
औरत के माथे चारदीवारियों के सितम हैं तो ऐसा नहीं उसी के हैं अपने ग़म नहीं.. हैं, बहुत हैं, फिलहाल नींद अगोर रहा हूं.. उससे आगे की लिस्ट पर चलूं? चलने लगूं तो फिर पता नहीं किस-किसकी नींद उड़ने लगे.. ख़ैर, एक मीठा, महीन अरमान तो यही था.. लेकिन क्या कहें क्या था.. प्रभुजन दीखा रहे हैं वह अरमान कम शैतान का घर ज़्यादा है. तो अकुलाया, असमंजस में सकुचाया उसे सुलाने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन आ कहां रही है, नींद, वही तो अगोर रहा हूं..
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