Tuesday, August 25, 2009

कुछ नहीं से कुछ नहीं तक..

कुछ नहीं लिखने का मन कर रहा है. दरअसल मन ठहरा-अटका हुआ है (भटका नहीं है, भटका तो समय है, और उसके मन को बहुत सारे खटके हैं, लेकिन फिर वह अलग कहानी है). अभी जो स्थिति है वह कुछ नहीं लिखने की है. कुछ. नहीं. लिखने. की. इस लिखे को देख रहा हूं और समझने की कोशिश कर रहा हूं यह मुझसे कहने की क्‍या कोशिश कर रही है. कुछ कह भी रही है, या नहीं भी कह रही है तो उस नहीं में कह दिये जाने के कैसे इशारे छिपे हैं, कि बस फ़ॉर्म का कमीनापन छिपा है.. सोचने बैठो तो कैसे सनसनीख़ेज सवाल हैं, और कुछ नहीं है दिमाग़ की बहक भर है तय कर लो तो ससुर, फिर सचमुच चिरई-पाद से ज़्यादा कुछ नहीं..

है कि नहीं? है? वेल, आइ माइट बी स्‍टेपिंग ऑन सटल ससपीशंस, एंड ऑल ऑव इट माइ ओन, तो बेहतर है मैं फाजिल ज़बान सिये रखूं.. हलर-बलर बोल देने के बाद राज़ खुलता है हलर-बलर ही बोल रहे थे! क्‍यों बोलते रहते हैं? कुछ नहीं नहीं बोलते रह सकते?

लेकिन फिर यह भी तो बात रहती ही है कि कुछ नहीं का क्‍या? कहां तक कुछ है और कहां के बाद कुछ नहीं? जीवन का हिसाब-किताब कैसे सरियाया और फरियाया जाए? या हारकर कुछ नहीं को कुछ-कुछ कैसे बनाया जाए?

आप भी पता नहीं किस कोने खड़े जाने कौन-सा दांत खोद रहे होंगे, किस कुछ नहीं के फेर में पिर गए.. छोड़ि‍ये, जाने दीजिए, हटाइए, मैंने शुरू में ही कहा कुछ.. नहीं.. लिखने.. का मन कर रहा है. दरअसल मन.. कुछ.. नहीं.. कर.. रहा..

10 comments:

  1. sir english me hi kahe nahi likhte aap?

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  2. जाने कैसे कभी कभी दूर बैठे दो लोग एक सा सोचने लगते हैं...मन कहीं भटक जाता है तो कहीं अटक जाता है...!

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  3. लेकिन संजीदा सैदाजी सरोबरवाली,
    यह अंग्रेजी की बात कहां से आई? गुज़ारिश के ही अरमान थे सो तो आप हमारे फारसी में लिखने की भी कर सकती थीं, हम कुछ नहीं की लन्‍तरानियां फेरे चले जाते, आप उज़बेकी में उसका तर्ज़ुमा पढ़े चली जातीं, नहीं? कि फिर अपने उज़बेकी अज्ञान-अरमान के पतंग उड़ातीं?

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  4. मन तो बहक जाता है। लेकिन यहां तो भटका भी नहीं है, बस ठहरा-अटका है.....संतोष की बात है।

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  5. यही तो बात है कि अगर हमारे किए से ,सोचे से कुछ होता तो ऐसा होता ही क्यों....बस! कई बार हम देखते भर रहते हैं...ना कुछ कहते बनता है...ना कुछ सोचते...

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  6. ye संजीदा सैदाजी सरोबरवाली kaun hain sir?

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  7. कोई नहीं....कोई नहीं...कोई नहीं

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  8. इस कुछ सही से जब निकलते है हम तो कुछ लेकर ही निकलते है.. उम्मीद है आप भी कुछ निकाल ले आये ..

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  9. space was the smallest place
    almost nothing
    words dropped in between....
    spilling nothingness....
    it seeped through crevices
    of alphabets and punctuation marks,
    it dotted the silence
    ...........
    engulfing in a meaning
    tightly held by pauses and silence
    and you could make out of it
    all that it was
    ...space.....
    nothing.

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  10. होता है जी अइसनो होता है की कुच्छो लिखे के दिल नहीं करता है... बस कलम झुलाते रह जाते हैं... तभियो आप इतना लिख दिए कम थोड़े न है...

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