Saturday, August 22, 2009

के छोबि देखते जाय आर!

‘उत्‍्तम, सुचित्रा, देबानंद, बोइदा रेमान, आर तार पोर?’

‘तार पोर का बच्‍चल आछे केकरा खबर हव्वै, नन्‍दी? हम बुड़बक लोक, हमसे रोमान-पुराण के एइ रोकोम संगीन जिग्गासा के कवनो परिणाम होई?’

काली-सफेद वह क्‍या फ़ि‍ल्‍म थी जिसमें नायिका अंदर के कमरे परदे की ओट में सिहरती नायक जो किसी कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट से कह रहा होता लेकिन सुन रही नायिका ही होती कि कैसे नायक हमेशा के लिए शहर छोड़कर जा रहा होता, और इस एक वाक्‍य को सुनते ही कैसे तो कांपते, चढ़ते पार्श्‍व-संगीत के बीच अचानक एक शूल-सी उठती और नायिका की छाती में धंस, परदे का किनारा मुट्ठी में भींचे उसकी आंखें मूंद देती. भक्-भक् धुआं छोड़ती एक इंजन दूर कहीं एक सीटी की गहरी सिसकारी छोड़ती, और फिर बाद में रह-रहकर जब कभी खिड़की के गर्द चढ़े सलाखों पर फड़फड़ाते फुलकारी के छींट के परदे के पार दूर पुलिया पर हुमकारती एक रेल गुज़रती, नायिका दनाक् बंदूक की गोली-सी जाने कितनी आहों पर सवार नज़रों को उन सलाखों तक लिये जाती और सलिल चौधुरी के संगीत पर जमी वहां कितनी-कितनी देरतक थर-थर कांपती रहती..

‘केंपे-केंपे दाड़ि‍ये थेके जाबार पोर नायिकार जीबोन की रोकोम चोले? मोनेर भाबना केमन पोरिचालित हॅय, तनेर सोंगीत केमन ओनुदित हॅय, कखSनो बिचार कोरेछो? बुझते पारेछो?’

कमालिस्‍तान की अलसायी दोपहर बिजली के भारी केबलों के बीच जाने किन गांठों में उलझी वहीदा दाढ़ियों की गुत्‍थी के पीछे ढंके उस भोले फणीश्‍वर से कुछ कहना चाहती थी, फिर लगा अजनबी गांव का आदमी जाने क्‍या का क्‍या समझ बैठे, मन की बात मन ही दाबे हैदराबाद के उस पुराने पहचाने चेहरे को ढूंढती रही जिस मुनीर के साथ कभी हाईस्‍कूल से लौटते हुए कबाब खाया था, चारमीनार के गिर्द रिक्‍शे के चक्‍कर लगाती रही थी, तुम्‍हें अपनी नायिका याद है, मुनीर?

‘आमि आर छोबि-सिलेमा देखी ना, आमार भीषोन राग हॅय.. ना हले अश्रु बोये चले..’

‘आइ हेट टीयर्स! किस फ़ि‍ल्‍म में कहा था राजेश खन्‍ना ने, याद है?’

‘ऊंहू, धर्मेंद्र ने मीना कुमारी से ‘फूल और पत्‍थर’ में कहा था मालती, तुम इन लोगों को नहीं पहचानतीं.. या ऐसा ही कुछ?’

‘नहीं, तुम बोलो तुम्‍हें ‘यक़ीन’ अच्‍छी लगी थी या ‘फूल और पत्‍थर’? ‘प्रतिज्ञा’ बेटर थी या ‘मेरा गांव मेरा देश’?’

‘रवैल साहब की फ़ि‍ल्‍म थी, शायद आशापूर्णा देवी का उपन्‍यास था, ‘संघर्ष’- दिलीप कुमार, बलराज शाहनी, जयंत, संजीव कुमार सब थे उसमें, मुझे उसकी याद है!’

‘और सुनील दत्त ने वो एक फ़ि‍ल्‍म बनाई थी, रेगिस्‍तान में शूट किया था, गूंगा नौजवान अमिताभ, ‘रेशमा और शेरा’, उसकी नहीं?’

‘रेगिस्‍तान में ही केए अब्‍बास ने भी जलाल आगा को लेकर एक फ़ि‍ल्‍म बनाई थी, ‘दो बूंद पानी’, जयदेव का म्‍यूजि‍क था.. फिर गौरकिशोर घोष का उपन्‍यास था, ‘सगीना’, फ़ि‍ल्‍म वैसी अच्‍छी नहीं थी, लेकिन याद है..’

‘नायिकार जीबोन किन्‍तु? मोटामोटी आमादेर सोबाइयेर जीबोन किन्‍तु?..’

‘ओ गो नन्‍दी, कइसन तS सोहाना मौसम है, अऊर तूमि कहंवा-कहंवा का यादी का पेटारा खोल रही हो, काहे ला खोल रही हो, नन्‍दी?’

आज फिर बारिश होगी. इन दिनों रोज़ ही हो रही है. पानी के थपेड़ों में खूब सारी उदासी बरसती रहती है, फिर भी अच्‍छा लगता है.

'आच्‍छा लागे केनो बलो तो गो नोन्‍दोलाल?'

3 comments:

  1. "नायिकार जीबोन किन्‍तु? मोटामोटी आमादेर सोबाइयेर जीबोन किन्‍तु?.."


    सोत्ती..केउ जाय ना गो..केउ जाय ना..आहा..ओइ सोंघोर्शेर कोथा टा.. कि कोरे मोने एक्खुनौ आछे?

    ReplyDelete
  2. ब्लॉग की दुनिया में नया दाखिला लिया है. अपने ब्लॉग deshnama.blogspot.com के ज़रिये आपका ब्लॉग हमसफ़र बनना चाहता हूँ, आपके comments के इंतजार में...

    ReplyDelete
  3. ऐसी बहुत सी चीज़ है जो याद रहती है... मगर यूँ ही और फिर भी की तर्ज़ पर...

    अपनी जिंदगी, कल्पना और फिल्मो में दायरों में...

    परदे की ओट में सिहरती नायक जो किसी कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट से कह रहा होता लेकिन सुन रही नायिका ही होती कि कैसे नायक हमेशा के लिए शहर छोड़कर जा रहा होता, और इस एक वाक्‍य को सुनते ही कैसे तो कांपते, चढ़ते पार्श्‍व-संगीत के बीच अचानक एक शूल-सी उठती और नायिका की छाती में धंस, परदे का किनारा मुट्ठी में भींचे उसकी आंखें मूंद देती.

    वाह क्या बात है?

    ReplyDelete