Tuesday, September 8, 2009

श्रद्धारत औरतें..


बच्‍चे देखने, और ज्यादा खुद को दिखाने आये हैं, श्रद्धा में खड़ी औरतें ही हैं.. और मेरी श्रद्धा में नहीं हैं. खड़ी..

(स्‍केच को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकियाकर अलग खिड़की में खोलें)

8 comments:

  1. कोई व्रत भी रखा है या नहीं..

    ReplyDelete
  2. @कुश,
    तुम थाल में सिंघाड़े का हलुआ सजाये सेवा में चले आओ, देखो, व्रत में भी नत हो लेता हूं..

    ReplyDelete
  3. अरे सर जी मैं तो उन महिलाओ की बात कर रहा था जो श्रद्धावत खडी है.. पर आपके लिए सिंघाडे का हलवा भी ले आयेंगे.. आप आज्ञा दीजिये..

    ReplyDelete
  4. ओह!! परम प्रतापी...

    बहुते बढ़िया..

    ReplyDelete
  5. bacche dekhne, aur zyada khud ko dikhane aaye hain... waah sir! aapne sahi rag pakad li...

    ReplyDelete
  6. हम श्रद्धानत हैं.
    सिंघाड़े का हलवा..वाह! गजब महक होती है...

    ReplyDelete
  7. @कुश,
    बड़े आज्ञा देते नहीं, छुटप्‍पन की अच्‍छी समझवाले बच्‍चे समझ लेते हैं, लेकिन मैंने तो दी भी, और तुम अपनी तो छोड़ो, जाने कहां अटके रहे, थाल और सिंघाड़ा भी अटका पडा है, पता नहीं किनकी संगत में तुम क्‍या कर रहे हो कैसी सीखें सीख रहे हो..

    ReplyDelete