Wednesday, September 30, 2009

मछलीघर

गए इतवार भास्‍कर में एक कहानी छपी थी, उसी को चिपका रहा हूं..

भायंदर में जहां बोउ दी का घर है पीछे की खिड़की या जंगलेनुमा बालकनी से पीछे पटरियों का जाल, या सीधे-सीधे गाड़ि‍यों का आना-जाना नहीं दिखता, भोर से देर रात तक उनकी थरथरायी बेचैनी कानों में उतरती है, और उनके गुज़र जाने के बाद भी देर तक माथे में गूंजती रहती है - ‘खट्-खट्-खटाक!’, ‘खट्-खट्-खटाक!’.. बोउ दी मिताली को समझाती है, ‘तू ध्यान देना बंद कर दे, देखना फिर सुनाई नहीं देगा! शुरु-शुरु में हमको भी ऐसे ही तकलीफ होती थी..’

यहां, मुंबई आये कुल तीन महीने हो गए लेकिन ध्यानन देना मिताली अभी तक बंद नहीं कर सकी है.

किसी पड़ोसी का किस्सा सुन रही हो, बोउ दी को बाल काढ़ते गुनगुनाते देख रही हो, उंगलियां लहसुन छीलती हों, या झुमुर की गीली जांघिया बदलने में मन फंसा हो, सबकुछ अपनी जगह अचानक अटक जाता, हवा में एक बेचैन थरथराहट-सी उठती, और फिर पलक झपकते में वही ‘खट्-खट्-खटाक!’, खट्-खट्-खटाक!’..

दीवार से छूटकर बायें हाथ छिपकली गिरी, दायें से झटक उसे परे फेंक दिया की तरह दिन किसी तरह निकल भी जाता, लेकिन रात.. अंधेरे सूनसान में गूंथे शोर के सांपों सा उसके अवचेतन में कुछ दौड़ता रहता, कनपटियों पर रह-रहकर एक अस्थिर कर्कशता बजती रहती- खट्-खट्-खटाक! खट्-खट्-खटाक!

झालदा में सब इससे दु:खी थे कि इकतीस के पहाड़ से छूटकर बत्तीस पर गिरी लड़की से अब कौन शादी करेगा, फिर इससे होने लगे कि शहर में इतने बंगाली हैं लेकिन इसे ट्यूशन पढ़ाने को एक आदिवासी का घर ही मिला? ठीक है ट्यूशन के पैसों से अपना शैम्पू -नेल पॉलिश करती है लेकिन किसी बंगाली लड़की के चर्च जाने की बात सुनी है किसी ने? वह भी अपने से उम्र में चार साल छोटे उस टोप्पो छोकरे से चिपककर, उसके बाइक पर पीछे बैठकर?

खट्-खट्-खटाक! खट्-खट्-खटाक!.. मिताली अंधेरे में झुककर सुनने की कोशिश करती है कि नन्हीं झुमुर की सांसें इस झंझावात में अविरल अपने को बचा ले जाती हैं, या बेकल शोर हर बार आकर उन्हें लील लिये जाता है, फिर छाती पर हाथ बांधे चुपचाप अपलक आंखों अंधेरा तकती रही. दूसरे कमरे से सुरोजीत दा की नाक एक लय में अपना बाजना करता रहा.

झालदा में भी सब एक पहर की नींद पूरी कर लेते थे मिताली अंधेरा तकती जगी रहती. बोउ दी के यहां आकर इतना ही फर्क़ हुआ है कि जगने को देखो, पलकों पर चींटियां चल रही हैं जैसा एक बहाना हो गया है. खट्-खट्-खटाक!

सुरोजीत दा गंजी ऊपर सरकाकर नीचे भारी, गोरा पेट खुजाते मिताली को समझाते हैं, ‘तोमरा दी हर चीज़ तीन बार बोलके बताती है, काहे? तुमारा भलाई बास्ते. पराया जागा कुछ उल्टा-सीधा हुआ फिर दोष लोक किसको देगा, बलो?

मिताली चिढ़कर जवाब देती है, ‘क्या उल्टा-सीधा हो जाएगा? रेलवे फाटक तक जाऊंगी तो क्याच उधर आमिर खान मेरे को चोरी करके ले जाएगा? जेइ कथा गुलो तुमि बलो, दादा!

दादा ने कभी आपत्ति ‍ नहीं की लेकिन बोउ दी को मिताली का बाहर निकलना पसंद नहीं. मिताली दी से जिरह नहीं करती, जैसा जो-जो बोउ दी कहती है वैसा-वैसा कर देती है. लेकिन वैसा-वैसा करते रहकर भी फिर एक बिन्दु आता है अपने से हारी मिताली का मन उचट जाता है. ये ऐसे करो वो वैसे करनेवाली मिताली थक जाती है, और फिर झुमुर गोद में हो तो अच्छा, नहीं तो यूं ही अपने अकेलेपन के ही दुलार में चोट खाये मन का दुनिया देखने का ढंग समझने मिताली बाहर निकल आती है. इसलिए नहीं कि बोउ दी की नज़र बचाकर वह किसी एसटीडी बूथ के शीशों के पीछे अपने कटी पतंगपने का कोई ठौर पा लेगी, नहीं. वह तो बोउ दी सोचती हैं उनका वहम है. बोउ दी का, बिश्टु , खोखोन, ताप्ती दी और मामुनि का.

दूसरों की शिकायती कहानियों में जीनेवाले कहते रहे और सच ही कहे जोसेफ टोप्पो की बाइक पर उससे सटकर बैठी थी मिताली. सही है, एक बार नहीं बहुत बार बैठी है, तो? किसी के बाइक के पीछे सटकर बैठने से बाइक के पीछे बैठना ही होता है, दिल में गड्ढा करके खुद को भूल लेना होता है किसने कहा? बिश्टु, खोखोन और ताप्ती दी को जो सोचना है सोचें, उनकी सोच से मिताली पहले जीवन नहीं चलाई न आगे कभी चलायेगी.. क्यों कि दिल में गड्ढा कर लेना, खुद को भुलाकर पत्ते की तरह हल्का‍ हो लेना क्या होता है जानती है, जियी है मिताली! उस गड्ढे की अंधेरी मदहोशी में किस तरह अपना सबकुछ कहीं छोड़ आई खो ली लड़की कितने वक़्त बाद तक आईने में खुद को देखकर हंसती कभी चुपचाप आंसू बहाती होती, वह तो नहीं देखा बिश्टुं ने! खोखोन और ताप्ती दी ने! बोउ दी समझती हैं जानती हैं मिताली को, नहीं जानतीं.

मिताली खुद भी क्या खाक़ जानती थी. उसको तक कितना जानती थी. सच! कितना शातिर, कैसा पहुंचा बहुरुपिया था, किस बेरहमी से छला एक बेवकूफ़ बेचारी भोली लड़की को. छील गया!... ओ रफीक़, केनो, कोथाय गायब हुए तुम? क्यों? क्यों? ऐसी थी तुम्हारी वो फरहत, जैसी मिताली सात जनम में नहीं होती, ऐसी?.. याद में अपमान से चेहरा दहक जाता है. सेइ दू कोड़ी मेयेर जोन्ने? जिसको नज़रुल गीती तक का शउर नहीं, उसके लिये, उसके? कितनी बार मन हुआ कहीं से छुरा लेकर आये, घोंप आये उस बदकार बदजात लड़की के सीने. उसके बाद फिर वो निमकहेराम रफीक.. एक बारे सब खेला खतम!..

रफीक, केनो.. फिरे आओ ना आमार काजे, आर एक बार? लौट आओ लौट आओ! मेरे पास! अपनी छाती में छिपाकर तुम्हारी सब दुश्टामियां माफ़ कर दूंगी, तुमको मन के सबसे उजले कोने बचाके रखूंगी, जनम-जनम, तुमि देखबे!...

खट्-खट्-खटाक!

जगर-मगर लगे घरों की तंग गली में मिताली भोली उम्मीमद बुनती है कि भीड़ और अजनबियत के रेलों में मन के अंदर रह-रहकर उठता बेहोशी ले आनेवाला यह बवंडर शायद भूल जाये! भूल पाएगा?..

गली के आखिर की ओर एक मछलीघर है. अलग-अलग रंगों के काँच के टैंक में मचलती-दौड़ती गोल-गोल घूमती मछलियां. जब कभी वहां से गुज़रना हुआ, थोड़ा बगल होकर मिताली उन मछलियों को नज़र भर देखना छोड़ नहीं पाती. दूकान की संभाल करता एक कमसिन-कमज़ोर गोरा लड़का है, मछलियों को कम, बाहर आंखें किये कुछ ढूंढता रहता है, जल्दीर-जल्दी गोद के पैड पर पेंसिल से कुछ उकेरता रहता है, ड्रॉईंग करता है? वह नज़रों से हट गई है, फिर भी कुछ दूर तक लड़के की आंखें गली में उसके पीछे-पीछे संगत में चलती रही हैं का ध्यान पहले भी किया है मिताली ने, लेकिन घर लौटने पर एक कमसिन-कमज़ोर गोरे लड़के ने देखा और क्यों देखता रहा की याद नहीं रहती. जबकि रफीक रहता है.. याद.. शोप्न देखी एकटा नतून घॉर...

आज मिताली को देखते ही लड़का खड़ा हो गया, असमंजस में सूखे बालों पर हाथ फिराता बाहर निकल आया, कुछ कहना चाह रहा था, या आवाज़ देकर मिताली को रोक रहा था?..

मिताली को अच्छा नहीं लगा. मिताली मछलियां देखने ठहरी थी, इसलिए नहीं कि लड़का इशारा करके उसकी तरफ़ आए! खीझी, इंकार में सिर हिलाया और तेज़ी से चलकर घर लौट आई.

मन में एक धुंधली, अप्रीतिकर तस्वीर बनी, ‘के दुश्टामी, देखो तो?’ फिर उस धुंधलके पर थकान और खीझ का धीमे-धीमे रिसना गिरता रहा- खट्-खट्-खटाक!

सुरोजीत दा के कोई परिचित हैं गोरेगांव किसी फैक्टरी में काम निकला है, सेफ़ और सेक्योर है का सुझाव लेकर आए, लेकिन फिर बोउ दी ने मना कर दिया इतनी दूर मिताली रोज़ गोरेगांव कैसे जाएगी. दादा हाथ खड़ा करके बोले, ‘फिर क्या? इधर भायंदर में ठेकना मिला, जॉब भी मिलेगा?’

मिताली ने कुछ नहीं कहा. कहकर क्या फ़ायदा? सब सुखी हैं कि घेरकर बोउ दी के यहां सुरक्षित बंद कर दिया गया है तो वह भी रहे सुखी. सबको दु:खी कर-करके थक नहीं गई है? काँच के टैंक में घूमती गोल-गोल मछली..

पैरों के पास गिरे खिलौनों को दूर ठेलती झुमुर की गोद में सिर रखकर सो लेना चाहती है मिताली. कितनी-कितनी अनसोई रातों की सब सारी नींदों का पूरा होना बाकी है, कब सोयेगी? कभी सोयेगी, मिताली?

अचानक पीछेवाली खिड़की हिली है, हवा में दबाव बना है, खिलौने पर झुकी झुमुर चौंकी, और फिर वही परिचित घड़घड़ाहट में घर की दीवारें डोलने लगी हैं- खट्-खट्-खटाक! खट्-खट्-खटाक!

गाल पर किसी कीड़े के डंक का होश आया हो की तरह अचानक डरी झुमुर पलटकर मौसी की ओर लपकी जार-जार रोने लगी है, और बाहर के शोर और बच्ची के रोने का कुछ ऐसा सांगीतिक तारतम्य बना है कि रोती बच्ची को गोद में ऊपर किये मिताली जोर-जोर हंसने लगी है!

रसोई से भागी आई बोउ दी सवाल करती है, ‘क्‍या हुआ क्या, रे?’

रोती बच्ची के पैरों से माथा लगाये मिताली हंस रही है उसे दी का सवाल नहीं सुन पड़ता. उन क्षणों दिन को बेरहमी के बाजे में गूंथे वह कानखोर शोर भी थोड़ी देर के लिए गुम जाता है- खट्-खट्-खटाक! खट्-खट्-खटाक!

***

Tuesday, September 29, 2009

घिसकारियां..

बहुत दिनों से बहुत सारा पेंसिल झोला में खोंसके एहर-ओहर हो रहे थे, पेंसिलयाने में मन जाने कैसा सकुचाने लगता था. तो सोचा- इतना सोचकर नहीं सोचा- कि इस सकुचाने, खराब हो जायेंगे फिर खुद को क्‍या मुंह दिखायेंगे की चोट खाने से खुद को बचाते रहने का भी क्‍या तुक.. तो आगे नाथ न पीछे पगहा वाले अंदाज़ की कुछ चिचरीकारियां हैं, ज़रा संभल के चलो, बाबू की बेक़रारियां.. दिल पर मत लीजिएगा, मैं भी इन दिनों कोशिश करता हूं मैथिली और सिरिल गुप्‍ता न बनूं, दिल पर जितना ऑलरेडी बहुत पहले से लिए हैं, उसी का बोझ बहुत है..











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Sunday, September 20, 2009

साढ़े तेरह रुपिया में एगो पाकेट..

फिर.. फिर? सुख का दवाई, मनोरमवा का भगाई, बिष्‍णु का पढ़ाई, जूता के कीनाई.. केतना-केतना मर्ज़ है, सोचे में हर्ज है कि जी, ऐतना सब दर्द है?..

Thursday, September 17, 2009

बाबू के बड़के पप्‍पा का परिचय-पोस्‍टर

मुंह बिराना जानते हैं. मटका-मटकी
नयन नचाना, औंजाये गोड़ डोलाना
जब्‍बो-तब्‍बो असहीं गरियाना, गरियाके
फिर गोदी सटाना, दुलराना जानते हैं
बड़के पप्‍पा बाबू को बहुत मानते हैं.

बेख़बर रात-बेरात कबहूं धमक जाना,
चहुंपते ही धमकाना कि जा रहे हैं
चदरी ताने घामा निकले तक नाक
बजाना, उठते ही चाह-चाह के हल्‍ला
फैलाना, ढोंड़ी में मुंह साट के बाजा
बजाना, बाबू से हीहीही ठिरिरी-रिरी
कराना, ठाड़े ढिमिलवाना जानते हैं
बड़के पप्‍पा बाबू को बहुत मानते हैं.

नहाये घर मोम्‍मद रफी बुलाना
मोकेश के मामा का बैंड बजाना
खाये के थाली में फोटो बनाना
नीचे ठाड़े-ठाड़े ऊपरे पेड़ से कूद
जाना, सैकिल पे देख आये ज़माना
के गाना गाके फुसलाना जानते हैं
बड़के पप्‍पा बाबू को बहुत मानते हैं.

बाबू रोता है तो बड़के पप्‍पा चिचियाने
लगते हैं, सच्‍ची में, मने बहुत घबराने
लगते हैं, देखाई में बोलते हैं, अरे
हटाओ ई छौंड़ा को इहंवा से, भीतरे
भीतर थरथराने लगते हैं, बाबू बोलता
है अभी ठरिये, नै जाइये, बड़के पप्‍पा
पप्‍पा बोलते हैं घरे रहेंगे, खायेंगे क्‍या
बाबू को दुलराके अंधारा उजरवायेंगे
पटरी पर गठरी का गोल-गोल गाल
बजायेंगे क्‍या? बाबू, निष्‍ठुर ज़माना है
तुमरे बड़के पप्‍पा दीवाना हैं, शहर में
अंधारे का मंज़र में उनका मेहनतामा है
फेन आयेंगे, आएंगे नहीं तो फेनसा कहां
पायेंगे? गाल का काटा लेके, मुंहे फंसा
हुआ टाफ़ी का साटा लेके, अपने बाबू
को अबहीं कहां पहचाने, पहचानते हैं?
बड़के पप्‍पा अपने बाबू को बहुत
बहुतै बहुत सानते हैं, मानते हैं?

Wednesday, September 16, 2009

शैलेंदर वाला वो गाना था.. ओह, कितने तो थे!

बाकियों से कुछ अलग खड़ा एक मुंह बिगाड़कर ख़बरदार करता है, इतना पिटे अब संभल जाओ हमारे फेर न पड़ो, हवा में उकेरी लकीरें हैं मुहब्‍बत की तरह बाद में साथ देने को सिर्फ़ दर्द की तस्‍वीरें होंगी, हम होंगे कहीं पराया घर होगा, किसी और के सपने में होंगे!..

सपने की आवाज़ रूखी है, अंदाज़.. क्‍यों रूखा है? जैसे कुछ दिनों पहले जंगल के गहरे तलघर हाथियों का एक पथभूला दल मिला था, सिर नवाये, ललकभरी अपनी सहज ऊंचाइयों से सूखा. किसी अनजाने जंगल के बेगाने खेल में कैसे बेवकूफ़ थे क्‍यों जाकर फंस गए की हार में शर्मसार, वापस अपने ठौर लौट रहा था. पराये शहर पराये लोगों के बीच घबराहट में आवाज़ अटककर कैसी तो रूखी निकलती है, उसी उदास रुखाई में एक हाथी ने इशारा किया, हमारी क़ि‍स्‍मत, किसी फ़रेबी गाने में बहक गए, मगर तुम तो समझदार दिखते हो इन अंधेरी छांहों में कहां-कैसे उलझ गए?

आदमी ने चौंककर डूबी नींद में भीतर अवचेतन का कोई एक और जंगला देखा था, जंगले के पार सफ़ेद पंखोंवाले हाथी थे नन्‍हें मेमनों से भी ज़्यादा हल्‍के थे, अपने कंधे थपकियां देता आदमी उन चोटलगे पंखों को सुलाता, सहलाता रहा था..

एक आवारा औसत घरबार, परिवार भूला कुत्ता दिखता, जाने किस निर्दोष निश्‍छलता में नहाया, ललक की चौंध में उमग की नोंक पर सवार सबको पीछे छोड़ आगे कंटीली झाड़घने रस्‍ते दौड़ा जाता, खूब दूर निकल फिर न्‍यौते की मुनादी पीटता, ‘भौं, भौं!’

रोज़-रोज़ के कटने-पिटने, ख़ून और खखारभरी सड़कों पर दौड़ते-भटकने में भी आदमी के होंठों एक फीकी हंसी आकर सज जाती कि देखो, ऐसे दुर्दिन में भी नहाने को सपना है! पानी में डूबे हाथों की नम-रसनहायी उंगलियों पर प्‍यार की थरथराहट है! क्‍या राज़ है कैसे बनी रहती है थरथराहट, कैसे थिरता में अचानक डोलकर उभर आता है सामने सपनादार जल?

औरत कहती है कहां खो गए क्‍या खाओगे, बोलते क्‍यों नहीं? आदमी मिश्रीवाली आवाज़ में दुलार से कहता तबसे कह ही तो रहा हूं, तुम्‍हीं हो, कहां सुन रहीं..

***

सपने के भीतर एक और सपना होता. जैसे पिता होते मुस्‍कराते हुए, वहीं बगल के सपने में ताज्जुब और अविश्‍वास में सिर हिलाते दिखते, जीवन में हारे रहा, अब सपने में अभिनय करना सीख गया है! कुछ दिन हुए स्‍कूल के दिनों का एक साथी दिखा, दूसरे में वही बताता कि तुम मुझे पहचानोगे नहीं, क्‍योंकि कितना अर्सा हो गया स्‍कूल के छत से गिरकर मुझे मरे. इस सपने की कोई बड़ी शख़्सि‍यत दूसरे सपने में जाकर छोटा हो जाती है, गंदे नाखूनवाले मामूली पैर, सूती का मामूली शर्ट. फिर कितने चेहरे ऐसे जो कितने-कितने सपनों का देखना निकल जाता, नज़र नहीं आते. और जब मन समझता है पता नहीं किसके जीवन की बातें थीं अब तो कुछ याद भी नहीं, तो अचक्‍के फिर किसी भूली फ़ि‍ल्‍म के बिसराये-बासी पोस्‍टर पर उकरे उभर आते हैं. सपने के भीतर वहीं कहीं छिपे जाने कितने और सपने होते! कभी-कभी तो खुदी को भूला आदमी आज़ि‍ज़ इससे निकलकर उसमें और किधर-किधर आवाज़ लगाकर खुद को ढूंढता फिरता, इस बात की ख़बर रहती कि इतने सारे तैरते दृश्‍यों में वह है वहीं कहीं, किसी छोटे किरदार की शक्ल में ही सही, है, लेकिन अपने को छू नहीं पाता..

***

फ़ोन पर दोस्‍त चिढ़कर कहता है क्‍या सपना-सपना लगा रखा है, जाकर पूछो सपनों से जानोगे वे भी खुद से कितना विलगे हुए हैं! आवारा लोगों का टाइमपास है, घर अगोरती औरतों के बहलने के झांसें हैं सपनों की कोई सड़क है तो वह कहीं जाती नहीं, हाथ में हरा देखने का हौसला करो, कब तक फिजूल की हरियालियां तकते फिरोगे?

ऐसा नहीं कि दोस्‍त स्‍वयं सपना नहीं देखता, पहले एक लड़की के प्रेम में हॉस्‍टल की दीवार से कूदकर पैर तुड़वा लिये के पागलपने सा दीवाना सपनालोक था, अब सपनों की एक प्रॉपर आर्काइविंग है, टैग्‍ड एंड प्रॉपरली फ़ाइल्‍ड. जैसे सरकारी दफ़्तरों और अस्‍पताल के दराज़ों में होता है. तरतीबवार, सब क्रॉनॉलिजिकल ऑर्डर में. रात को सोते समय तकिये के नज़दीक दवा के उचित खुराक़ की तरह सपनों की माप होती है..

***

किसी और के सपनों में चले आये हों और ज़रा सा दरवाज़ा खोलकर किसी और की स्‍त्री हैरत से सवाल करती हो, जी, बताइये?.. किसी और के सपनों की पटरियों पर किसी और के सपनों की रेल की सीटी छूटी हो, धड़-धड़-धड़ाक डिब्‍बे एक के पीछे एक दौड़ने लगे हों..

कोई डेढ़ेक साल का बच्‍चा, सांवला, हाय, कितना सजीला-गर्वीला, सुबह से मुंह फुलाये, आंख चुराये हो, अचानक खिलखिल हंस दे, प्रेमविह्वल नज़रों से छाती भीतर तक लपकती लपटों-सा भक्‍क् एकदम भर दे, आंख नचाये, नेह बरसाये, अपनी भोली हंसी में छिपाये जैसे कोई गहरा राज़ खोल दे, 'फिर?'

रुखाई नाकचढ़ायी सपनायी मुरझाई एक ओर कलेजा दलती बैठी रहेगी, सफ़ेद पंखों पर सवार सजीले सपनीले नीले हाथी उड़ते आवारा फिरेंगे.. शैलेंद्र का 'हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा!' हौले-हौले मन के पुराने ट्रांजिस्‍टर पर बजता होगा.. वहीदा बुढ़ाती होगी तो भी क्‍या रहमान के रहम भी तो रह-रहकर बरसते ही होंगे!

सीढ़ि‍योंवाले कमरे में सत्तर पार के शिखर का वह बच्चा..

बच्‍चे के बच्‍चे दोस्‍त नहीं बच्‍चे की अकेले की दुनिया है. घंटों एक जगह थिर बैठे दीवार तकते रहने का बच्‍चे को अभ्‍यास है, या मकान की सीढ़ि‍यों पर स्‍टैच्‍यू बने बैठे बगल से गुज़रते पैरों को देखकर किनके हैं पहचान लेने का. बच्‍चे ने बाहर खुले में घास के मैदान कभी देखे हैं, बहुत नहीं देखे समुंदर के ठाठ बादलों की बारात नहीं देखी, घर के अकेले सूनसान में किताबों में दबी तितलियों की तस्‍वीरें देखी हैं. बाहर किसी और घर में रेडियो सीलोन पर गाना बजता है, बच्‍चा नज़रें उठाकर गाने में कौन दुनिया है क्‍या गा रही है भूलकर कभी गाने की संगत में सोचता कुछ देर अनजाने भावों में घिरा अनमना, अस्थिर बना रहता है, आवाज़ निकालकर वह भी गा सकता है की जांच में वह गुनगुनाता नहीं. मकान में दूसरे काफी होंगे बच्‍चे ने देखा है लोगों को साथ और अकेले गाते, गुनगुनाते हुए, अपने को देखे इतनी रौशनी, ऐसी चंचलता में उसने खुद को नहीं देखा..

बाहर दूसरे और बच्‍चे हैं लेकिन बच्‍चा समझता है मैं अलग हूं और वे और हैं. बच्‍चों की मांएं तश्‍तरी में खाना लिए उनके पीछे भागती हैं, एक कौर, सिर्फ़ एक और की मिन्‍नत करती हैं, बच्‍चे की कभी ज़रूरत नहीं बनी कोई उसके पीछे घूम-घूमकर मिन्‍नत करे, क्‍योंकि बच्‍चे को भूख लगती है उसे पता होता है कहां देगची में रोटियां ढंककर धरी हैं और कैसे उन्‍हें गुड़ में लपेटकर खा लेने से भूख और कमज़ोरी भूली जा सकती है. कभी ढंकी देगची के भीतर रोटियां न बची रहें तो और क्‍या कैसे खाकर थोड़ी देर ज़िंदा कैसे रहा जा सकता है की तरकीबें जानता है बच्‍चा.

घर लौटने के बाद कपड़े बदलकर बहुत बार पापा स्‍टील की आलमारी है उसके दरवाज़े को ज़रा सा खोले उसके आगे खड़े रहते हैं. बच्‍चा जानता है आलमारी में कितना अंधेरा है एक औरत की मढ़ी फ़ोटो है, वह फ़ोटो नहीं देखता पापा सबकुछ भूले, खोये अंदर अंधेरा तकते जाने क्या सोचते रहते हैं देखता रहता है बच्‍चा. एक दिन वह भी पापा की तरह आलमारी के दरवाज़े को ज़रा सा खोले अंदर का अंधेरा सब तक लेगा. जितना जैसे-जैसे जो कुछ खड़े-खड़े सोचते हैं पापा किसी दिन वह भी सारा वह सोच लेगा..

पापा की एक साइकिल है. नीला शर्ट और जूता है. चश्‍मा और पेन है. पापा सिर्फ़ काम की बात करते हैं, ऐसे ही करने के लिए करें की बात की पापा को आदत नहीं. गाने की तो एकदम ही नहीं. सिर्फ़ जांचने के लिए बहुत बार बिस्‍तरे में लेटा बच्‍चा उठकर पापा के पीछे जाकर खड़ा हो जाता है, कि पापा को अचानक उसके पीठ पर खड़े होने की सुध होगी और पापा चौंक जाएंगे, लेकिन पापा को सुध नहीं होती. चौंकने की तो पापा को जैसे आदत ही नहीं. बच्‍चे ने भी कितनी बार कोशिश की है कि वह चौंककर देखे चौंककर वह कैसा दिखता है, मगर फिर चाहकर भी बच्‍चा चौंक नहीं पाता.

इतनी रात हो गई अभी तक जगा है लेकिन जगे होने के ख़्याल में बच्‍चा चौंक नहीं पाता. पापा लैंप की रौशनी में टेबल पर झुके हुए अभी भी लिख रहे हैं. आखिरकार हारकर बच्‍चा बिस्‍तरे से उतरकर पापा के बगल जाकर खड़ा हो जाता है. पापा लिखते-लिखते बातें कर रहे हैं, बच्‍चे से नहीं कर रहे. बच्‍चा करना चाहता है फिर कुछ सोचकर चुप खड़ा रहता है.

Tuesday, September 15, 2009

सुबहीं-सकाली, फीन ओही पुरिनका गारी, गे सखी, केतना अच्‍छा लगता है!

“हमरा किलास का नहीं, जूरियन (जूनियर) लइकी सब है हो, सुबीरन, एगो बंगला है दूसिरकी गुजराती है, बेलाउज पर आसाराम बाबू जी का बैज साटे रहती है, शनिचर का शनिचर उनका फोटो गलियारी में टांगके उनका गोर पे माथा फोर-फोरके आरती अऊर भजन सब गाती है! हम शेकायत नहीं करते हैं, शेकायत काहे ला करेंगे, जी? ओ लोक को जो अच्‍छा बुझाता है, करता है, वइसे भी बंगला-गुजराती लइकिन है, हमरा जूरियन सब है, हमको जो अच्‍छा बुझायेगा हम ऊ करेंगे, नहीं जी? उनका लिए आसाराम हैं, अऊर हमरे बास्‍ते हमरे देवधर भइया हैं! सुने हो कि नहीं, जनार्दन? ओहोहो, कइसा तो मीठा-नसीला सलबत वाला बात सब बोलते हैं, सगरे कान में हरमोनिया का परदा सोहाने लगता है!”

“के नसीला सलबत घोलता है, हो?”

“कितना अच्‍छा लगता है!”

“क्‍या बोले, देवधर भइया? एक हाली फिर से बोलिये न!”

“केतना तो अरमान लेके दुआरी पे फुलकारी किये थे! एतना मोहप्‍पत से एक-एगो गमला रोपे थे, अऊर देखिए, चंदिरका जी, ई करमखोर बकरी को, कवनो गाछ सोगहग नहीं छोड़ी है!”

“घुमाके चार लात लगाओ पगलेट को! अरे, तुम्‍मो आंधरे न हो, कार्तिक, बकरी को दुआरी, अऊर ऊहो गाछी का लगले बांधते हैं, बाबू?”

“राती का साग का पाता सब बचा है, और मुट्ठीभर सहजन है, दाल में डाल दें, दीदी? कि जेठ जी के लिए कटोरा भर पहिले अलग कै लें?”

“अगे! हंसुआ खेले का ची है, रे लइकी? हाथ से खून का धार छोड़ देगा तब्‍ब सुधायेगी गे?”

“लाल! कोमल, कमनीय, रौद्र क्‍या रंग नहीं लाल के और सभी रुपों में अच्‍छा लगता है. नज़दीक नवजात बच्‍चे की हथेली में देखो, चंचल कन्‍या के हंसते चितवन को देखो, आग की चमकती लपटों में.. सब कहीं लाल की शोभा है. क्‍यों है? इसलिए है कि लाल सच्‍चा है!”

“का बोले, का बोले? फीन से लीपीट कीजिएगा?”

“लाल सच्‍चा है बोले.”

“देखा रे, जनार्दन, देखा, देवधर भइया कइसा किस्‍टल किलियर बचन-बोली बोलते हैं!”

“चौबीस कराट का गोल्‍डन है! मीनिंग का गहिरका कुआं और शहद का गगरी है!”

“इहंवा कुट्टी कटवा के लाये हैं, कोई सैकिल से उतरवायेगा, हो?”

“जा बाबू, जा तनि चाचा के सैकिल थाम ले तS?”

“हम बहरी नहीं जायेंगे, लंगटे हैं, हमरा पाइंट सुखा रहा है, बुनिया ओपे पेशाबी कै दी थी!”

“ई बहिरी जा रहे हैं, संझा का नश्‍ता के लिए मर्किट से कुच्‍छो मंगवाये ला है, दीदी?”

“रजिन्‍नर कुमार का कवन फिलिम का गनवा था, जी? जे मोरा प्रेमपत्र पढ़के तू नराज ना होना कि तू मोर बन्‍नगी है, तू मोर दिल्‍लगी है!”

“पंड़वा के हियां सीधे ठोंगा से ई गरमा-गरम जिलेबी खाये हैं कि का बतायें, भउजी! कंठ तरके टोटली चरनामृत हो गया!”

“देवधर भइया कहां गए, हो? कोउची सुनाइये नै पड़ रहा है? ए माइक मास्‍टर, एक हाली फेनु अपना बाजा टेस्टिन करो, बाबू!”

“ओन-टू-थ्री-फोर! ओन-टू-थ्री-फोर?”

“कितना अच्‍छा लगता है! लाल.. गुलाल..”

“जय हो, देवधर भइया! सिर्र-सिर्र.. जिय, राजा!”

“ऐ कौन छौंरा सीटी मारा रे? ई गुंडा-बवाली का एरिया है, हो? रेसपेट्टि‍बल सोसायटी रहता है हियंवा!”

“हमसे नराज हैं त बोलिये न, दीदी? तबसे तरकारी का कटोरी लाके धरे हैं आप चीखके कुछ बतइबो नहीं कर रही हैं!”

“बुनिया फेनु पेशाबी की है, मौसी!”

“जनाना कपड़ा साटके घड़ी भर को नहाना-घर में गई ओतने में लेस दिया तू लोक को? बारह ठो छौंड़ा-बुतरी का घर में एगो बच्‍चा का पेशाबी नहीं संभला रहा?”

“बोल रहे हैं कान खोलके सुन लीजिए! सुबही-सकाली हमसे तू-तड़ाक का भासा मत बोलिये, हमरा बाबूजी आपका हियां गोड़ पड़के बियाह कराये नहीं गए थे, हां!”

मुसमात देवकी बो की परकी बिलार है खपड़ा पर का पसिरा सतपुतिया के पीछे टहिल कर रही है, भोजपुरी के चिरकुट्टन से बेपरवाह, हिन्‍दी का तो अब यूं भी कहते हैं डे फिक्‍स हो गया है.. एक बच्‍चा आंख पर हाथ धरे उसकी दिशा में तक रहा है पर बिलारिन कुमारी की नज़र जाती है तो वह अदा से गरदन मोड़कर कहती हैं, 'मिआऊं!' ज़ाहिर है अंग्रेजी में कह रही हैं. बच्‍चा हिंदी में बुदबुदाने की कोशिश करता है, 'मैं आऊं?' तो पीछे से उसकी मां झाड़ू फेंककर कौंकती है, 'देखो, ई छौंड़ा के, एही बदे तोहरा के कंवेंटी भेजे हैं रे?'

Friday, September 11, 2009

आदमी और उम्‍मीद अगोरती घरदबी औरत..



औरत के माथे चारदीवारियों के सितम हैं तो ऐसा नहीं उसी के हैं अपने ग़म नहीं.. हैं, बहुत हैं, फिलहाल नींद अगोर रहा हूं.. उससे आगे की लिस्‍ट पर चलूं? चलने लगूं तो फिर पता नहीं किस-किसकी नींद उड़ने लगे.. ख़ैर, एक मीठा, महीन अरमान तो यही था.. लेकिन क्‍या कहें क्‍या था.. प्रभुजन दीखा रहे हैं वह अरमान कम शैतान का घर ज़्यादा है. तो अकुलाया, असमंजस में सकुचाया उसे सुलाने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन आ कहां रही है, नींद, वही तो अगोर रहा हूं..

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Thursday, September 10, 2009

एक तिलिस्‍म नाम जिसका सलमा..











नाक की नोक पर दीख जाये, उंगलियों की गिरफ्त में पकड़ आये.. या क्‍या तो वो हैं उनके हुस्‍न के जादू और गेसुओं के रहस्‍य की तरह धुंधलके फ़रेब के तार बुनता चले, क्‍या होता है होता क्‍या है यथार्थ? प्‍लेट में सजा तरबूज तरबूज नहीं उम्‍मीद का एक झीना, लाल सुर्ख़ दमदमा होता है? मन की रुपहली, रंगीली लोरी होती है? लाल के पाल में गुंथे काले दाने वीराने में दीवाने बछेड़े घोड़ों की 'तिरे इश्‍क में' की 'बदहवाइयां', 'गुम जाइयां' कारवां होता है? होता क्‍या है यथार्थ? सिनेमा? क्‍या होता है?

(तज़ाकी डायरेक्‍टर बख़्तयार खुदोनाज़रोव की 1999 की फ़ि‍ल्‍म 'लुना पापा' से चंद स्‍नैपशॉट्स)

Wednesday, September 9, 2009

कैसा, जैसा प्रहसन

मैं सचमुच ताज्‍जुब में हूं. सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही का ठीक-ठीक गणित और भूगोल है क्‍या. या सब महज आंख में धूल (और आप स्‍वयं पीड़ि‍त हुए तो, मिर्च की बुकनी) फिंकवाने का प्रहसन है फार्स है क्‍या है? जज पता नहीं किस दुनिया के जीव हैं, बड़ा अजीबो-गरीब सस्‍पेंसफुल उनकी नियुक्तिओं का प्रोसेजर होता है, वैसा ही सस्‍पेंसफुल कुछ उनका जीवन चलता है (कोई दोस्‍त है आपका? जज, जिसे आप दोस्‍त कहकर बुलाते हों? पता नहीं वे किसे 'ऐ दोस्‍त!' कहकर बुलाते हैं! किनके बीच उठते-बैठते हैं, किससे अपने दिल का हाल बताते हैं.. किन संगतियों में समाज और समय के बारे में अपनी राय बनाते हैं).. ख़ैर, फिर कुछ मामले उनकी जांच में आते हैं, बाज मर्तबा बड़े, मीडिया में हल्‍ला-धूल-तूफान खड़ा किये, सनसनीखेज़ मामले होते हैं, फिर उनकी जांच की कार्यवाही शुरू होती है, बहुत बार कुछ मुग़ले-आज़म बनने के अंदाजं में एक उम्र गुज़र जाती है जज साहेब की जांच टीम अपने जांच को जांचने में जमी रहती है, बर्फ़ की सिल्‍ली का आकार बढ़ता, बड़ा होता रहता है, लड़कियां कॉलेज स निकलकर डेढ़ बच्‍चों की मांएं बन जाती हैं मगर जज साहेब की जांच का फै़सला नहीं आता. आ नहीं पाता. क्‍योंकि जांच अभी भी चल रही होती है! लेकिन फिर कभी-कभी जांच अपने मुकाम पर भी पहुंच जाती है, फ़ैसला सुना दिया जाता है.. या इस पर्टिकुलर केस में रपट तैयार कर ली जाती है.. फिर? इसके बाद की कहानी क्‍या होती है? जिनकी दोगलई की पहचान का यह लंबा खिंचा प्रसंग न्‍यायोचित उपसंहार की कहानी लिखवाता है? या वह कुछ हलकों में सार्वजनिक होकर (लेकिन ज्‍यूडिशियरी की आमदनी की तरह) आम सर्वजन के लिए गुप्‍तरोग बनी रही एक प्रहसन से निकलकर दूसरे प्रहसन में छिपने चली जाती है? लाल्‍टू के यहां नज़र गई तो मैं भी आंख में मिर्ची की बुकनी सजा रहा हूं, पता नहीं आप जहां खड़े हैं वहां क्‍या कर रहे हैं, आंख सहला रहे हैं.. या मुस्‍करा रहे हैं..

Tuesday, September 8, 2009

श्रद्धारत औरतें..


बच्‍चे देखने, और ज्यादा खुद को दिखाने आये हैं, श्रद्धा में खड़ी औरतें ही हैं.. और मेरी श्रद्धा में नहीं हैं. खड़ी..

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किताब..



हमारे धीरज का हिसाब लेती.. अदरवाइज़ निहायत चुप-भेदभरी, अंदर ही अंदर खुद से फुसफुसाहटों में बोलती, हमारी खातिर अपनी थिरता में डोलती.. क्‍या थी, हमारे पेंसिल में क्‍या हुई.. ओह, ऐसा स्‍थूल शबाब?

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Monday, September 7, 2009

सुआद मास्‍सी, मैं और पता नहीं कैसे-कैसे उड़ेले.. झमेले..

सुआद मास्‍सी गाना चाहती है, जुगलबंदी के सुख में नहाया मैं भी मनबहार गुनगुनाना ही चाहता हूं, मगर आजू-बाजू लोग चैन से रहने दें तब न? देखिए, किसी हरामी का फिर फ़ोन आ रहा है.. कि हीरामनी का है?

शीर्षकदीन..

Sunday, September 6, 2009

तुमि केमन करे गान करो हे गुनी..

कैसी-कैसी ग़लतफहमियां होती रहती हैं! माने रुपाली की ही बात नहीं, हम भी इतने वक़्त तक मुगालते में थे कि हमारे पुराने पॉडकास्‍ट एक क्लिकियाहट की दूरी भर पर हैं, आज क्लिकियाने पर खबर हुई दीख तो सब रहे हैं, कंठ से स्‍वर किसी के नहीं फूट रहा! ख़ैर, सब लाइफ़लॉगर के झोले में थे और झोले की लाइफ़ ही न रही तो कंठ से स्‍वर कहां से फुटता? हमने झोले को फ़ि‍लहाल टेम्‍पररी रिमेडी वाले मोड में दुरुस्‍त किया है, कुछ पुरानी आहें, सिडनी बेशे की संगत में कविता की बांहें, मन के तरंग दीवशेयर के झोले में सजाकर आया हूं, धीरे-धीरे बाकियों को भी फ़ुरसत में कभी व्‍य‍वस्थित करूंगा.

एनीवे, रुपाली की ग़लतफ़हमी की कह रहा था.. कि बेचारी के फिर दर्द उठा दिल में और आंख भी नम थी.. सोच रहे थे रुपाली का दर्द पीनाज़ मसानी की आवाज़ में साकार हुआ है, पता चला ग़लत सोच रहे थे, साकार कौनो सुमीता चक्रवर्ती हैं उनके कण्‍ठ से मुखरित-पल्‍लवित हुआ है!

यह भी अच्‍छी दिक्‍कत है लेकिन. यही कि ग़लतफहमियां बनी रहती हैं. ऐसी-ऐसी चीत्‍कारों में देनेवाला सफ़ाई देता है, लेनेवाला मगर लेता नहीं. बाद में अकेले में आहों की कठवत में पैर डुबाये दीवार को सूनी नज़रों तकता बुदबुदाता है, ‘तुमि केमन करे गान करो हे गुनी, आमि अबाक होय सुनी, केबल सुनी तुमि केमन करे..’

ख़ैर, आप ‘अबाक’ मत होइये, बस सुन लीजिए!

Saturday, September 5, 2009

रुपाली के चाहनेवाले..

गिनकर तीन लोग होंगे इनकी आवाज़ में शिकायत का वह पुट रहता है जैसे आमतौर पर व्‍याह के लिए ‘अपेक्षित उम्र’ (पता नहीं किसके लिए!) को पीछे छोड़ चुके अबतक अविवाहित, और इस तरह से काफ़ी तक़लीफ़ में रह रहे, पट्ठे की आवाज़ में परिवार के बुज़ुर्गों के लिए होता है, कि देखिए, आपलोग पर्याप्‍त कोशिश नहीं कर रहे; वैसे ही, इन तीन लोगों की ओर से, हमारी ओर शिकायत ठिलती रहती है कि जितना चाहिए मैं उतना पॉडकास्‍ट पैदा नहीं कर रहा. अब यहां ये ग़ैरजिम्‍मेदार लोग भूल जाते हैं कि पॉडकास्‍ट पैदा करने में परिश्रम और धीरज ही नहीं, समय भी लगता है, और कैसा तो परिश्रम कर-करके अपने लिए पहाड़ बनाते रहने से मुझे गुरेज नहीं, लेकिन धीरज बरतने से अब गुरेज होता है, और समय का जो है वह पता नहीं, दूसरों को क्‍या अपने को भी लगता है काफी पास है लेकिन सहेजने को हाथ आगे करता हूं तो पता चलता है किसी और के यहां व्‍याह करके चली गई है!

बड़ी मुश्किल है. सबका तोड़ बन भी जाए तो फिर बाद में खुदी को ताज़्ज़ुब होता है कि यह क्‍या, कैसा पॉडकास्‍ट जोड़कर हम बाहर किये हैं. वह फिर कुछ वैसे ही मुंह-चुरावे का किस्‍सा बनता है जैसे किसी की गुजारिश पर हाथ में स्‍केचबुक लिए प्रोफ़ेशनल कलाकार की तरह किसी का स्‍केच उकेरने की अदायें एक्टियाना शुरू करो, और स्‍केच बन चुकने के बाद, ससुर, ऐसा बने कि स्‍केच में उकरे बंदे को उसकी होनेवाली पत्‍नी तक पहचानने से इंकार कर दे! और भूले से पहचान ले ही तो फिर भविष्‍य में शख्‍स से शादी करने की कैसी भी संभावना से इंकार कर दे!

ख़ैर, यह सब ऊटपटांग पॉडकास्‍ट की श्रद्धा में नज़रअंदाज़ करके पढ़ लिया जाए, जिसे माननीय सुश्री देविका चावला, मिसेज़ रेखा भारद्वाज और सबद मा की अकथनीय कष्‍टों वाले अनुपस्थित सहयोग में तैयार किया गया है. सस्‍ते स्‍टूडियो के वेटिंग लाउंज की सस्‍ती कुर्सियों पर अकुलायी जनता में संभवत: कुछ चेहरे पहचाने जा सकें. लेकिन कहां से पहचानेंगे, मेरी उम्र हो रही है तो आपको भी मोतियाबिंद हो ही रहा होगा? एनीवेज़, माथे पर चौंतीस रुपये वाला गमछा लिये बैठे हैं पंडिजी, फिर बड़केनकर जी हैं, बोकारोवाली बैंडिट क्‍वीन है, दुबई सेंड्स इट (टू सूरत) वाली क्‍वीन तो हैइये है, चंडीगढ़ से साहेब, बीबी, ग़ोलाम वाली मीनाकुमारीयो है, और कौन है? हां, बनारस के घाट पर प्रोटेस्‍ट लेकर पहुंचे भैयाजी हैं, और सहारा के मीनार पर चढ़े झांकी ले रहे अपने बिमलजी हैं..

बहुत चिरकुटइ हुई, अब सीधे कास्‍ट की पैडिंग देखिए.. सुनिए..

Thursday, September 3, 2009

एक फ़ोटो-सविता (कविता नहीं)..



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(चढ़ते-चढ़ाते नज़र गई आठ सौंवीं पोस्‍ट है, साथ ही इसी बहाने यह भी पता चल गया कि अभी हजार नहीं हुए, हालांकि इस बीच मैं पता नहीं कितने मर्तबे धुआं और धार हुआ.. मचल-मचलकर इस, उस जाने किस-किस फुदकनों पर सवार हुआ.. ओह, बेरोज़गार तो पहले से ही था फिर भी कैसा तो उसका फैला-बढ़ा संसार हुआ.. कैसे, कहां-कहां के जाहिल होंगे अदालत के गलियारों, कॉलेज के पीछे की दीवारों से लगकर लरज़ते आनंद बक्षी का 'ये क्‍या हुआ, कैसे हुआ' की मोहब्‍बत बिसुरते होंगे, मैं 'मुसाफ़ि‍र हूं, यारो, मेरी आवाज़ ही पहचान है' का पतित गमकौवा गुलज़ार हुआ!..

जाने कैसी रिले-रेस है ओर-छोर संजय तिवारी, श्रीसमीर सुकुमार लाल जानते होंगे, मैं जानता हूं, कब से छील रहा हूं, हाय, अब तक हजार न हुआ?)




फोटुओं को दुलराता-सहलाता, साथ ही, ताक पर यह सांगीतिक भी टांक दे रहा हूं, कियोशी कुरोसावा की एक जापानी फ़ि‍ल्‍म से उड़ाया टुकड़ा है, दो घंटे लंबी पूरी तरह संगीतहीन उदास फ़ि‍ल्‍म के एकदम आखिर में सुन पड़ता है, और सुनते हुए, ओह, लतखोर मंजर को कैसी जिजीविषा, गरिमा में सुहाना कर जाता है, मन जब थिर और उदास हुआ बैठा हो तब आप भी सुनियेगा..

Wednesday, September 2, 2009

परिवार..



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वो रजत रातें.. और दिन..



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Tuesday, September 1, 2009

काला जल..

जाने किस ज़माने के पुराने पोखर के कीचघिसे, काली सीढ़ि‍यों पर बुढ़ाये, मेहराये पंडितजी कांपते-घबराये मंत्र का जाप कर रहे हैं, ‘पैसा नहीं है, पैसा नहीं है! फिर खत्‍म हो गया. कहीं से आता नहीं है लेकिन जाता हमेशा रहता है? कहीं से आता हमेशा नहीं रह सकता?’

हरियाये जल में अपनी घबराहटों में हरा हो रहा समूह-छूटा एक फूला मेंढक अचकचाया फुदक रहा है, ‘सब यहीं तो थे, और देखो, अब कोई नहीं दीख रहा? एक छोटी कविता की बहक में मैंने तीन डुबकियां लगाई होंगी और ऊपरियाया हूं तो किस कदर अकेला हूं? जीवन के मेले में कैसा गीला घेला हूं?’

परेशानी में पंडितजी के सवाल का किसी के पास जवाब नहीं. गांठ के दर्द की पुरानी बीमार पहाड़ से खरीदकर तब जवान रही पत्‍नी लाये थे, जो उनके देह को स्‍वीकार करती है मन के गहरे की अकुलाहटों की मोहब्‍बत को नहीं, दलिद्दर से कैसे-किसी भी तरह पाला छूटे की हाहाकार को ही जिसने जीवन की कुंजी बनाया, बहुत वर्ष हुए वह भी चाभी हेराकर गिरी पड़ी है, पंडितजी के पैसों का, कैसों का, किसी भी सवाल का उसके पास जवाब नहीं..

पंडितजी की पीठ पर, एक ढीठ पुराना बरगद है, जाने कौन तो एक कहां के राजा की कौन एक फौजी टुकड़ी थी किस बात पर नाराज़ पड़ोस का कोई गांव फूंककर लौट रही थी, पवनी का मेला लगा था घर से भागी हुई मंदार साहू की पतोहु नौटंकी का न‍चनिया नाच नाची थी, उसी साल यह बरगद निकल आया था, ज़माने तक बरसाती रातों में जयदेव के गानों पर नशीली बहकों में बहकता था, अब स्‍पोंडिलाइटिस का दर्द है, घुटने में इस्‍पात की डंडी है, खोह में कहां से भटककर चला आया एक अफ्रीकी सांप का ठीहा है, रात के ढाई बजते हैं सांपराज इन घड़ि‍यों कभी क्‍यूबन सांबा में थरथराते थे, अब रात के सवा-एक का पत्ता डोलता है, थके-चुके बरगद को चुन-चुनकर गालियां सुनाते हैं..

ओहोहो, आह.. वाह!

चांदनी रात के काले जल पर खरामा-खरामा एक महीन कोमलता फैली है, लहरों की कंपकंपाहट में जलरंगों की एक नीलिमा उतरी है, देखिए, देखो, अहा, जयदेव निकले हैं, ‘रेशमा और शेरा’ वाले नहीं, ‘गीत-गोविंद’ वाले, संगीत पडितजी की कान तक नहीं पहुंचता, पानी के अंधेरों में फंसी आंत फिर पुकारती है, ‘पैसा.. पैसा!’

रंग-बदर.. भदर-भदर..



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