डियर एस, डियर देवनागरी में ही सही लेकिन भाव अंग्रेजी वाले दे रहा हूं सो मानकर चलता हूं इस मर्तबा मेरे लिखे (और ओह, कैसे तो मिठास में कह गए) मेरे डियर-बुलावों से तुम्हें तक़लीफ़ न होगी. नहीं होगी न? वैसे नहीं ही होगी इसकी क्यों गारंटी है, बैंक में रखे पैसों तक की आजकल आश्वस्ति नहीं फिर एक अदद डियर-डॉलर मन में संतुष्टि का करेंट पैदा कर जाये इसीकी क्यों हो? फिर जैसा यह बेवफ़ा वक़्त है गारंटियों-वॉरंटियों का क्या कहीं भी कभी भी बिविल्डर करती चलती हैं, हज्जाम समाज है खुद को बिल्लू-बारबर बुलाये जाने को बारबैरिक मानता रुस गया ही था, इतने सारे डियर पिपुल हैं फट से भृकुटि खिंच जाती है कि डियर क्यों बुलाये, ‘डियरेस्ट’ नहीं बुला सकते थे? इससे भी फर्क कहां पड़ता है कि देवनागरी में रोमन सजा रहे थे, या रोमन में हिन्दी का धंधा चला रहे थे. सचमुच सोचनेवाली बात है, एस, सरोबरवाली, ऐसे मनुहारमय हिन्दी (एंड अदर) धरोहरवाली, कि कम्यूनिकेशन में कंगाली कहां रह जाती है? मन में ऐसे-ऐसे जाने कैसे-कैसे करताल बजते रहते हैं, मगर तुम्हारे मनुहारमय आंगन में एक ताली तक की आवाज़ पैदा नहीं कर पाती, घड़ियाली में होल छूटा कहां रह जाता है?.. कुछ दिनों के लिए घर गया था, बाबूजी से हिन्दी का भोजपुरी में तर्ज़ुमा करके उन्हें बताया उनके बारे में कितना सोचता रहता हूं, वह भोजपुरी को भदेस में फींचते बोलते रहे हमारे सोचने से उनके घर में घंटा कभी फर्क कहां पड़ा है. बाद में मैं हिन्दी आलोचना की तर्ज़ पर विचार करता रहा कि लो, भाषा के अड़ियल टट्टू फिर आड़े आये, संवाद फिर समस्या हो गई. फिर, हिन्दी आलोचना की तर्ज़ पर ही, मैंने स्वयं से विमर्श करके स्वयं को संतुष्ट कर लिया कि मैंने सवालिया संसार की चतुर्दिक पहचान करके उसे मन की पत्रिका में उतार लिया है, बाबूजी जैसा सुधि-पाठक उसे ग्रैस्प नहीं कर पा रहा तो वह उसके इलेजेटिमेट, इल्लिटिरेट एजुकेशनल धरोहर के कुकृत्य होंगे, उसे उपकृत करने का दाय मुझ अकेले का कहां, उसकी सर्वसमाज ही धाय हो..
एस, धरोहरवाली, डियर-डेयरिंग, बाबूजी के पीछे-पीछे तुम्हारे साथ ही दिक़्क़त होती है ऐसा थोड़े होता है चांपा जंक्शन से लेकर चंबोली तक कहां भाषा के तार जुड़ पाते हैं? तुम्हारे साथ यह भी दिक़्क़त है फिर कि तुम अपना ही यकीन नहीं करतीं, फिर हमारे कहे का- भले ही वह उज़बेकी, इस्पाहानी या जापानी में ही क्यों न कहा गया हो- कहां से करोगी? खिड़की को सात ज़बानों में लिखूं (la fenêtre, the window, la ventana, el-taka, la janela, das fenster, la finestra) तब भी आखिर में शिकायत करने और आह भरने से रह कहां पाओगी कि ‘जंगले का जादू’ और ‘झरोखे की झांक’ का ज़िक्र क्यों नहीं किया.. या ‘ये खिड़की जो बंद रहती है’ का गाना भी भूले रहे?
तुम पढ़ना भूली हो यही नहीं है, हम भी लिखना भूल गए हैं, लिखने को रोज़ एक सीधी रचना रच सकते हैं जो हम सबों के चौपाया होने और हमारे खुरों के पालतूपने की कहानी कहती हो, मगर, एस, धरोहरवाली, तुम फिर तब यह शिकायत करती खुद को लिखती पाओगी कि मैं लीक की गलीच लिख रहा हूं, पहाड़-पलीत-पुनित सिरज पतनशील प्रकाश में कहीं कोई आकाश नहीं छू पा रहा..
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