Sunday, August 9, 2009

चंदोर..



एक नयी किताब, ग्राफ़ि‍क-गल्‍प की बाज़ार में और आई है, फिगर ऑफ़ स्‍पीच है, अभी आई नहीं है, अगले महीने के आखिर तक आएगी. एनीवेज़, अफ़सोस हमने नहीं बनायी है, उन्‍तीस वर्षीय बंगालोरु बसित अप्‍पुपेन ऊर्फ़ जॉर्ज माथेन हैं, उनकी सजायी है.. और पहली मर्तबा है, छपवंता अपने सुरिंदर मोहन फाटक को अंग्रेजी में ब्‍लास्‍टानेवाला चेन्‍नई का प्रकाशन ब्‍लाफ्ट है..

ख़बर है बाबू जॉर्ज माथेन फेसबुक के रस्‍ते ही प्रकाशक के दरवाज़े तक पहुंच गए, उनकी ग्राफ़ि‍की का नमूना तो चीख़-चीख़कर अपने छप सकने की संभावना का ऐलान करता ही है, जबकि हमारी ग्राफित्‍ती सब जो हैं, मन में इतना सारा हैं बाहर आने के नाम पर पता नहीं किन-किन बहानों के पीछे अटकी रहती हैं.. याकि हम ही हैं जाने कहां छिटके रहते हैं.. पता नहीं बहुत हर्ष नहीं है लेकिन लग रहा है अभी और बहुत समय तक भटकेंगे?.. तसल्‍ली के लिए इतना ही कह सकते हैं कि एक यह है, इसके लिए भी बहुत दिनों से भटक रहे थे, अब हाथ आ गई है! ब्‍लाफ़्ट के ब्‍लास्‍ट को आने में अभी देर है, सितम्‍बर के आखिर तक आएगी, मगर अक्‍टूबर के बीच तक तो फिर अंग्रेजी में अनुदित होकर अपने होनहार दुलरऊ अदबकुंवर की किताब "मासूमियत का महखाबख़ाना" भी बाज़ार में चली आएगी! देखिए, ज़रा उसके कवर की सजावट देखिए.. खिलते हैं गुल जहां जैसा नहीं लग रहा है? ख़ैर, नहीं लग रहा है तो आपके नाक में दिक्‍कत होगी क्‍योंकि हम तक तो महक आ रही है.

अलबत्ता यह दीगर बात है पता नहीं कहां कन्‍फ़्यूज़न हो जा रहा है, बाज़ार का दुलार हम तक क्‍यों नहीं पहुंच पा रहा है!?

5 comments:

  1. जानकारी के लिए आभार।

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  2. सोशल नेट्वर्किंग साईट्स का कुछ तो फायदा हो रहा है..

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  3. तिकड़म शिकडम जैसा कुछ होता है....ना ,बाज़ार का दुलार यूँही नहीं चल के आएगा .

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  4. डॉक्टर अनुराग से पूरी तरह सहमत

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