नील नदी कहां है? नीला रंग?.. टेलीविज़न पर हर किसी को पचास लाख और करोड़ जितवा देनेवाले शोज़ की तरह सब हमारी पहुंच में ही है, बस चार हाथ की दूरी पर बना रहता है हमारी पकड़ में नहीं आता. नौ मन तेल जुटता नहीं कि राधा नाच जाती, हालांकि मुगालते में सब होते कि राधा आसपास ही है और कभी भी नाचने लगेगी, राधा की जगह राखियां और सुगन्धित अंडरवीयरवाली दूसरी तारिकायें टीवी के परदों पर ठुमके लगातीं. कोई शिकायत करता सब गन्द मचा रखा है, मगर अपलक टीवी देखे जाता. बाकी शिकायत की चैतन्यता में न होते, मन थकान और आंखें उनींदेपन में भरी होतीं, सत्यनारायण की कथा की श्रद्धा की तरह, घर से बाहर ‘फिर पैसे कम पड़ गए!’ के झमेले और घर के भीतर टीवी की सुगन्धि-सहेलों में फंसे होते. खबर रहती नील नदी है, इसी दुनिया में कहीं है, जैसा नीला सामने की दीवार पर होता, मगर दिख नहीं पाता.. लड़की हदसकर सवाल करती, सच बताओ, मुझे जानते हो? लड़का घबराकर जवाब देता, रोज़ तो मिलते हैं फिर ऐसा सवाल क्यों? लड़की हारकर कहती मेरे शरीर से मिलते हो, मुझसे मिले कभी? शरीर से परे लड़की से मिलने का सवाल ऐसे सकतेवाला जंजाल होता जैसे टिकमगढ़ से गुज़रती रेल की सवारियों को घेरकर बताया जाना कि टिकमगढ़ दीख रहा है, लेकिन भूखमरी झेलती महज पैंतालिस की उम्र में बुढ़ा रही शांति बाई है समइ में अनाज मिलाकर किसी तरह ग्यारह बच्चों के परिवार को जिलाये रखने की कोशिश कर रही है, पड़ोस का वह भहराया बड़ा गांव और उसके तंगहाल बाशिंदे दीखते हैं? कुछ दिनों पहले एनडीटीवी 24X7 में राधिका बोर्डिया दिखी थी, उत्तर प्रदेश का क्या तो वह सूखा ग्रस्त जिला था, हां, हरदोई था, देहात में भीतर घूमते हुए घरों का हालचाल ले रही थीं, ज़्यादातर घरों में औरतें थीं और अपना हाल कुछ बता पायें इसके पहले ही आंखों से पानी बहने लगता था, कातर रोने लगती थीं, कि बहिनी, बड़ भुखौटी है, खाने भर को अन्न नहीं, कहां जायें, का करें? टीवी पर, उस थोड़े से समय के लिए, वह दुखियारी औरतें दीख रही थीं, टीवी के बाहर वह ठीक बाजू में होती हैं, मन पर काला चश्मा न भी चढ़ा हो, भारी अंधकार जमा होता है, आंखें कुछ भी देखने से इंकार करती रहती हैं.
‘एन इवनिंग इन पैरिस’ और ‘लव इन टोकियो’ देखा होगा, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क तब भी थे, और आज जहां हैं वहीं थे लेकिन तब ‘अराधना’ और ‘आन मिलो सजना’ के राजेश खन्ना को नहीं दिख रहे थे, दार्जीलिंग की छोटी पटरी पर जीप में हाथ डोलाते खुद को बहकाते अपने सपनों की रानी दिख रही थी, उन संकरी पहाड़ी सड़कों पर गोरखा संसार का अंतरंग बाज़ार कैसा दीखता होता, उसे देखने का होश न रहा होगा. ‘सीता और गीता’ ही नहीं, धर्मेंद्र की बीसियों फ़िल्में होंगी विलेनी का सकल अवतार शेट्टी के गंजेपने में ही दिखता, और एक बार उस गंजेपन को फोड़ उसपर चोट की लाल लकीर खींच चुकने के उपरान्त दुनिया में शांति लौट आती, दर्शकगन निश्चिंत अपनी चिरकुटइयों में फाजिल-नाजिल होने लौट आते. विशाल भारद्वाज की फ़िल्म की दूसरी जो भी खामियां हों, अच्छाई उस अकुलाहटभरे मिजाज को पकड़ने में है जिसमें कहीं कोई चैन से नहीं, नशे में टुन्न बेवड़ा तक नहीं, और ‘विलेनी’ इसमें और उसमें केंद्रित होने की जगह सब कहीं, चहुंओर-वारी है, चरित्रों के अपने होने से ज़्यादा उनपर भारी है, लोग कुछ इस हद तक कमीन हो गए हैं कि कमीनापन हमारे समय की लोरी हो गई है!
नील नदी कहां है, दिखती है? कभी मणिपुर घूमने जाएंगे, उसके मर्मांतक विहंगम का साक्षात करेंगे? कि यूं ही हमारे देश का होगा हम उस मणिपुर के कभी न होंगे?..
फीकी नीलाइयों में रंगा अलसाया आसमान दिखेगा. रेल की पटरियों पर बहका, पीठ पर भारी स्कूली बस्ता ढोता एक बच्चा दिखेगा; घर से भागा हुआ नहीं, खुद के अपने पहचाने भूगोलों में खुद को खारिज करता, लड़खड़ाते पैर दौड़े चले जाएंगे, देखेगा वह दौड़ रहा है, अचानक उससे कहीं ज़्यादा स्फूर्ति से एक हरा मेंढक होगा, फुदककर पटरी छलांग जाएगा, बच्चे की आंखे अचरज में फटी रह जाएंगी, अलबत्ता उस अचरज को वह ठीक-ठीक पढ़ नहीं पाएगा, वैसे ही जैसे हम बच्चे को, रेल और मेंढक को अपने उनींदे हारिलपन में देखते हुए भी देख नहीं पाएंगे..