Sep 29, 2009

घिसकारियां..

बहुत दिनों से बहुत सारा पेंसिल झोला में खोंसके एहर-ओहर हो रहे थे, पेंसिलयाने में मन जाने कैसा सकुचाने लगता था. तो सोचा- इतना सोचकर नहीं सोचा- कि इस सकुचाने, खराब हो जायेंगे फिर खुद को क्‍या मुंह दिखायेंगे की चोट खाने से खुद को बचाते रहने का भी क्‍या तुक.. तो आगे नाथ न पीछे पगहा वाले अंदाज़ की कुछ चिचरीकारियां हैं, ज़रा संभल के चलो, बाबू की बेक़रारियां.. दिल पर मत लीजिएगा, मैं भी इन दिनों कोशिश करता हूं मैथिली और सिरिल गुप्‍ता न बनूं, दिल पर जितना ऑलरेडी बहुत पहले से लिए हैं, उसी का बोझ बहुत है..











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