“हमरा किलास का नहीं, जूरियन (जूनियर) लइकी सब है हो, सुबीरन, एगो बंगला है दूसिरकी गुजराती है, बेलाउज पर आसाराम बाबू जी का बैज साटे रहती है, शनिचर का शनिचर उनका फोटो गलियारी में टांगके उनका गोर पे माथा फोर-फोरके आरती अऊर भजन सब गाती है! हम शेकायत नहीं करते हैं, शेकायत काहे ला करेंगे, जी? ओ लोक को जो अच्छा बुझाता है, करता है, वइसे भी बंगला-गुजराती लइकिन है, हमरा जूरियन सब है, हमको जो अच्छा बुझायेगा हम ऊ करेंगे, नहीं जी? उनका लिए आसाराम हैं, अऊर हमरे बास्ते हमरे देवधर भइया हैं! सुने हो कि नहीं, जनार्दन? ओहोहो, कइसा तो मीठा-नसीला सलबत वाला बात सब बोलते हैं, सगरे कान में हरमोनिया का परदा सोहाने लगता है!”“के नसीला सलबत घोलता है, हो?”
“कितना अच्छा लगता है!”
“क्या बोले, देवधर भइया? एक हाली फिर से बोलिये न!”
“केतना तो अरमान लेके दुआरी पे फुलकारी किये थे! एतना मोहप्पत से एक-एगो गमला रोपे थे, अऊर देखिए, चंदिरका जी, ई करमखोर बकरी को, कवनो गाछ सोगहग नहीं छोड़ी है!”
“घुमाके चार लात लगाओ पगलेट को! अरे, तुम्मो आंधरे न हो, कार्तिक, बकरी को दुआरी, अऊर ऊहो गाछी का लगले बांधते हैं, बाबू?”
“राती का साग का पाता सब बचा है, और मुट्ठीभर सहजन है, दाल में डाल दें, दीदी? कि जेठ जी के लिए कटोरा भर पहिले अलग कै लें?”
“अगे! हंसुआ खेले का ची है, रे लइकी? हाथ से खून का धार छोड़ देगा तब्ब सुधायेगी गे?”
“लाल! कोमल, कमनीय, रौद्र क्या रंग नहीं लाल के और सभी रुपों में अच्छा लगता है. नज़दीक नवजात बच्चे की हथेली में देखो, चंचल कन्या के हंसते चितवन को देखो, आग की चमकती लपटों में.. सब कहीं लाल की शोभा है. क्यों है? इसलिए है कि लाल सच्चा है!”
“का बोले, का बोले? फीन से लीपीट कीजिएगा?”
“लाल सच्चा है बोले.”
“देखा रे, जनार्दन, देखा, देवधर भइया कइसा किस्टल किलियर बचन-बोली बोलते हैं!”
“चौबीस कराट का गोल्डन है! मीनिंग का गहिरका कुआं और शहद का गगरी है!”
“इहंवा कुट्टी कटवा के लाये हैं, कोई सैकिल से उतरवायेगा, हो?”
“जा बाबू, जा तनि चाचा के सैकिल थाम ले तS?”
“हम बहरी नहीं जायेंगे, लंगटे हैं, हमरा पाइंट सुखा रहा है, बुनिया ओपे पेशाबी कै दी थी!”
“ई बहिरी जा रहे हैं, संझा का नश्ता के लिए मर्किट से कुच्छो मंगवाये ला है, दीदी?”
“रजिन्नर कुमार का कवन फिलिम का गनवा था, जी? जे मोरा प्रेमपत्र पढ़के तू नराज ना होना कि तू मोर बन्नगी है, तू मोर दिल्लगी है!”
“पंड़वा के हियां सीधे ठोंगा से ई गरमा-गरम जिलेबी खाये हैं कि का बतायें, भउजी! कंठ तरके टोटली चरनामृत हो गया!”
“देवधर भइया कहां गए, हो? कोउची सुनाइये नै पड़ रहा है? ए माइक मास्टर, एक हाली फेनु अपना बाजा टेस्टिन करो, बाबू!”
“ओन-टू-थ्री-फोर! ओन-टू-थ्री-फोर?”
“कितना अच्छा लगता है! लाल.. गुलाल..”
“जय हो, देवधर भइया! सिर्र-सिर्र.. जिय, राजा!”
“ऐ कौन छौंरा सीटी मारा रे? ई गुंडा-बवाली का एरिया है, हो? रेसपेट्टिबल सोसायटी रहता है हियंवा!”
“हमसे नराज हैं त बोलिये न, दीदी? तबसे तरकारी का कटोरी लाके धरे हैं आप चीखके कुछ बतइबो नहीं कर रही हैं!”
“बुनिया फेनु पेशाबी की है, मौसी!”
“जनाना कपड़ा साटके घड़ी भर को नहाना-घर में गई ओतने में लेस दिया तू लोक को? बारह ठो छौंड़ा-बुतरी का घर में एगो बच्चा का पेशाबी नहीं संभला रहा?”
“बोल रहे हैं कान खोलके सुन लीजिए! सुबही-सकाली हमसे तू-तड़ाक का भासा मत बोलिये, हमरा बाबूजी आपका हियां गोड़ पड़के बियाह कराये नहीं गए थे, हां!”
मुसमात देवकी बो की परकी बिलार है खपड़ा पर का पसिरा सतपुतिया के पीछे टहिल कर रही है, भोजपुरी के चिरकुट्टन से बेपरवाह, हिन्दी का तो अब यूं भी कहते हैं डे फिक्स हो गया है.. एक बच्चा आंख पर हाथ धरे उसकी दिशा में तक रहा है पर बिलारिन कुमारी की नज़र जाती है तो वह अदा से गरदन मोड़कर कहती हैं, 'मिआऊं!' ज़ाहिर है अंग्रेजी में कह रही हैं. बच्चा हिंदी में बुदबुदाने की कोशिश करता है, 'मैं आऊं?' तो पीछे से उसकी मां झाड़ू फेंककर कौंकती है, 'देखो, ई छौंड़ा के, एही बदे तोहरा के कंवेंटी भेजे हैं रे?'