Thursday, September 10, 2009

एक तिलिस्‍म नाम जिसका सलमा..











नाक की नोक पर दीख जाये, उंगलियों की गिरफ्त में पकड़ आये.. या क्‍या तो वो हैं उनके हुस्‍न के जादू और गेसुओं के रहस्‍य की तरह धुंधलके फ़रेब के तार बुनता चले, क्‍या होता है होता क्‍या है यथार्थ? प्‍लेट में सजा तरबूज तरबूज नहीं उम्‍मीद का एक झीना, लाल सुर्ख़ दमदमा होता है? मन की रुपहली, रंगीली लोरी होती है? लाल के पाल में गुंथे काले दाने वीराने में दीवाने बछेड़े घोड़ों की 'तिरे इश्‍क में' की 'बदहवाइयां', 'गुम जाइयां' कारवां होता है? होता क्‍या है यथार्थ? सिनेमा? क्‍या होता है?

(तज़ाकी डायरेक्‍टर बख़्तयार खुदोनाज़रोव की 1999 की फ़ि‍ल्‍म 'लुना पापा' से चंद स्‍नैपशॉट्स)

7 comments:

  1. सिनेमा के प्रति आपका लगाव प्रशंसनीय है प्रमोद जी, कुछ आलेख सिलेमा पर भी पढे हैं... पर मुझी में अभी परिपक्वता नही है...

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  2. @सागर,
    अरे, मुझी में है? किसने बताया, हमारे बाबूजी ने?

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  3. कल रात ही एक फ्रेंच फिलम देखे थे अंग्रेजी सब टाइटल के साथ ...ए ब्यूटीफुल . लगा .कभी कभी यथार्थ भी सुन्दर होता है

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  4. कुछ कुछ समझे ...कुछ कुछ हवा हो गया ....कुछ तो समझाना

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  5. आपने तो तलब बढा दी है..

    कहा देखी जाए.. ये भी तो सुझा देते सर..

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  6. फिल्म 'लुना पा' तो नहीं देखी अभी पर....

    नाक की नोक पर दीख जाये, उंगलियों ................................................. होता क्‍या है यथार्थ? सिनेमा? क्‍या होता है?
    अच्छा लगा ....
    फ़िलहाल इतना ही ...

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