन दनदनाया सिर आकर नाचेगा फिर बकरी बबुनी किस नशे में राहत का खैर-कत्‍था मनायेगी?

आंखों पर हाथ डाले, आत्‍मा को नंगी हथेली संभाले आदमी उस भरे हरे के बाहर के कुहरिल अंधारों में उतरता है, अंतर्मन के तलघर में तस्‍कर बिम्‍बों का कोई व्‍यभिचारी बाज़ार है, अजब-गजब जींसों की लहरदार पुकार है, ओह, जगर-मगर जंगखार स्‍टेडियम में एकदम बलवा छूटा हो की तरह भहराये अरर-बरर शब्‍द गिरे आते हैं, कराहते चार वाक्‍य कि कंधा छिला, चौदह रोते कि घुटना फूटा है, सजगता की अपनी सस्‍ती फटी फड़फड़ाती छतरी ताने आदमी दायें हिलता कभी बायें तकता, क्‍या देखता कहां तलक देखता?..

बिन दीवारों का कोई बहुत बड़ा कांजीहाऊस दीखता. उससे सटा एक और. फिर और और और, न खत्‍म होता एक अंतहीन सिलसिला. कीचभरी पगडंडी के उस पार जाने किसकी ज़मीन है कौन देश है एक दबी आवाज़ उठती एक हमारी तरफ़ भी है, और इसका भी कहीं से कहीं तक अंत नहीं, दोस्‍त.. मटियाये धोती में प्राइमरी के मास्‍टर प्रसाद सर दीखते, हकबकाये हल्‍ला मचाये कि सूरन अगोरते सतपुतिया कीन रहे थे कहां भटक गए, कैसा कांटा है, बच्‍चा, किधर अझुरा दिया हमें?

आदमी उनींदा फुसफुस बुदबुदाएगा अफ़्रीका, आह, कितने सारे संसारों घुमा दिया हमें..

5 comments:

  1. बस ब्रेथलेस में शंकर महादेवन की तरह एक सांस में पढ़ गया... अब हक्का-बक्का होने की दो वजहें है आप लिख कैसे गए, फिर हम पढ़ कैसे गए ?

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  2. इन सब के रहते भी जी भी लेते हैं लोग

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