Wednesday, September 9, 2009

कैसा, जैसा प्रहसन

मैं सचमुच ताज्‍जुब में हूं. सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही का ठीक-ठीक गणित और भूगोल है क्‍या. या सब महज आंख में धूल (और आप स्‍वयं पीड़ि‍त हुए तो, मिर्च की बुकनी) फिंकवाने का प्रहसन है फार्स है क्‍या है? जज पता नहीं किस दुनिया के जीव हैं, बड़ा अजीबो-गरीब सस्‍पेंसफुल उनकी नियुक्तिओं का प्रोसेजर होता है, वैसा ही सस्‍पेंसफुल कुछ उनका जीवन चलता है (कोई दोस्‍त है आपका? जज, जिसे आप दोस्‍त कहकर बुलाते हों? पता नहीं वे किसे 'ऐ दोस्‍त!' कहकर बुलाते हैं! किनके बीच उठते-बैठते हैं, किससे अपने दिल का हाल बताते हैं.. किन संगतियों में समाज और समय के बारे में अपनी राय बनाते हैं).. ख़ैर, फिर कुछ मामले उनकी जांच में आते हैं, बाज मर्तबा बड़े, मीडिया में हल्‍ला-धूल-तूफान खड़ा किये, सनसनीखेज़ मामले होते हैं, फिर उनकी जांच की कार्यवाही शुरू होती है, बहुत बार कुछ मुग़ले-आज़म बनने के अंदाजं में एक उम्र गुज़र जाती है जज साहेब की जांच टीम अपने जांच को जांचने में जमी रहती है, बर्फ़ की सिल्‍ली का आकार बढ़ता, बड़ा होता रहता है, लड़कियां कॉलेज स निकलकर डेढ़ बच्‍चों की मांएं बन जाती हैं मगर जज साहेब की जांच का फै़सला नहीं आता. आ नहीं पाता. क्‍योंकि जांच अभी भी चल रही होती है! लेकिन फिर कभी-कभी जांच अपने मुकाम पर भी पहुंच जाती है, फ़ैसला सुना दिया जाता है.. या इस पर्टिकुलर केस में रपट तैयार कर ली जाती है.. फिर? इसके बाद की कहानी क्‍या होती है? जिनकी दोगलई की पहचान का यह लंबा खिंचा प्रसंग न्‍यायोचित उपसंहार की कहानी लिखवाता है? या वह कुछ हलकों में सार्वजनिक होकर (लेकिन ज्‍यूडिशियरी की आमदनी की तरह) आम सर्वजन के लिए गुप्‍तरोग बनी रही एक प्रहसन से निकलकर दूसरे प्रहसन में छिपने चली जाती है? लाल्‍टू के यहां नज़र गई तो मैं भी आंख में मिर्ची की बुकनी सजा रहा हूं, पता नहीं आप जहां खड़े हैं वहां क्‍या कर रहे हैं, आंख सहला रहे हैं.. या मुस्‍करा रहे हैं..

3 comments:

  1. हम तो इस प्रक्रिया पर मुस्कुरा रहे हैं... अखबार से एक लाइन उठा रहा हूँ... परसाई जी ने कहा था अदालतों, जजों को देखकर पुनर्जनम में यकीन हो जाता है....

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  2. न्यायपालिका और जज :) :)

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  3. hum sirf khade hain.samajh nahi paa rahe hain k kya karein? badhiya likha.

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