Sunday, September 6, 2009

तुमि केमन करे गान करो हे गुनी..

कैसी-कैसी ग़लतफहमियां होती रहती हैं! माने रुपाली की ही बात नहीं, हम भी इतने वक़्त तक मुगालते में थे कि हमारे पुराने पॉडकास्‍ट एक क्लिकियाहट की दूरी भर पर हैं, आज क्लिकियाने पर खबर हुई दीख तो सब रहे हैं, कंठ से स्‍वर किसी के नहीं फूट रहा! ख़ैर, सब लाइफ़लॉगर के झोले में थे और झोले की लाइफ़ ही न रही तो कंठ से स्‍वर कहां से फुटता? हमने झोले को फ़ि‍लहाल टेम्‍पररी रिमेडी वाले मोड में दुरुस्‍त किया है, कुछ पुरानी आहें, सिडनी बेशे की संगत में कविता की बांहें, मन के तरंग दीवशेयर के झोले में सजाकर आया हूं, धीरे-धीरे बाकियों को भी फ़ुरसत में कभी व्‍य‍वस्थित करूंगा.

एनीवे, रुपाली की ग़लतफ़हमी की कह रहा था.. कि बेचारी के फिर दर्द उठा दिल में और आंख भी नम थी.. सोच रहे थे रुपाली का दर्द पीनाज़ मसानी की आवाज़ में साकार हुआ है, पता चला ग़लत सोच रहे थे, साकार कौनो सुमीता चक्रवर्ती हैं उनके कण्‍ठ से मुखरित-पल्‍लवित हुआ है!

यह भी अच्‍छी दिक्‍कत है लेकिन. यही कि ग़लतफहमियां बनी रहती हैं. ऐसी-ऐसी चीत्‍कारों में देनेवाला सफ़ाई देता है, लेनेवाला मगर लेता नहीं. बाद में अकेले में आहों की कठवत में पैर डुबाये दीवार को सूनी नज़रों तकता बुदबुदाता है, ‘तुमि केमन करे गान करो हे गुनी, आमि अबाक होय सुनी, केबल सुनी तुमि केमन करे..’

ख़ैर, आप ‘अबाक’ मत होइये, बस सुन लीजिए!

14 comments:

  1. शब्दों के सफर पर अजित जी द्वारा आपके योगदान को रेखांकित करते हुए लेख को पढ़कर यहाँ पहुंचा हूँ । आपको बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें । -शरद कोकास दुर्ग,छ.ग.

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  2. हम तो अवाक होकर ही पढ़ते सुनते हैं आपको ।

    टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं होती अपनी । पढ़ते हैं, सुनना हो तो सुनते हैं - फिर फिसल लेते हैं ।

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  3. खोपड़ी चकरघिन्नी हो गई सुनते समझते...फिर सुनेंगे कल पूजा के बाद..कहते हैं उस समय मन शांत रहता है, बात समझ आती है...इन्तजार करियेगा वरना कुछ और न ठेल दें इसके पहले कि हम ई मसला समझ पायें. :) वरना छूटा अबूझा अकबकाया हाल ही समझो अपने सा!!

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  4. दादा, गान सँगे ऎई कथा शूनते तो भालो छिलो,
    किन्तु आमि बूझलाम ना, ऎईटा की व्यापार ?
    प्रोनय निवेदनेर किछु घाँटाघाँटी आछे, किन्तु छेलेटारा किछु सँदर्भ आमरा जानि तो ना !

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  5. @डागदर मोशाय,
    सेई तो.. बलेछिलाम ना जे कतो गोलोतफामी?

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  6. यिहे पर्पोजल २०-२५ साल पहिले पेठवा देते त न जी?

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    1. पठाये नहीं थे तुमको कइसे मालूम है.

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  7. ओह कित्ते दिन बाद फ़िर से सुना। सच में अद्भुत पॉडकास्ट!

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    1. चलिए, इसी बहाने कुछ आनंद हुआ आपका..

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  8. वाह वाह मजा आ गया प्रमोद जी !!!!

    "सिंघाड़ा" और "मैक डोनाल्ड" वाला पार्ट बहुत बढ़िया लगा :) :)

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  9. वाह छूटटे गया था... अनूपजी को भी शुक्रिया लिंक थमाने के लिए।

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    1. किस आंदोलन में कहां जाकर पीछे खड़े हो जाते हैं, कैसे छूट जाता है, सत्‍प्रेमजीवी?

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  10. अबाक हैं सच्ची..............
    fell in love...
    :-)

    अनु

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    1. please, don be अबाक, and don't fall in love either..

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