बहुत दिनों से बहुत सारा पेंसिल झोला में खोंसके
एहर-ओहर हो रहे थे, पेंसिलयाने में मन जाने कैसा सकुचाने लगता था. तो सोचा-
इतना सोचकर नहीं सोचा- कि इस सकुचाने,
खराब हो जायेंगे फिर खुद को क्या मुंह दिखायेंगे की चोट खाने से खुद को बचाते रहने का भी क्या तुक.. तो
आगे नाथ न पीछे पगहा वाले अंदाज़ की कुछ चिचरीकारियां हैं,
ज़रा संभल के चलो, बाबू की बेक़रारियां.. दिल पर मत लीजिएगा, मैं भी इन दिनों कोशिश करता हूं
मैथिली और
सिरिल गुप्ता न बनूं, दिल पर जितना ऑलरेडी बहुत पहले से लिए हैं, उसी का बोझ बहुत है..




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