Saturday, September 5, 2009

रुपाली के चाहनेवाले..

गिनकर तीन लोग होंगे इनकी आवाज़ में शिकायत का वह पुट रहता है जैसे आमतौर पर व्‍याह के लिए ‘अपेक्षित उम्र’ (पता नहीं किसके लिए!) को पीछे छोड़ चुके अबतक अविवाहित, और इस तरह से काफ़ी तक़लीफ़ में रह रहे, पट्ठे की आवाज़ में परिवार के बुज़ुर्गों के लिए होता है, कि देखिए, आपलोग पर्याप्‍त कोशिश नहीं कर रहे; वैसे ही, इन तीन लोगों की ओर से, हमारी ओर शिकायत ठिलती रहती है कि जितना चाहिए मैं उतना पॉडकास्‍ट पैदा नहीं कर रहा. अब यहां ये ग़ैरजिम्‍मेदार लोग भूल जाते हैं कि पॉडकास्‍ट पैदा करने में परिश्रम और धीरज ही नहीं, समय भी लगता है, और कैसा तो परिश्रम कर-करके अपने लिए पहाड़ बनाते रहने से मुझे गुरेज नहीं, लेकिन धीरज बरतने से अब गुरेज होता है, और समय का जो है वह पता नहीं, दूसरों को क्‍या अपने को भी लगता है काफी पास है लेकिन सहेजने को हाथ आगे करता हूं तो पता चलता है किसी और के यहां व्‍याह करके चली गई है!

बड़ी मुश्किल है. सबका तोड़ बन भी जाए तो फिर बाद में खुदी को ताज़्ज़ुब होता है कि यह क्‍या, कैसा पॉडकास्‍ट जोड़कर हम बाहर किये हैं. वह फिर कुछ वैसे ही मुंह-चुरावे का किस्‍सा बनता है जैसे किसी की गुजारिश पर हाथ में स्‍केचबुक लिए प्रोफ़ेशनल कलाकार की तरह किसी का स्‍केच उकेरने की अदायें एक्टियाना शुरू करो, और स्‍केच बन चुकने के बाद, ससुर, ऐसा बने कि स्‍केच में उकरे बंदे को उसकी होनेवाली पत्‍नी तक पहचानने से इंकार कर दे! और भूले से पहचान ले ही तो फिर भविष्‍य में शख्‍स से शादी करने की कैसी भी संभावना से इंकार कर दे!

ख़ैर, यह सब ऊटपटांग पॉडकास्‍ट की श्रद्धा में नज़रअंदाज़ करके पढ़ लिया जाए, जिसे माननीय सुश्री देविका चावला, मिसेज़ रेखा भारद्वाज और सबद मा की अकथनीय कष्‍टों वाले अनुपस्थित सहयोग में तैयार किया गया है. सस्‍ते स्‍टूडियो के वेटिंग लाउंज की सस्‍ती कुर्सियों पर अकुलायी जनता में संभवत: कुछ चेहरे पहचाने जा सकें. लेकिन कहां से पहचानेंगे, मेरी उम्र हो रही है तो आपको भी मोतियाबिंद हो ही रहा होगा? एनीवेज़, माथे पर चौंतीस रुपये वाला गमछा लिये बैठे हैं पंडिजी, फिर बड़केनकर जी हैं, बोकारोवाली बैंडिट क्‍वीन है, दुबई सेंड्स इट (टू सूरत) वाली क्‍वीन तो हैइये है, चंडीगढ़ से साहेब, बीबी, ग़ोलाम वाली मीनाकुमारीयो है, और कौन है? हां, बनारस के घाट पर प्रोटेस्‍ट लेकर पहुंचे भैयाजी हैं, और सहारा के मीनार पर चढ़े झांकी ले रहे अपने बिमलजी हैं..

बहुत चिरकुटइ हुई, अब सीधे कास्‍ट की पैडिंग देखिए.. सुनिए..

8 comments:

  1. क्या कहें !किछु बलार नेई !

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  2. गजब चिरकुटाई है सर जी !

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  3. मुरीदों पर ऐसी कृपा करनेवाली पीरो-मुर्शिद की सिफ़त खुदा आप में
    कायम रखे। एक ख्वाहिश जाहिर की थी और पॉडकास्ट हाजिर है। फिलहाल नहीं
    सुन पा रहा हूं। घर पहुंचते ही पहली फुर्सत में सुनता हूं, टिपियाता हूं।

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  4. तेरे इश्क में...

    तन्हाइयाँ...

    यूँ छत पे खड़े...

    चुरकुटाइयाँ..हाय!! तेरे इश्क में..

    --ऐसन गज़ब न ठेलो महाराज...

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  5. @बड़केनकर जी,
    देख के, देख के, पहाड़ पे न चढ़ि‍ये, न हमको चढ़ाइये, पियलकास्‍ट सुनके फिर तड़ से ये भी दीखे जाएगा कि ऊंट बौना है और पहाड़ के ऊपर नहीं, नीच्‍चे खाड़ा है.

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  6. वाह...पुरानी खुशबू. बुरी आदत जैसी, पराई चूपड़ी जैसी। ....अब भी दिलकश है तेरा हुस्न, मगर क्या कीजै..
    सिर्फ शकल देख कर टिपियाने के बाद महाराज जब रात घर पहुंचे तो बकलमम की सौवीं मनाने लगे। संडे की सुबह से ही ब्राडबैंड पतली गली में समा गया। अब जाकर बरामद हुआ, सो हाजिर हुए।
    कोई जाने, न जाने। हमें पता है कि पाडकास्ट में कितना वक्त लगता है। इसीलिए तो हमें पसंद भी है क्योंकि इसमें कई विधाओं का समावेश है। कानों से सुना जाता है मगर आंखें बंद कर लें तो सब देखा भी जाता है। ....और शब्दो-ध्वनियों का जादू आपके हाथों कोलाज बनता है। वो मेरे लिए बेशकीमती कॉकटेल है। ....आवाज़ की वो लर्जिश कि कमाल है....

    शुक्रिया साहेब...

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  7. @अजित,
    इसी को कहते हैं गए चौक जनाना का दवाई खरीदने, और जिलानी बानो की मुहब्‍बत का परवाना लिखने लगे, थाने में सिपाहियों ने पूछवाई की तो 'ओ सलम, ओ सलम!' का गाना गुनने लगे!

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  8. badi mehnat ka kaam hai podcasting ...us per akele bolna batiyana...

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