Tuesday, September 29, 2009

घिसकारियां..

बहुत दिनों से बहुत सारा पेंसिल झोला में खोंसके एहर-ओहर हो रहे थे, पेंसिलयाने में मन जाने कैसा सकुचाने लगता था. तो सोचा- इतना सोचकर नहीं सोचा- कि इस सकुचाने, खराब हो जायेंगे फिर खुद को क्‍या मुंह दिखायेंगे की चोट खाने से खुद को बचाते रहने का भी क्‍या तुक.. तो आगे नाथ न पीछे पगहा वाले अंदाज़ की कुछ चिचरीकारियां हैं, ज़रा संभल के चलो, बाबू की बेक़रारियां.. दिल पर मत लीजिएगा, मैं भी इन दिनों कोशिश करता हूं मैथिली और सिरिल गुप्‍ता न बनूं, दिल पर जितना ऑलरेडी बहुत पहले से लिए हैं, उसी का बोझ बहुत है..











तस्‍वीरों को बड़ाकार देखने के लिए इमेज़ पर चूहा ले जाकर इमेज़ को नये टैब में खोलें.

6 comments:

  1. टाइटल के बाद तीसरी स्केच बहुत पसंद आई... भले किया... जंग लग जाता है नहीं तो छुड़ाते रहना चाहिए

    ReplyDelete
  2. अन्तिम चित्र के बारे में दावे से कह सकता हूं कि मुझे समझ में आ गया।

    रंगों का प्रयोग भी करने लगे हैं बाबूजी।

    ReplyDelete
  3. @सही कहा, अजित, बनाते समय मुझे भी यही लगा था कि अरे, समझ रहा हूं, फिर भी बना रहा हूं..

    ReplyDelete
  4. न न करते भी दिल पे बहुत ले बैठे सर जी....पर .पेन्सिल झोले से बाहर आकर भली लगी है खास तौर से तीसरे चेहरे में ...

    ReplyDelete