Sep 16, 2009

सीढ़ि‍योंवाले कमरे में सत्तर पार के शिखर का वह बच्चा..

बच्‍चे के बच्‍चे दोस्‍त नहीं बच्‍चे की अकेले की दुनिया है. घंटों एक जगह थिर बैठे दीवार तकते रहने का बच्‍चे को अभ्‍यास है, या मकान की सीढ़ि‍यों पर स्‍टैच्‍यू बने बैठे बगल से गुज़रते पैरों को देखकर किनके हैं पहचान लेने का. बच्‍चे ने बाहर खुले में घास के मैदान कभी देखे हैं, बहुत नहीं देखे समुंदर के ठाठ बादलों की बारात नहीं देखी, घर के अकेले सूनसान में किताबों में दबी तितलियों की तस्‍वीरें देखी हैं. बाहर किसी और घर में रेडियो सीलोन पर गाना बजता है, बच्‍चा नज़रें उठाकर गाने में कौन दुनिया है क्‍या गा रही है भूलकर कभी गाने की संगत में सोचता कुछ देर अनजाने भावों में घिरा अनमना, अस्थिर बना रहता है, आवाज़ निकालकर वह भी गा सकता है की जांच में वह गुनगुनाता नहीं. मकान में दूसरे काफी होंगे बच्‍चे ने देखा है लोगों को साथ और अकेले गाते, गुनगुनाते हुए, अपने को देखे इतनी रौशनी, ऐसी चंचलता में उसने खुद को नहीं देखा..

बाहर दूसरे और बच्‍चे हैं लेकिन बच्‍चा समझता है मैं अलग हूं और वे और हैं. बच्‍चों की मांएं तश्‍तरी में खाना लिए उनके पीछे भागती हैं, एक कौर, सिर्फ़ एक और की मिन्‍नत करती हैं, बच्‍चे की कभी ज़रूरत नहीं बनी कोई उसके पीछे घूम-घूमकर मिन्‍नत करे, क्‍योंकि बच्‍चे को भूख लगती है उसे पता होता है कहां देगची में रोटियां ढंककर धरी हैं और कैसे उन्‍हें गुड़ में लपेटकर खा लेने से भूख और कमज़ोरी भूली जा सकती है. कभी ढंकी देगची के भीतर रोटियां न बची रहें तो और क्‍या कैसे खाकर थोड़ी देर ज़िंदा कैसे रहा जा सकता है की तरकीबें जानता है बच्‍चा.

घर लौटने के बाद कपड़े बदलकर बहुत बार पापा स्‍टील की आलमारी है उसके दरवाज़े को ज़रा सा खोले उसके आगे खड़े रहते हैं. बच्‍चा जानता है आलमारी में कितना अंधेरा है एक औरत की मढ़ी फ़ोटो है, वह फ़ोटो नहीं देखता पापा सबकुछ भूले, खोये अंदर अंधेरा तकते जाने क्या सोचते रहते हैं देखता रहता है बच्‍चा. एक दिन वह भी पापा की तरह आलमारी के दरवाज़े को ज़रा सा खोले अंदर का अंधेरा सब तक लेगा. जितना जैसे-जैसे जो कुछ खड़े-खड़े सोचते हैं पापा किसी दिन वह भी सारा वह सोच लेगा..

पापा की एक साइकिल है. नीला शर्ट और जूता है. चश्‍मा और पेन है. पापा सिर्फ़ काम की बात करते हैं, ऐसे ही करने के लिए करें की बात की पापा को आदत नहीं. गाने की तो एकदम ही नहीं. सिर्फ़ जांचने के लिए बहुत बार बिस्‍तरे में लेटा बच्‍चा उठकर पापा के पीछे जाकर खड़ा हो जाता है, कि पापा को अचानक उसके पीठ पर खड़े होने की सुध होगी और पापा चौंक जाएंगे, लेकिन पापा को सुध नहीं होती. चौंकने की तो पापा को जैसे आदत ही नहीं. बच्‍चे ने भी कितनी बार कोशिश की है कि वह चौंककर देखे चौंककर वह कैसा दिखता है, मगर फिर चाहकर भी बच्‍चा चौंक नहीं पाता.

इतनी रात हो गई अभी तक जगा है लेकिन जगे होने के ख़्याल में बच्‍चा चौंक नहीं पाता. पापा लैंप की रौशनी में टेबल पर झुके हुए अभी भी लिख रहे हैं. आखिरकार हारकर बच्‍चा बिस्‍तरे से उतरकर पापा के बगल जाकर खड़ा हो जाता है. पापा लिखते-लिखते बातें कर रहे हैं, बच्‍चे से नहीं कर रहे. बच्‍चा करना चाहता है फिर कुछ सोचकर चुप खड़ा रहता है.