Monday, September 7, 2009

सुआद मास्‍सी, मैं और पता नहीं कैसे-कैसे उड़ेले.. झमेले..

सुआद मास्‍सी गाना चाहती है, जुगलबंदी के सुख में नहाया मैं भी मनबहार गुनगुनाना ही चाहता हूं, मगर आजू-बाजू लोग चैन से रहने दें तब न? देखिए, किसी हरामी का फिर फ़ोन आ रहा है.. कि हीरामनी का है?

3 comments:

  1. इ तो पुराना वाला फिर से चढ़ा दिये.

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  2. मैं, मनोहर और जोशी जी की याद आई..

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