Tuesday, September 1, 2009

काला जल..

जाने किस ज़माने के पुराने पोखर के कीचघिसे, काली सीढ़ि‍यों पर बुढ़ाये, मेहराये पंडितजी कांपते-घबराये मंत्र का जाप कर रहे हैं, ‘पैसा नहीं है, पैसा नहीं है! फिर खत्‍म हो गया. कहीं से आता नहीं है लेकिन जाता हमेशा रहता है? कहीं से आता हमेशा नहीं रह सकता?’

हरियाये जल में अपनी घबराहटों में हरा हो रहा समूह-छूटा एक फूला मेंढक अचकचाया फुदक रहा है, ‘सब यहीं तो थे, और देखो, अब कोई नहीं दीख रहा? एक छोटी कविता की बहक में मैंने तीन डुबकियां लगाई होंगी और ऊपरियाया हूं तो किस कदर अकेला हूं? जीवन के मेले में कैसा गीला घेला हूं?’

परेशानी में पंडितजी के सवाल का किसी के पास जवाब नहीं. गांठ के दर्द की पुरानी बीमार पहाड़ से खरीदकर तब जवान रही पत्‍नी लाये थे, जो उनके देह को स्‍वीकार करती है मन के गहरे की अकुलाहटों की मोहब्‍बत को नहीं, दलिद्दर से कैसे-किसी भी तरह पाला छूटे की हाहाकार को ही जिसने जीवन की कुंजी बनाया, बहुत वर्ष हुए वह भी चाभी हेराकर गिरी पड़ी है, पंडितजी के पैसों का, कैसों का, किसी भी सवाल का उसके पास जवाब नहीं..

पंडितजी की पीठ पर, एक ढीठ पुराना बरगद है, जाने कौन तो एक कहां के राजा की कौन एक फौजी टुकड़ी थी किस बात पर नाराज़ पड़ोस का कोई गांव फूंककर लौट रही थी, पवनी का मेला लगा था घर से भागी हुई मंदार साहू की पतोहु नौटंकी का न‍चनिया नाच नाची थी, उसी साल यह बरगद निकल आया था, ज़माने तक बरसाती रातों में जयदेव के गानों पर नशीली बहकों में बहकता था, अब स्‍पोंडिलाइटिस का दर्द है, घुटने में इस्‍पात की डंडी है, खोह में कहां से भटककर चला आया एक अफ्रीकी सांप का ठीहा है, रात के ढाई बजते हैं सांपराज इन घड़ि‍यों कभी क्‍यूबन सांबा में थरथराते थे, अब रात के सवा-एक का पत्ता डोलता है, थके-चुके बरगद को चुन-चुनकर गालियां सुनाते हैं..

ओहोहो, आह.. वाह!

चांदनी रात के काले जल पर खरामा-खरामा एक महीन कोमलता फैली है, लहरों की कंपकंपाहट में जलरंगों की एक नीलिमा उतरी है, देखिए, देखो, अहा, जयदेव निकले हैं, ‘रेशमा और शेरा’ वाले नहीं, ‘गीत-गोविंद’ वाले, संगीत पडितजी की कान तक नहीं पहुंचता, पानी के अंधेरों में फंसी आंत फिर पुकारती है, ‘पैसा.. पैसा!’

1 comment:

  1. कहीं से आता नहीं है लेकिन जाता हमेशा रहता है? कहीं से आता हमेशा नहीं रह सकता?’

    ये हुई न बात...

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