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Sep 20, 2009

साढ़े तेरह रुपिया में एगो पाकेट..

फिर.. फिर? सुख का दवाई, मनोरमवा का भगाई, बिष्‍णु का पढ़ाई, जूता के कीनाई.. केतना-केतना मर्ज़ है, सोचे में हर्ज है कि जी, ऐतना सब दर्द है?..

3 कमेंट:

mukesh said...

राम जाने का हाल हो गईल
सौ रुपया के दाल हो गईल
ई महंगाई जान ले के जी
बाप रे बाप ई महंगाई

डॉ .अनुराग said...

पता नहीं सर जी मन ऐसा है या मौसम का असर भी.....आपका ये शीर्षक जैसे बहुत कुछ कह रहा है ...

Manoj Bharti said...

इस महंगाई के जमाने में
प्रभु से सिर्फ यही प्रार्थना है कि
जरूरत पड़े न दवाई की ऐसा तन दे
रमा रहे मन तन के सुख में ऐसी बुद्धि दे
और विष्णु का मन लगा रहे पढ़ाई में
कि ट्यूशन की जरूरत न पड़े
और जूता सालों साल चले बीना कीनाई के

किसी को मर्ज न लगे महँगाई का
किसी को दर्द न हो महँगाई का
हे प्रभु ! ऐसी सोच हमारी
तुझ पर कर ऐतबार करें
हम तुमसे गुहार
इस दर्द पर हमदर्दी दिखा
तू ही इस से पार लगा
महँगाई को दूर भगा