कैसे हैं? अरे, नाक में कब फुंसी निकल आई कनपटी के पीछे फोड़ी पहले से थी ही वाले आप महाशय से नहीं पूछ रहा, आपके बाजू जो वो प्रसन्नचित्तता चेहरे पर चिपकाये कुर्सी में धंसे हैं, तब से देख रहा हूं हांफ रहे हैं सांस लेना मुहाल हो रहा है उन महाराज की खैरियत पूछ रहा हूं, क्या बोले? क्या? ज़रा जोर से बोलियेगा, महाराज, इस उम्र में अब ये कान भी, ससुरे, सब सुनवाते कहां हैं? जहां लगता है बात टेढ़ी जा रही है अपना बहिरपना गिनवाने लगते हैं! क्या बोले? आपसे नहीं, वो पीछे महंगी खरीदारी की घटिया सैंडिल और स्लीवलेस पहनी देवीजी से पूछ रहा हूं, कि महफ़िल में तब से हम हैं, बाल्मिकी से लेकर वॉल्तेयर, बॉदेलेयेर को क्वोट कर सकते हैं, ज़्यादा यही होगा कि छह में चार जगह ही गलत कोटेंगे, मगर तब भी हमारी काव्यमयी बहुमुखी प्रतिभा दीखेगी ही, और देवीजी हैं कि तब्बो इधर देखती और उधर देखती जाने महफ़िल में किसे ढूंढ़ रही हैं! हमारी मोहिनी बोवारी, कजरारी कारेनिना, किसे ढूंढ़ रही हो, सुंदरी?.. कंकड़बाग वाला वह बीहड़ मकान, महान, कैसा है? याद है गलियारे के अंधियारे कितने मार खाये दोपहारे हमने साथ-साथ लुडो खेलकर बिताये थे? आपके साथ नहीं खेले थे? आपका ही खून था लेकिन आप नहीं मौसेरी छोटी बहन थी बाद में कौनो इंडस्ट्रियल डिज़ाइनर को व्याहकर भिलाई स्टील सिटी चली गई थी? अच्छा ही किया था, हमारे साथ गई होती तो हम कंकड़बाग से निकालकर बीहड़बाग लाये होते और तीन साल में वह चिंहुकने लगती कि व्याह इज़ सच डेटेड एंड ऑब्सक्योर इंस्टिच्यूशन और बीहड़बाग में तीन मग से मुंह धोते रहने की जगह बैंकूवर गई होती तो कैसे बाथटब से सोती, और मुंह ही नहीं समुच्चे देह चमचम चमकाती, धोती! लेकिन देवीजी, बैंकूवर तो गई थी न? ओहोहो, आप गई थीं, मौसेरी छुटिया बेचारी वहीं भिलाई में भटकनी खेलती रह गई थी? ओहोहो, सो सैड.. लेकिन होता है ऐसा. कहां-कहां के टंटे में नहाकर फिर भी जनाना, मर्दाना, माथे पर रोज़ जीवन की लाल टिकुली साटते ही रहते हैं! यस, यस, दैट इज़ लाइफ़, जस्टली सेड. वही तो. वो पीछे नीली टाई डाले, धीमी-धीमी मुस्की काटते वो खुशमिजाज भाई साब बैठे हैं, बता रहे थे, क्या बता रहे थे, भाई साब, खुदी बोलिये न?..
देखिए, हमसे हिलग-हिलककर सुना रहे थे, अब खुद बोलने को बोल रहे हैं तो इन्हें लाज लग रहा है! क्या बोली थीं आपकी मिसेस, आप बोलियेगा कि हमीं महेंदर कूपर के राग में गा दें?..
रहने दीजिए. प्रायवेट मामला है, ऊपर से मिसेस का है, ज़रा ठहरकर बतायेंगे, बीस-बीस और तीस-तीस साल की शादी में तीन मर्तबे तो दाम्पत्य में ऐसे मौके बनते हैं कि साथ के साथी की बात से मन जुड़ा जाये, आदमी उसे फट से सार्वजनिक कर दे फिर शादी में बच्चे, लोनवाला घर और पता नहीं किस-किसकी देनदारियां बचेंगी, सहोदरता के सुहाने सीन्स की मार्मिकता कहां बचेगी?
ओ पीछे की सीटवाली चोट खायी हमदम, इतनी गुमसुम हैं, आप सुनाइए, किस बात का ग़म है? किसने दिल दुखा दिया, रोते में जगा दिया, हमसे न कहतीं वो दाईं ओर वाले महीन आवाज़ के हसीन खूंखार हैं उन्हीं से हाले-दिल कहा होता? हमारा जी हल्का किया होता? कह रही हैं वही कर रही हैं? नंबर लिया है एसएमएस कर रही हैं? अच्छा है फिर मैं खामख्वाह कसैला हो रहा हूं.. देखिए, देखिए, कैसे होंठों पर हंसी आई है! उनकी नहीं, भले आदमी, उनकी, उनकी!..